कॉकरोच जनता पार्टी का उदय क्यों मायने रखता है

पंद्रह साल पहले कुछ दोस्तों के साथ एक नए व्यंग्यात्मक ऑनलाइन राजनीतिक दल—'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मोहम्मद रफी)' की शुरुआत करते वक्त मैंने जो लिखा था, वह भविष्यवाणी अब सच होती दिख रही है. देश में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) का गठन हो चुका है. इसकी शुरुआत मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को 'कॉकरोच' और 'परजीवी' कहे जाने वाले संवेदनहीन बयान के विरोध में एक मजाक के रूप में हुई थी.

सिर्फ कुछ ही दिनों में, बिना किसी पारंपरिक ढांचे, कॉर्पोरेट फंडिंग, जातीय गणित या स्थापित वैचारिक वंशावली के, सीजेपी इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और स्टिक-फिगर कार्टूनों के जरिए जंगल की आग की तरह फैल गई है. पुराने राजनीतिक वर्ग को यह भले ही हास्यास्पद लगे, लेकिन इस बकवास के पीछे एक गंभीर सच छिपा है. इसे खारिज किए गए, बदसूरत और अब तक अदृश्य रहे लोगों का विद्रोह कहा जा सकता है, जैसा कि सत्य सागर ने “countercurrents.org” में प्रकाशित अपने लंबे लेख में लिखा है.

हिंदी में अनुदित और संपादित लेख के मुताबिक, कॉकरोच उस जनता का प्रतीक बन गया है, जिसे शासक संभ्रांत वर्ग देखना ही नहीं चाहता—अदृश्य मजदूर, किसान, छात्र, महिलाएं और बेरोजगार युवा. ये वे लोग हैं जो देश को चला रहे हैं, लेकिन सत्ता इन्हें 'यूज़ एंड थ्रो' की वस्तु समझती है. सत्ता प्रतिष्ठान और खासकर भाजपा का वह इकोसिस्टम, जो प्रदर्शनकारियों और असंतुष्टों को "विकास में बाधा या देशविरोधी" कहता आया है, आज गहरे डर में है. इतिहास गवाह है कि जब शोषितों में एकजुटता आती है, तो सत्ता कांपने लगती है. कॉकरोच हर परमाणु युद्ध और तबाही में जीवित रह जाता है, लेकिन बड़े-बड़े साम्राज्य इतिहास बन जाते हैं.

चुनावी व्यवस्था और युवाओं का टूटता भरोसा

सीजेपी का शून्य से दो करोड़ (20 मिलियन) इंस्टाग्राम फॉलोअर्स तक पहुंचना पूरी चुनावी और राजनीतिक प्रक्रिया पर से जनता के उठते भरोसे का लक्षण है. आज चुनाव एक महंगा नाटक बन चुके हैं, जिससे आम नागरिक के जीवन में कोई बदलाव नहीं आता. नेता चुनाव से पहले क्रांति का वादा करते हैं और जीतने के बाद वीआईपी संस्कृति, बड़े बंगलों और सुरक्षा के घेरे में रहने वाले राजा बन जाते हैं. लोकतंत्र अब जनता का प्रतिनिधित्व करने के बजाय विशिष्ट लोगों की रक्षा करने वाला एक 'गेटेड क्लब' बन गया है.

आम नागरिक का सामना आज डिग्रियां होने के बावजूद अंतहीन बेरोजगारी, चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था, महंगाई, टूटे बुनियादी ढांचे और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार से होता है. सरकारें केवल भव्य तमाशा (स्पेक्टेकल) खड़ा करने में व्यस्त हैं, जबकि स्कूल-अस्पतालों में पद बरसों से खाली पड़े हैं.

भारतीय युवाओं का यह गुस्सा हालिया नीट परीक्षा और लगातार होते पेपर लीक विवादों में साफ दिखता है. जब सालों तक दबाव में तैयारी करने वाले छात्रों को पता चलता है कि प्रश्नपत्र पैसे और रसूख वालों ने पहले ही खरीद लिए, तो न्याय व्यवस्था पर से उनका भरोसा उठ जाता है. एक पूरी पीढ़ी अब पूछ रही है: ऐसी धांधली वाली व्यवस्था में कड़ी मेहनत का क्या फायदा? जब योग्यता की नीलामी हो रही हो, तो गुस्सा राजनीतिक रूप से विस्फोटक होना लाजिमी है.

अदृश्य बहुमत का रूपक

सीजेपी का यह प्रतीक युवाओं के बीच इसलिए काम कर रहा है क्योंकि कॉकरोच आधुनिक भारत के इसी अदृश्य बहुमत का सटीक रूपक है.  व्यवस्था अरबपतियों और मशहूर हस्तियों का महिमामंडन करती है, जबकि सड़क साफ करने वालों, अन्न उगाने वालों और शहर बनाने वालों को पृष्ठभूमि का शोर समझती है. कॉकरोच पर कीटनाशक छिड़के जाते हैं, उसे कुचला जाता है, फिर भी वह जीवित रहता है, क्योंकि पूरी व्यवस्था उसी के श्रम पर टिकी है.

यह उभार कुछ हद तक तमिलनाडु में जोसेफ विजय की 'तमिलगा वेट्री कज़गम' जैसी नई राजनीतिक संरचनाओं के उदय जैसा है, जहाँ युवा स्थापित पार्टियों और वंशवाद की राजनीति को पूरी तरह नकार रहे हैं.  वे सांप्रदायिक नफरत के बजाय नौकरियों की, हैशटैग के बजाय अस्पतालों की और टीवी वाले राष्ट्रवाद के बजाय शिक्षा की राजनीति चाहते हैं.

मीम्स आंदोलन नहीं होते: आगे की चुनौतियां

लेकिन इस मोड़ पर एक बड़ा खतरा भी है. केवल गुस्से से बदलाव नहीं आता. डेढ़ दशक पहले 'अरब स्प्रिंग' ने दुनिया के तानाशाहों को हिला दिया था, लेकिन ठोस संगठन और दूरदर्शी सोच न होने के कारण उन क्रांतियों को बाद में हाईजैक या कुचल दिया गया. भारत जैसे असमान देश को केवल 'जेन जी' शैली के ऑनलाइन प्रदर्शनों से नहीं बदला जा सकता. ये तात्कालिक विस्फोट जातिगत पदानुक्रम, कॉर्पोरेट कब्जे और आर्थिक असमानता जैसी ढांचागत समस्याओं को हल नहीं कर सकते.

सीजेपी की सफलता इस बात से तय होगी कि क्या उसके फॉलोअर्स वास्तविक दुनिया में संगठित होकर रचनात्मक कार्य कर सकते हैं? भारत को केवल सोशल मीडिया पर चिल्लाने वाले नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने वाले संगठित नागरिकों की जरूरत है—जो स्कूल ठीक करें, गरीब बच्चों के लिए अध्ययन केंद्र बनाएं, स्थानीय जवाबदेही तय करें और नफरत का विरोध करें. मामूली कॉकरोच भी टीमवर्क और दृढ़ता के कारण करोड़ों वर्षों से जीवित है.

विपक्ष का संशय और भाजपा का नैरेटिव

एक आदर्श दुनिया में भारतीय विपक्ष को इस युवा आंदोलन को गले लगाना चाहिए था, लेकिन वे संशय और बौद्धिक अहंकार में फंसे हैं.  जब भी कोई नया जन-उभार होता है, विपक्ष सहानुभूति दिखाने के बजाय संदेह करने लगता है कि यह कोई सीआईए का एजेंट या भाजपा का गुप्त प्रोजेक्ट तो नहीं है? यह उस फुटबॉलर की तरह है जो खाली गोलपोस्ट के सामने गेंद मिलने पर गोल करने के बजाय पास देने वाले साथी से ही पूछताछ करने लगे.

दूसरी तरफ, भाजपा प्रतिष्ठान तमाशे, भावनाओं और नैरेटिव की राजनीति को बेहतर समझता है. विपक्ष अक्सर उस 'उम्मीद' को भुनाने में नाकाम रहता है जिसकी तलाश में देश के करोड़ों युवा भटक रहे हैं—यह उम्मीद कि राजनीति पारदर्शी हो, नेता सेवक की तरह काम करें और युवाओं का भविष्य अंधकारमय न हो.

यदि मौजूदा परिस्थितियां ऐसी ही रहीं, तो देश आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक पतन की ओर बढ़ जाएगा. 'कॉकरोचों का यह विद्रोह' गणराज्य के लिए कोई खतरा नहीं है, बल्कि शायद इसे बचाने का यह आखिरी मौका है.

 


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