आकार पटेल | तथ्यों पर चिल्ला कर भारत सरकार अब दोहरी ज़बान से बोलती है.

एक पल के लिए मान लीजिए कि मैं एक बड़ा और ताक़तवर आदमी हूँ जो आसानी से भारी वज़न उठाता है, लचीला है और तंदुरुस्त है. अगर कोई मेरे पास आए और मुझे अस्वस्थ और कमज़ोर बताए, तो क्या इससे मुझ पर कोई असर पड़ेगा? अगर पहली बात सच है कि मैं वाक़ई बड़ा और ताक़तवर हूँ तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए. ग़ालिबन मैं उन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ जाऊँगा.

मान लीजिए कि मैं अमीर हूँ और पुश्तों से अमीर रहा हूँ. तो किसी अजनबी की यह बात कि मैं ग़रीब हूँ या दरिद्र दिखता हूँ यह मुझे क्यों परेशान या नाराज़ करेगी? यह सच का अक्स नहीं था, क्योंकि सच तो यह था कि मैं न सिर्फ़ अमीर था बल्कि हमेशा से था. दूसरे लोगों की राय मुझे तब तक नुक़सान नहीं पहुँचाती जब तक वह राय न सिर्फ़ ग़लत हो, बल्कि उस हक़ीक़त के उलट हो जो मैं जानता हूँ.

दूसरों की बातें तभी चुभती हैं जब वे सच के क़रीब हों और जब मैं ख़ुद उन्हीं बातों को लेकर असुरक्षित हूँ जो उनके शब्दों में है. एक जवान विदेशी पत्रकार के सवालों ने शक्तिशाली विदेश मंत्रालय को मजबूर कर दिया कि वह उसे और पूरी दुनिया को इस देश की महानता के बारे में भाषण दे. आज़ादी के बारे में एक सीधे-सादे सवाल के जवाब में देश की विरासत, संस्कृति और प्राचीन परंपराओं पर लेक्चर दिया गया. संवैधानिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों जिनमें सुप्रीम कोर्ट जाने का हक़ भी शामिल है, का भी ज़िक्र किया गया.

उस युवती ने एक ऐसा सवाल पूछा जो ज़्यादातर भारतीयों के ज़हन में नहीं आता. उसने पूछा कि भारतीयों को मौलिक अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा क्यों खटखटाना पड़ता है? हमारे विदेश मंत्रालय के रुतबेदार महाशय का जवाब था कि यह उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस है, यानी शायद उसे चुप हो जाना चाहिए.

फिर यहाँ का मीडिया भी कूद पड़ा. अपने पेशे की भाईचारगी के साथ नहीं, बल्कि सरकार के साथ क़तार में खड़े होकर उस रिपोर्टर पर बरसने के लिए कि उसने इतनी "साफ़ झूठी" बातें पूछने की हिम्मत कैसे की. इस पूरे तमाशे का मक़सद क्या था, यह किसी निष्पक्ष देखने वाले की समझ में नहीं आया. लेकिन इस रोग की जाँच करना दिलचस्प है.

हम अपने आचरण और मूल्यों पर सवाल उठने पर नाराज़ और परेशान क्यों होते हैं, अगर हम सच को लेकर आश्वस्त हैं? इसका जवाब सिर्फ़ यही हो सकता है कि हम दरअसल आश्वस्त नहीं हैं. और तब अगले सवाल उठते हैं: क्या यह इसलिए है कि हम सच के बावजूद असुरक्षित हैं? या इसलिए कि हम जो दावा कर रहे हैं वह सच है ही नहीं?

मान लीजिए कि पहली बात सही है. कि भारत और उसकी सरकार सच और तथ्यों के होते हुए भी असुरक्षित हैं कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, जहाँ व्यक्ति को आज़ादी है और राज्य दुर्भावनापूर्ण नहीं है. हम बस इस विषय पर सवाल पूछे जाने पर चिड़चिड़े हो जाते हैं. अगर ऐसा है, तो विदेशी पत्रकारों और पर्यवेक्षकों को सलाह है कि वे हमसे बच्चों की तरह पेश आएँ. हमारे सिर पर हाथ फेरें, बताएँ कि हम अच्छे बच्चे हैं, और कोई लॉलीपॉप थमा दें. कड़े सवाल पूछने से हमारे नख़रे शुरू हो जाएँगे, इससे बचना चाहिए.

यहाँ यह भी बताना ज़रूरी है कि दूसरे देश हमारी सरकार के साथ यही करते हैं. जब उन्हें हमसे कुछ चाहिए होता है, तो वे एक लॉलीपॉप (या कोई तमग़ा) पेश करते हैं, हमें अपना छोटा-सा भाषण पढ़ने की जगह देते हैं, और फिर हमसे जो चाहिए वह हासिल कर लेते हैं. जब इज़राइल को बताया जाता है कि वह इलाक़े में बदतमीज़ी कर रहा है और उसकी बेवक़ूफ़ाना जंग ने दुनिया को नुक़सान पहुँचाया है, तो बेंजामिन नेतन्याहू उस लोकतंत्र की जननी द्वारा दिए गए तमग़े को अपनी सफ़ाई में दिखाते रहे हैं. उस तमग़े की क़ीमत बहुत अच्छी निकली.

अब दूसरी संभावना पर आते हैं कि हम इसलिए असुरक्षित हैं क्योंकि हम जानते हैं कि हम जो दावा कर रहे हैं वह झूठ है. कि हम दरअसल उतने लोकतांत्रिक या आज़ादी-पसंद नहीं हैं जितना हम बताते हैं, और इसकी याद दिलाया जाना हमें परेशान और नाराज़ करता है.

अगर ऐसा है, तो इसका एक आसान हल है. इसका बाहरी दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है, और उन्हें अपना बर्ताव बदलने या हमसे बच्चों जैसा सुलूक करने की ज़रूरत नहीं. यह हल बस इतना है: सच बोलिए.

पिछले 12 सालों से भारत के राजनयिक नेहरूवादी खोल में काम कर रहे हैं. हम दुनिया को ख़ासतौर पर लोकतांत्रिक और विकसित देशों को यह बताते रहे हैं कि हम धर्मनिरपेक्ष, बहुलवादी और उदार हैं. कि हम मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं का सम्मान करते हैं. यह ज़ाहिर तौर पर झूठ है. और जब विदेशी मीडिया तथ्यों की जाँच करता है तो उसे पता चल जाता है कि यह झूठ है.

बस यह है कि भारत सरकार अब दोहरी ज़बान से बोलती है. वह दुनिया में जो कहती है और देश में जो करती है, वो दो अलग-अलग बातें हैं. वह दुनिया और उसके पत्रकारों के सामने बुलडोज़रों, भीड़ द्वारा हत्याओं, ज़मानत से इनकार, मतदाताओं के नाम काटे जाने और सामुदायिक बहिष्कारों का बखान नहीं करती — जो नए भारत की बुनियाद हैं. वह नेहरू और समावेश की भाषा बोलती है.

हम सबके लिए, दुनिया के लिए और उसके पत्रकारों के लिए यह आसान होता अगर हम यह झूठ बोलना बंद कर दें कि हम दरअसल हैं क्या. किसी ने एक चतुर शब्द-खेल में एक बार कहा था कि राजनयिक वे लोग होते हैं जिन्हें अपने देश के लिए विदेश में झूठ बोलने भेजा जाता है. लेकिन झूठ से जो बेचैनी और गुस्सा पैदा होता है, उसे देखते हुए हमें इस विकल्प पर ग़ौर करना चाहिए कि ईमानदारी ही सबसे बेहतर कूटनीतिक नीति हो सकती है.

आकार पटेल एक प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.

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