लिपुलेख के जरिए मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताई आपत्ति; कहा- लिपुलेख हमारा क्षेत्र; भारत बोला- दावा अनुचित

काठमांडू में बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार, जिसे बने अभी एक महीने से थोड़ा ही अधिक समय हुआ है, ने भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर आपत्ति जताई है. नेपाल ने भारत और चीन, दोनों से साफ-साफ कहा है कि लिपुलेख क्षेत्र उसका है.

भारत ने कहा है कि इस तरह के दावे "न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं", और वह नेपाल के साथ "रचनात्मक बातचीत" के लिए तैयार है.

शुभोजित रॉय और युबराज घिमिरे की रिपोर्ट के अनुसार, लिपुलेख दर्रा एक "विवादित" क्षेत्र रहा है और नेपाल अक्सर इस दर्रे के माध्यम से व्यापार और तीर्थयात्रा आयोजित करने के भारत और चीन के कदमों पर सवाल उठाता रहा है.

नेपाली विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा, "विदेश मंत्रालय ने विभिन्न मीडिया माध्यमों में कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर उठाए गए सवालों और चिंताओं पर ध्यान दिया है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह भारत और चीन के बीच नेपाली क्षेत्र लिपुलेख के माध्यम से आयोजित की जाएगी."

मंत्रालय ने आगे कहा, "नेपाल सरकार इस तथ्य पर पूरी तरह स्पष्ट और अडिग है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के बाद से नेपाल के अभिन्न अंग हैं."

नेपाली मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि उसने "कैलाश मानसरोवर यात्रा के संबंध में राजनयिक माध्यमों से भारत और चीन दोनों को अपने स्पष्ट रुख और चिंताओं से अवगत करा दिया है."

उसने यह भी कहा, "इससे पहले भी नेपाल सरकार लगातार भारत सरकार से आग्रह करती रही है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण या विस्तार, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी कोई भी गतिविधि न करे." नेपाली विदेश मंत्रालय का यह संदर्भ अगस्त 2025 में भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू करने की ओर था, जो कि सितंबर 2025 में 'जेनज़ी' विरोध प्रदर्शनों द्वारा सरकार गिरने से पहले हुआ था.

बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि "मित्र राष्ट्र चीन को भी आधिकारिक तौर पर इस तथ्य से अवगत करा दिया गया है कि लिपुलेख क्षेत्र नेपाली क्षेत्र है."

नेपाल के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार को कहा: "इस संबंध में भारत का रुख सुसंगत और स्पष्ट रहा है. लिपुलेख दर्रा 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक पुराना मार्ग रहा है और दशकों से इस मार्ग से यात्रा होती आ रही है. यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है."

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "क्षेत्रीय दावों के संबंध में भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं. क्षेत्रीय दावों का ऐसा एकपक्षीय और कृत्रिम विस्तार अस्वीकार्य है. भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है, जिसमें संवाद और कूटनीति के माध्यम से सीमा विवादों को सुलझाना भी शामिल है." तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सितंबर 2025 में अपनी चीन यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भी यह मुद्दा उठाया था.

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह "ऐतिहासिक संधियों, समझौतों, तथ्यों, मानचित्रों और साक्ष्यों के आधार पर भारत और नेपाल के बीच घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना के अनुरूप, कूटनीतिक माध्यमों से सीमा मुद्दे को हल करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है."

लिपुलेख दर्रा 2020 में भारत और नेपाल के बीच विवाद का विषय बना था, जब ओली सरकार ने वहां भारत द्वारा बुनियादी ढांचे और सड़क निर्माण पर आपत्ति जताई थी. इसके बाद नेपाल ने अपना नया मानचित्र प्रकाशित किया था, जिसमें लिपुलेख पर दावा किया गया था. भारत ने इन दावों को मई 2020 में और फिर अगस्त 2025 में खारिज कर दिया था.

निवर्तमान नेपाली राजदूत शंकर प्रसाद शर्मा ने पिछले शुक्रवार को 'द इंडियन एक्सप्रेस' के 'आइडिया एक्सचेंज' कार्यक्रम में कहा था : "सबसे पहले, एक बार जब सीमा जैसा मुद्दा संविधान में शामिल हो जाता है, तो सरकार चाहे कोई भी हो, उसे आसानी से बाहर नहीं निकाला जा सकता. 2022 में मेरे आने के बाद पहली बैठक के दौरान इस बारे में उच्च स्तरीय चर्चा हुई थी. यह सहमति बनी थी कि मौजूदा द्विपक्षीय तंत्र बातचीत शुरू करेगा. संवाद और कूटनीति ही सबसे अच्छा तरीका है. भारत और चीन के बीच व्यापार के संबंध में, नेपाल सरकार पहले ही विरोध जता चुकी है कि हमें इसमें शामिल किया जाना चाहिए. इस पर बातचीत होनी चाहिए क्योंकि वह हमारी भूमि है और इसे त्रिपक्षीय रूप से संबोधित किया जाना चाहिए." 

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