'मुस्कान या नफ़रत?': मेटा के एआई स्मार्ट ग्लास ने कैसे बदल दी एक ट्रांस व्यक्ति की ज़िंदगी
दिल्ली की 38 वर्षीय ग्राफिक इलस्ट्रेटर और कलाकार शुभनम की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के ऑनलाइन उत्पीड़न की नहीं, बल्कि एआई आधारित पहनने योग्य तकनीक, सोशल मीडिया एल्गोरिदम और निजता के अधिकार से जुड़े गंभीर सवालों की कहानी है. ट्रांस अधिकारों से जुड़े एक प्रदर्शन के दौरान शुभनम का वीडियो उनकी अनुमति के बिना मेटा के एआई-संचालित रे-बैन स्मार्ट ग्लास से रिकॉर्ड किया गया. कुछ ही घंटों में यह वीडियो इंस्टाग्राम पर वायरल हो गया और बाद में एक्स, यूट्यूब तथा अन्य प्लेटफॉर्म पर भी फैल गया.
‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, वीडियो के वायरल होते ही शुभनम ट्रांसफोबिक टिप्पणियों, मीम और एआई से तैयार की गई अपमानजनक तस्वीरों का निशाना बन गए. उनकी तस्वीरों को बदलकर उनका मजाक उड़ाया गया और उन्हें अपमानजनक कार्टून पात्रों से जोड़ा गया. शुभनम कहते हैं कि अब लोग उन्हें एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि इंटरनेट पर वायरल हुए मीम के रूप में पहचानते हैं. उनके मुताबिक, जहां भी जाते हैं, लोगों की नजरों में या तो व्यंग्य होता है या असहिष्णुता. इस घटना ने उनकी निजी जिंदगी और सार्वजनिक जीवन दोनों को प्रभावित किया है.
घटना के बाद कई लोगों ने इंस्टाग्राम पर वीडियो हटाने की शिकायत की, लेकिन शुरुआत में मेटा ने इसे अपनी सामुदायिक नीतियों का उल्लंघन नहीं माना. करीब तीन सप्ताह बाद वीडियो हटाया गया, लेकिन तब तक उसकी अनेक प्रतियां दूसरे प्लेटफॉर्म पर फैल चुकी थीं. शुभनम का कहना है कि इंटरनेट पर एक बार कोई सामग्री वायरल हो जाए तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है.
शुभनम के सामने कानूनी कार्रवाई भी आसान विकल्प नहीं थी. कुछ वकीलों और सामाजिक संगठनों ने साइबर शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने पुलिस के साथ अपने पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए इससे दूरी बनाई. उनका कहना है कि ट्रांस व्यक्ति होने के कारण पुलिस से संपर्क करने में उन्हें असुरक्षा महसूस होती है. इसके अलावा ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था भी ऐसे मामलों के लिए पर्याप्त नहीं है.
इस घटना ने भारत में एआई आधारित स्मार्ट ग्लास जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर बहस तेज कर दी है. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक अपार गुप्ता का कहना है कि किसी व्यक्ति का सार्वजनिक स्थान पर होना यह नहीं माना जा सकता कि उसने अपनी रिकॉर्डिंग की सहमति दे दी है. उनके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के पुट्टस्वामी फैसले ने स्पष्ट किया है कि निजता व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और यह केवल निजी स्थानों तक सीमित नहीं है. इसलिए बिना अनुमति रिकॉर्डिंग कर उसे करोड़ों लोगों तक पहुंचाना गंभीर निजता का उल्लंघन माना जाना चाहिए.
शुभनम का मानना है कि स्मार्ट ग्लास जैसी तकनीक केवल रिकॉर्डिंग का नया माध्यम नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन की बुनियादी समझ को बदल रही है. उनके अनुसार किसी सार्वजनिक स्थान पर मौजूद व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो बिना सहमति रिकॉर्ड कर उसे एआई डेटाबेस का हिस्सा बनाना और सोशल मीडिया पर प्रसारित करना समाज को निगरानी और असहमति पर नियंत्रण वाले दौर की ओर ले जा सकता है. इसी कारण उन्होंने इन स्मार्ट ग्लास को "परवर्ट ग्लास" कहा है.
फिलहाल भारत में एआई आधारित पहनने योग्य उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट कानूनी या नियामक ढांचा नहीं है. ऐसे में यह मामला केवल एक ट्रांस व्यक्ति के ऑनलाइन उत्पीड़न तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि तेजी से विकसित हो रही एआई तकनीक के दौर में निजता, सहमति और गरिमा जैसे मौलिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जाएगी. शुभनम अब मेटा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं, लेकिन उनका अनुभव यह दिखाता है कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ कानून और जवाबदेही की व्यवस्था अभी काफी पीछे है.

