अपूर्वानंद | आंदोलन अब सोनम वांगचुक और सीजेपी से भी बड़ा हो चुका है
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का कहना है कि सोनम वांगचुक का अनशन अब एक ऐसे जन आंदोलन में बदल चुका है, जो किसी एक व्यक्ति या संगठन की सीमाओं से बहुत आगे निकल गया है. दिल्ली, मुंबई, शांतिनिकेतन और जयपुर सहित देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर इसलिए उतरे क्योंकि उन्होंने एक अहंकारी सत्ता का वह चेहरा देखा, जो शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध को भी बलपूर्वक दबाने के लिए तैयार है.
जंतर-मंतर से पुलिस द्वारा अनशनरत सोनम वांगचुक को जबरन हटाकर अस्पताल ले जाने की घटना ने लोगों को गहराई से झकझोर दिया. इसे केवल वांगचुक के साथ हुआ व्यवहार नहीं, बल्कि हर नागरिक के सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला माना गया. लंबे समय से लोगों के भीतर जमा असंतोष इस घटना के बाद खुलकर सामने आ गया. अब आंदोलन केवल सरकार से बातचीत कराने या किसी प्रतिनिधि के आने का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि लोग स्वयं अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए यह बता रहे हैं कि लोकतंत्र में उनकी भी आवाज और भागीदारी है.
लेख में कहा गया है कि इस मोड़ पर सोनम वांगचुक को यह समझ लेना चाहिए था कि आंदोलन अब उनके व्यक्तिगत अनशन से आगे बढ़ चुका है. जब जनता स्वयं अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आई, तब उन्हें लोगों का आभार व्यक्त करते हुए अपना अनशन समाप्त कर देना चाहिए था. लेकिन उनकी ओर से यह संकेत मिला कि संघर्ष का केंद्र अब भी वही हैं.
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने कहा था कि वह तभी अनशन तोड़ेंगे जब राजनीतिक दलों के नेता आकर यह भरोसा देंगे कि संसद के मौजूदा सत्र में शिक्षा के मुद्दे पर चर्चा होगी. लेख में इस मांग पर सवाल उठाया गया है. इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि "राजनीतिक नेताओं" से आशय किन दलों से है. क्या इसमें भाजपा भी शामिल है या केवल विपक्ष. इस तरह की नई शर्त से आंदोलन की मूल मांग बदलती हुई दिखाई देती है और अनशन की नैतिक शक्ति भी कमजोर पड़ती है.
जब यह नई शर्त रखी गई, तब जंतर-मंतर पर तीन छात्र 22 दिनों से अधिक समय से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनशन पर बैठे थे. अभिजीत दीपके भी वांगचुक के समर्थन में आमरण अनशन कर रहे थे. लेख में सवाल उठाया गया है कि क्या इन साथियों से इस नई रणनीति पर कोई सलाह ली गई थी या यह फैसला अकेले ही कर लिया गया.
वांगचुक ने जब अनशन शुरू किया था, तब उनकी मांग बिल्कुल स्पष्ट थी. उनका कहना था कि नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी तय करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए. यही मांग कॉकरोच जनता पार्टी की भी थी. लेकिन बाद में संसद में चर्चा कराने की नई शर्त जोड़ने से आंदोलन का मूल उद्देश्य धुंधला पड़ गया.
अनशन के दौरान विपक्षी दलों ने वांगचुक से मुलाकात कर उन्हें समझाने की कोशिश की कि सरकार के इस रवैये को देखते हुए मंत्री का इस्तीफा या सार्थक बातचीत की संभावना बहुत कम है. उनका कहना था कि लोकतंत्र और शिक्षा व्यवस्था की लड़ाई लंबी है, इसलिए उन्हें अपना जीवन खतरे में नहीं डालना चाहिए. इसके बावजूद वांगचुक ने लोगों से संसद मार्च में शामिल होने का आह्वान किया.
20 जुलाई के प्रस्तावित संसद मार्च से पहले ही दिल्ली पुलिस ने अदालत के निर्देशों का हवाला देते हुए वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया. सरकार ने राजनीतिक विरोध का राजनीतिक जवाब देने के बजाय प्रशासनिक बल का इस्तेमाल किया. लेकिन इसका उल्टा असर हुआ. जिन दिनों वांगचुक अनशन पर थे, तब तक आंदोलन सीमित था, जबकि उन्हें हटाए जाने के बाद हजारों लोग जंतर-मंतर पहुंच गए और देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.
लेख के मुताबिक, अब यह आंदोलन केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रह गया है. यह नागरिकों के सम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की लड़ाई बन चुका है. सरकार ने वांगचुक को हटाकर एक बड़ी राजनीतिक भूल की, क्योंकि लोगों की स्मृति में अस्पताल ले जाए जा रहे एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक निहत्थे नागरिक पर राज्य की ताकत के इस्तेमाल की तस्वीर दर्ज हो गई.
अंत में अपूर्वानंद लिखते हैं कि यह आंदोलन अब सोनम वांगचुक से भी बड़ा हो चुका है. जनता ने अपनी सामूहिक शक्ति और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति नई चेतना दिखाई है. उनका मानना है कि वांगचुक को इस जनजागरण का सम्मान करते हुए अपना अनशन समाप्त कर देना चाहिए था. यदि वे स्वयं को लोकतांत्रिक संस्थाओं से ऊपर रखकर राजनीतिक दलों से अपने सामने उपस्थित होने की शर्त रखते हैं, तो इससे उनकी नैतिक प्रतिष्ठा मजबूत होने के बजाय कमजोर हो सकती है. इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि लोगों ने अपनी सामूहिक आवाज फिर से खोजनी शुरू कर दी है और यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी उम्मीद है.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर, लेखक और राजनीतिक-समाजिक मुद्दों पर टिप्पणीकार हैं. यह ‘द वायर’ में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेज़ी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

