‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार राजेश चतुर्वेदी के साथ पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी) को मिलने वाले भारी चंदे, चुनावी वित्तपोषण में पारदर्शिता की कमी और इसके संभावित दुरुपयोग पर चर्चा की.
राजेश चतुर्वेदी के अनुसार, देश में दो हजार से अधिक ऐसे राजनीतिक दल हैं, जिन्हें चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन उनके खातों में करोड़ों रुपये का चंदा आ रहा है. उन्होंने सवाल उठाया कि जिन दलों का चुनावी राजनीति में कोई खास प्रभाव नहीं है और जिन्हें बेहद कम वोट मिलते हैं, उन्हें इतनी बड़ी रकम कौन और किस उद्देश्य से दे रहा है? उनके मुताबिक, यह मामला केवल राजनीतिक चंदे तक सीमित नहीं है, बल्कि चंदे के स्रोत और उसके इस्तेमाल की जांच से भी जुड़ा है.
चतुर्वेदी ने राजस्थान के भीलवाड़ा का उदाहरण देते हुए बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में विजय कुमार सोनी की पार्टी को केवल 1,347 वोट मिले, जबकि उसे करीब 170 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ. उन्होंने सवाल किया कि बेहद कम जनसमर्थन हासिल करने वाली किसी पार्टी को इतनी बड़ी राशि देने के पीछे दानदाताओं का क्या उद्देश्य हो सकता है. उन्होंने गुजरात की कुछ छोटी पार्टियों का भी उल्लेख किया, जिन्हें सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा मिला है. उनके अनुसार, इन दलों के वित्तीय लेनदेन और उन्हें चंदा देने वालों की पहचान की पड़ताल जरूरी है.
बातचीत में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि देश में दो हजार से अधिक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं. इनमें से बड़ी संख्या ने अपनी आय और चंदे का विवरण सार्वजनिक नहीं किया है. चतुर्वेदी ने कहा कि जब राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन का पूरा ब्योरा उपलब्ध नहीं होता, तब चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
उन्होंने आशंका जताई कि कुछ दलों का इस्तेमाल धन के संदिग्ध लेनदेन को वैध रूप देने या हवाला जैसी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, उन्होंने इसे जांच का विषय बताते हुए कहा कि बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा. उनके मुताबिक, यह पता लगाना जरूरी है कि पैसा किसने दिया, किस उद्देश्य से दिया और उसका इस्तेमाल कहां किया गया.
चतुर्वेदी ने चुनाव आयोग और आयकर विभाग की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों की आय, चंदे के स्रोत और खर्च का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक होना चाहिए. उनके अनुसार, चुनावी व्यवस्था का इस्तेमाल धन के संदिग्ध लेनदेन के लिए नहीं होने देना चाहिए.
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