रिबॉर्न मनीष | सत्ता के भीतर के विरोधाभास और जनता का दबाव, दोनों साथ बढ़ रहे हैं.

'हरकारा डीप डाइव' के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं रिबॉर्न मनीष के साथ स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण, ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव और सत्ता समर्थित भीड़ की भूमिका पर चर्चा हुई. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह रहा कि क्या किसी व्यक्ति की हिंसक गतिविधि को एक बड़े राजनीतिक-सामाजिक पैटर्न के संदर्भ में देखा जाना चाहिए और क्या सत्ता के करीब होने का भरोसा कानून के प्रति डर को खत्म कर रहा है.

रिबॉर्न मनीष ने फासीवाद की संरचना को समझाते हुए कहा कि इसमें सत्ता केवल सरकारी संस्थाओं के जरिए काम नहीं करती, बल्कि ऐसे गैर-राज्य तत्वों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो विरोधियों को डराने और दबाने का काम करते हैं. उनके मुताबिक, संवैधानिक संस्थाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, इसलिए सत्ता के समानांतर ऐसी ताकतों का इस्तेमाल राजनीतिक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है.

इसी संदर्भ में उन्होंने स्वतंत्र भारद्वाज जैसे मामलों को देखा. उनका तर्क था कि ऐसे लोगों को जब यह भरोसा हो जाता है कि सत्ता, पुलिस या प्रशासन उनके साथ खड़ा है, तो उनके भीतर कानून का भय कम हो जाता है. उन्होंने सोशल मीडिया पर इस्तेमाल होने वाले ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’ जैसे शब्दों को भी इसी तरह के राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बताया, जिनके जरिए विरोधियों को पहले एक पहचान दी जाती है और फिर उनके खिलाफ सामाजिक माहौल तैयार किया जाता है.

बातचीत का एक अहम हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सिविल डिफेंस’ और ‘दिमागी नक्सल’ संबंधी बयानों पर केंद्रित रहा. रिबॉर्न मनीष ने इसे चिंताजनक बताते हुए कहा कि पारंपरिक सिविल डिफेंस का उद्देश्य बाहरी हमले या आपदा के समय नागरिकों की मदद करना था, लेकिन अगर देश के भीतर मौजूद नागरिकों को ही ‘दुश्मन’ की तरह देखने की सोच विकसित होती है, तो इसके गंभीर लोकतांत्रिक परिणाम हो सकते हैं.

अग्निवीर योजना को लेकर भी सवाल उठाया गया. रिबॉर्न मनीष ने कहा कि चार साल की सैन्य सेवा पूरी करने के बाद बड़ी संख्या में प्रशिक्षित युवाओं के सामने रोजगार का सवाल होगा. उनका मानना था कि यदि ऐसे युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर नहीं बने, तो राजनीतिक या वैचारिक संगठन उनकी ऊर्जा और प्रशिक्षण का इस्तेमाल अपने हित में कर सकते हैं.

इसके बाद चर्चा उमर खालिद, सिद्दीकी कप्पन और अन्य मामलों तक पहुंची. रिबॉर्न मनीष ने लंबे समय तक जेल में रहने और बिना सुनवाई के दंड जैसी स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि इससे देश में दो अलग-अलग तरह की व्यवस्थाओं का आभास होता है. एक तरफ सरकार के खिलाफ खड़े लोगों के लिए कानून का कठोर इस्तेमाल दिखाई देता है, जबकि दूसरी तरफ सत्ता समर्थक माने जाने वाले लोगों के प्रति नरमी के सवाल उठते हैं.

जंतर-मंतर की घटना और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के कमजोर पड़ने पर भी चर्चा हुई. रिबॉर्न मनीष के अनुसार, नई पीढ़ी रोजगार, शिक्षा, शांति और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा को ज्यादा महत्व दे रही है. मोबाइल, इंटरनेट और एआई के दौर में राजनीतिक नैरेटिव को तुरंत जांच लेने वाली यह पीढ़ी धार्मिक ध्रुवीकरण की पुरानी राजनीति से पहले की तुलना में कम प्रभावित हो सकती है.

उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में दोहराए गए राजनीतिक पैटर्न अब लोगों को अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं. उनके मुताबिक, लंबे समय से दबा सामाजिक असंतोष अलग-अलग जगहों पर सामने आ रहा है और आने वाले समय में इससे नए सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व का उभार हो सकता है.

अंत में रिबॉर्न मनीष ने उम्मीद जताई कि दमन और असंतोष के बीच समाज में बदलाव की नई जमीन तैयार हो रही है. निधीश त्यागी ने भी स्वतंत्र भारद्वाज को सिर्फ एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में विकसित हुई एक प्रवृत्ति के संदर्भ में देखने की जरूरत बताई. बातचीत इस सवाल के साथ खत्म हुई कि संविधान, संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं के सामने खड़ी चुनौतियों से समाज आगे किस तरह निपटेगा.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब पर सुन सकते हैं.

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