मणिपुर संकट एक राजनीतिक मुद्दा है, सुरक्षा का नहीं: कुकी-जो महिला मंच,  राष्ट्रपति शासन की मांग

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को फिर से लागू करने की मांग करते हुए, कुकी-जो महिला फोरम ने बुधवार (21 अक्टूबर, 2026) को कहा कि राज्य का संकट एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा है, जिसे केवल अधिक सुरक्षा बल तैनात करके हल नहीं किया जा सकता है. समूह ने यह भी जोर देकर कहा कि एक अलग प्रशासन की उसकी मांग अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है.

‘पीटीआई’ के अनुसार, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुकी-जो काउंसिल के प्रवक्ता गिन्ज़ा वुअलज़ोंग ने कहा, "हमारी राजनीतिक मांग सिर्फ एक राजनीतिक मांग नहीं है. यह हमारे अस्तित्व का सवाल है. हम जीवित रहना चाहते हैं."

फोरम की यह मांग राज्य में हुई ताजा हिंसा के बीच आई है, जहां मंगलवार को कांगपोकपी जिले के एक जंगली इलाके में बांस के कोपल (बांस की कोंपले) इकट्ठा करते समय अज्ञात बंदूकधारियों ने 45 वर्षीय एक कुकी-जो व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी. उनका साथी बाल-बाल बच गया.

यह हत्या एक पड़ोसी इलाके में घात लगाकर किए गए हमले में तीन मेइती ग्रामीणों के मारे जाने के एक दिन बाद हुई.

फोरम ने आरोप लगाया कि मार्च के बाद से, दो गर्भवती महिलाओं सहित कम से कम 32 कुकी-जो नागरिकों को सशस्त्र नागा समूहों द्वारा मार दिया गया है. इसने यह भी दावा किया कि 14 कुकी-जो गांवों में लगभग 55 घर जला दिए गए.

वुअलज़ोंग ने केंद्र से राजनीतिक बातचीत शुरू करने का आग्रह करते हुए कहा, "मणिपुर में स्थिति कोई सुरक्षा का मुद्दा नहीं है. भारत सरकार मणिपुर में ढेरों सुरक्षा बल भेजकर यह सोचकर इसे हल करने की कोशिश कर रही है कि यह सुरक्षा का मुद्दा है. तीन साल तक कुछ भी काम नहीं आया क्योंकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है."

फोरम ने एक विधायिका के साथ केंद्र शासित प्रदेश के रूप में कुकी-जो लोगों के लिए एक अलग प्रशासन की मांग की, और जोर देकर कहा कि समुदाय भारत से अलग होने की मांग नहीं करता है, बल्कि एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था चाहता है जो उनकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करे.

वक्ताओं ने कहा कि समुदाय फरवरी 2025 में लगाए गए और फरवरी 2026 में हटाए गए राष्ट्रपति शासन के दौरान, युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली चुनी हुई सरकार की तुलना में अधिक सुरक्षित महसूस करता था.

वुअलज़ोंग ने राष्ट्रपति शासन को फिर से लागू करने की मांग करते हुए कहा, "राष्ट्रपति शासन के दौरान, हमने हिंसा में अपनी जान नहीं गंवाई."

फोरम ने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इसक-मुइवा), यानी एनएससीएन-आईएम से जुड़े संघर्ष विराम समझौते के कथित उल्लंघनों की जांच की भी मांग की, और इस संगठन तथा ज़ेलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट (काम्सन) से जुड़े हमलों के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की.

कमजोंग जिले के चासाद गांव में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए, वक्ताओं ने आरोप लगाया कि इसे बार-बार निशाना बनाया गया है.

उन्होंने कहा कि 17 अक्टूबर को हुए एक हमले में सेइखोहाओ हाओकिप की जान चली गई, और बुधवार सुबह एक कुकी-जो गांव को आग के हवाले कर दिया गया.

फोरम ने आरोप लगाया कि कांगपोकपी, उखरूल और कमजोंग जिलों के कुछ हिस्सों में कुकी-जो निवासियों को आर्थिक नाकाबंदी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भोजन, दवाइयों, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो रही है. बाजारों तक पहुंच पर प्रतिबंधों ने कीमतों को बढ़ा दिया है, कुछ क्षेत्रों में एलपीजी रसोई गैस सिलेंडर की कीमत लगभग 3,000 रुपये है.

फोरम ने स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच पर भी चिंता जताई, और 15 जून को कांगपोकपी जिले के लेइलोन मुनलुई गांव में एक हमले में गंभीर रूप से घायल हुए तीन कुकी-जो युवाओं के मामले का हवाला दिया.

युवाओं को शुरू में इम्फाल में रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था, लेकिन जातीय आधार पर उनके इलाज के विरोध के बाद बाद में उन्हें चुराचांदपुर जिला अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया.

फोरम ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) पर चुनिंदा रूप से कुकी-जो नागरिकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया और इसमें शामिल समुदाय या संगठन की परवाह किए बिना हिंसा के सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की.

बता दें कि मणिपुर में घाटी आधारित मैतेई और पहाड़ी आधारित कुकी समुदायों के बीच मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा में कम से कम 306 लोगों की जान चली गई है, जबकि 49 लोग अभी भी लापता हैं और हजारों लोग बेघर हो गए हैं.

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