निहा मसीह | जमुई से लेकर दिल्ली तक, यौन हमले से सुरक्षा का बोझ महिलाओं पर नहीं डाला जा सकता

‘द गार्डियन’ में निहा मसीह लिखती हैं कि एक भारतीय महिला होने के नाते, मैं अक्सर खुद को चिंता और गुस्से के बीच झूलता हुआ पाती हूँ.  चिंता इस बात की कि सुरक्षित कैसे रहा जाए—पहनावे से लेकर आने-जाने के रास्तों तक का मानसिक हिसाब लगाना. और गुस्सा इस व्यवस्था की बेतुकी स्थिति और रोज पढ़ने में आने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर.

हाल ही में दो घटनाओं ने देश का ध्यान खींचा. पहली, बिहार के जमुई में दो किशोरियों से छेड़छाड़ का वीडियो और दूसरी, दिल्ली में 17 वर्षीय लड़की से पार्क में कथित सामूहिक दुष्कर्म. इन घटनाओं के बाद वही पुराना ढर्रा दोहराया गया—महिलाओं की आवाजाही पर पाबंदियां बढ़ा दी गईं. पार्कों के समय सीमित कर दिए गए और लेडी श्रीराम कॉलेज (एलएसआर) ने कक्षाएं ऑनलाइन कर दीं.

यौन हिंसा की घटनाएं वायरल होने के बाद उसका खामियाजा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है. हमसे कहा जाता है कि जल्दी घर लौटें, शालीन कपड़े पहनें और खास जगहों से बचें. सुरक्षा का पूरा बोझ हमारे ही कंधों पर डाल दिया जाता है. नारीवादी कार्यकर्ता कविता कृष्णन इसे "भारत में लैंगिक हिंसा का सबसे व्यापक रूप" मानती हैं.

पितृसत्तात्मक सोच और पुरुषों के सामाजिक संस्कारों पर सवाल उठाने के बजाय समाज महिलाओं से सार्वजनिक स्थानों को छोड़ने की उम्मीद करता है. लेखिका मीना कंडासामी कहती हैं कि महिलाओं पर पाबंदी लगाना आसान है क्योंकि इसमें कोई संस्थागत लागत नहीं आती और परिजनों को लगता है कि कार्रवाई हो रही है. उनके अनुसार, "इसका लक्षित दर्शक वे महिलाएं नहीं हैं जो असुरक्षित हैं, बल्कि बाकी समाज है."

यह दमन तीन स्तरों पर होता है:

1. परिवार: जहाँ सुरक्षा के नाम पर कर्फ्यू और ड्रेस कोड थोपे जाते हैं.

2. समुदाय: जहाँ मॉरल पुलिसिंग, पीड़िता को दोषी ठहराने की मानसिकता हावी रहती है.

3. प्रशासन: जो पार्कों को बंद करके समस्या का हल खोजता है, जबकि उत्पीड़न समय या रोशनी देखकर नहीं होता.

कंडासामी के अनुसार, यह व्यवस्था महिला को नागरिक या वयस्क मानने के बजाय एक कीमती वस्तु मानती है, जिसे तिजोरी में बंद रखना पड़ता है.

तथापि, महिलाएं अब इसका विरोध कर रही हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं सड़कों पर उतरकर बेहतर स्ट्रीट लाइट, शौचालय और सुरक्षा की मांग कर रही हैं. 20 वर्षीय छात्रा वेदायना का कहना है, "यदि आप सुरक्षा उपाय नहीं कर सकते, तो इसका मतलब है कि पार्क केवल पुरुषों के लिए हैं."

आंकड़े भी इस भयानक स्थिति की पुष्टि करते हैं. एक हालिया सर्वे के अनुसार, दिल्ली में 65% और बेंगलुरु में 29% महिलाओं ने पिछले साल सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न झेला. 2024 के एक अध्ययन के अनुसार महिलाओं की आवाजाही केवल पढ़ाई या काम तक सीमित है; आनंद के लिए आवाजाही न के बराबर है.

इस गंभीर स्थिति के बावजूद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं निराश करती हैं.  बिहार की एक मंत्री ने छेड़छाड़ पर कहा कि "मॉरल पुलिसिंग शालीनता से होनी चाहिए", वहीं दूसरे मंत्री ने इसे "छिटपुट घटना" करार दिया.  राजनीति में जवाबदेही की कमी का आलम यह है कि एडीआर के अनुसार 2024 में जीते 15 सांसदों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज थे.

वेदायना जैसी युवा छात्राएं मानती हैं कि बदलाव की शुरुआत घरों में लड़कों के सही पालन-पोषण और पितृसत्ता के खिलाफ खुलकर बोलने से ही संभव होगी.

Previous
Previous

अरुणाचल प्रदेश: भारत-म्यांमार सीमा के पास उग्रवादी हमले में असम राइफल्स का एक जवान शहीद, चार घायल

Next
Next

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से निलंबित करने की याचिका पर सुनवाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट