एसआईआर की दोहरी भूमिका से सरकारी स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित, शिक्षकों की कमी से शिक्षा पर पड़ी मार
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बावजूद कि शिक्षकों को स्कूल के समय के दौरान गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए, मतदाता सूची पुनरीक्षण और जनगणना जैसे कार्यों में शिक्षकों की तैनाती के कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षण और सीखने की गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.
बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षकों, जिन्हें महज एक महीने पहले ही बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) बनाया गया था, द्वारा एसआईआर गतिविधियों की एक श्रृंखला पूरी करने के बाद, अब चुनाव आयोग चाहता है कि वे छूटे हुए मतदाताओं को शामिल करने के लिए एक विशेष अभियान चलाएं.
1 अक्टूबर को, आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को इस विशेष अभियान के संबंध में पत्र लिखा. चुनाव आयोग द्वारा सभी सीईओ को भेजे गए पत्र में कहा गया, "मतदाता नामांकन एक सतत प्रक्रिया है और कोई भी व्यक्ति जो अभी तक मतदाता सूची में नामांकित नहीं है या जिसका नाम हटा दिया गया है, वह किसी भी समय नामांकन के लिए आवेदन कर सकता है. इस विशेष अभियान का उद्देश्य ऐसे मतदाताओं की पहचान करना और उन्हें सुविधा प्रदान करना है."
पत्र के अनुसार, बीएलओ वर्तमान मतदाता सूची की तुलना एसआईआर से पहले की सूची से करेंगे और उन मतदाताओं की एक सूची तैयार करेंगे जिनके नाम एसआईआर से पहले की सूची में थे लेकिन वर्तमान सूची में शामिल नहीं हैं. वर्तमान सूची में जिन मतदाताओं के नाम गायब हैं, उन्हें ढूंढने के लिए बीएलओ घर-घर जाकर सर्वेक्षण करेंगे. यह प्रक्रिया एक महीने में पूरी की जाएगी.
राज्यों ने स्कूलों और बीएलओ के रूप में कार्य करने वाले शिक्षकों को इस अभियान के बारे में लिखा है. ओडिशा के कटक स्थित एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने बताया कि पुनरीक्षण प्रक्रिया पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई थी, जब 2002 की एसआईआर सूची के साथ मतदाताओं की मैपिंग की गई थी. इस साल मार्च से पुनरीक्षण कार्य में तेजी आई जब शिक्षकों ने पुनरीक्षण को पूरा करने के लिए जी-तोड़ काम किया.
शिक्षक ने कहा, "हमारे स्कूल में छह शिक्षक हैं. दो शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी सौंपी गई है और तीन शिक्षकों को जनगणना ड्यूटी मिली है. बीएलओ के रूप में, हम मार्च से अगस्त तक कोई भी शिक्षण कार्य नहीं कर सके. अब, हमें हटाए गए प्रत्येक व्यक्ति का सत्यापन करने के लिए घर-घर जाकर सर्वेक्षण करना होगा. इसका मतलब है कि हम कोई भी क्लास (कक्षा) नहीं ले सकते."
जनगणना ड्यूटी पर तैनात शिक्षकों को भी मकान सूचीकरण गतिविधियों में व्यस्त रहने के दौरान पढ़ाई को दरकिनार करना पड़ा. जनगणना का दूसरा चरण जल्द ही शुरू होने वाला है, जब वे प्रश्नों के माध्यम से आंकड़े एकत्र करने के लिए घरों का दौरा करेंगे.
शिक्षक ने आगे कहा, "जिला प्रशासन का कहना है कि चुनाव और जनगणना के काम में कोई समझौता नहीं किया जा सकता. उनका कहना है कि अन्य शिक्षक अतिरिक्त (शिक्षण) कार्यभार को संभाल लेंगे. लेकिन स्कूल में शिक्षक ही कितने हैं? सभी स्कूलों में कर्मचारियों की कमी है. शिक्षण गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं."
जैसा कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को एसआईआर ड्यूटी सौंपी गई थी, शिक्षाविद राजेश कुमार गोगना और अशोक अग्रवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि इस तरह की तैनाती से गरीब बच्चों की पढ़ाई का भारी नुकसान हो रहा है.
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने 28 जुलाई को उच्चतम न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए एक आदेश पारित किया, जिसमें चुनाव आयोग के अधिकार और बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के अपने दायित्व को पूरा करने के राज्य के जनादेश के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था.
उच्च न्यायालय के आदेश में कहा गया, "चुनाव से जुड़े कर्तव्यों में शिक्षकों को शामिल करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग की शक्ति के संबंध में कोई विवाद नहीं है. हालांकि, जैसा कि ऊपर देखा गया है, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 27 के जनादेश को ओझल नहीं किया जा सकता है."
अग्रवाल ने कहा, "राज्यों में, चुनाव अधिकारी और स्थानीय सरकारें शिक्षण गतिविधियों में व्यवधान की परवाह नहीं करती हैं क्योंकि सरकारी स्कूलों में केवल गरीबों के बच्चों का ही दाखिला होता है. उन पर यह दबाव होना चाहिए कि वे अपनी सुविधा के अनुसार गैर-शिक्षण कर्मचारियों या शिक्षकों को इसमें लगाएं."

