जम्मू में म्यांमार से जान बचाकर आए रोहिंग्या शरणार्थियों के घर फिर उजड़े, 350 परिवार बेघर
‘आर्टिकल 14’ में बशारत अमीन की रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू के नरवाल इलाके में करीब 350 रोहिंग्या परिवारों को उनके अस्थायी घरों से बेदखल कर दिया गया. प्रशासन ने जमीन मालिकों द्वारा कृषि भूमि का गैर-कृषि इस्तेमाल किए जाने को कार्रवाई का आधार बताया. लेकिन इस कार्रवाई ने उन परिवारों की जिंदगी फिर उजाड़ दी, जिन्होंने म्यांमार में जातीय हिंसा से भागकर भारत में 14 से 18 वर्षों के दौरान अपना घर और आजीविका खड़ी की थी.
29 वर्षीय मोहम्मद आरिफ का परिवार 2012 में म्यांमार के रखाइन राज्य में हिंसा के डर से भारत आया था. आरिफ के मुताबिक, उनके गांव में सेना की कार्रवाई के दौरान उनके सामने पांच लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिनमें उनका चचेरा भाई भी शामिल था. परिवार ने अपनी जमीन, मवेशी और दुकानें बेचकर देश छोड़ दिया. बांग्लादेश के रास्ते भारत पहुंचने के बाद वे जम्मू के नरवाल इलाके में बस गए. यहां आरिफ ने सब्जियों और रोजमर्रा के सामान की छोटी दुकान शुरू की, शादी की और उनके तीन बच्चे हुए.
सितंबर 2026 में मकान मालिक ने उन्हें घर खाली करने का नोटिस दिया. अगले महीने पांच दिनों के भीतर आरिफ को अपना घर और दुकान दोनों तोड़ने पड़े. उनके जैसे करीब 350 परिवार पांच भूखंडों पर बनी झुग्गियों में रहते थे. 11 अगस्त 2026 को जम्मू के जिला कलेक्टर की अदालत ने जम्मू-कश्मीर भूमि राजस्व अधिनियम, 1996 की धारा 133-ए के तहत नोटिस जारी किया था. इसमें सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना कृषि भूमि पर झोपड़ियां और अन्य ढांचे बनाए जाने का आरोप लगाया गया था.
उजड़ता बाजार और दोबारा बेघर होने का डर
13 सितंबर तक नरवाल के किरयानी तालाब इलाके की सड़क पर रोहिंग्या परिवार मछली, सब्जियां और अन्य सामान बेचते थे. लेकिन 18 सितंबर को ‘आर्टिकल 14’ की टीम ने वहां पहुंचकर पाया कि बाजार लगभग खाली हो चुका था. परिवार तिरपाल, लकड़ी और टिन की चादरें समेट रहे थे. कुछ लोग अपना सामान कहीं और ले जा रहे थे, जबकि कई परिवारों के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी.
63 वर्षीय मौलवी यूनुस 2008 में म्यांमार से पत्नी और तीन बच्चों के साथ भागकर भारत आए थे. उन्होंने बताया कि सेना ने उनके गांव पर हमला किया, 20 लोगों की हत्या की और 13 घरों में आग लगा दी. जम्मू में उन्होंने दिहाड़ी मजदूरी और मस्जिद में धार्मिक सेवा के जरिए परिवार का पालन-पोषण किया. अब उनका घर भी टूट चुका है. उन्हें डर है कि दूसरी जगह जाने पर भी उन्हें फिर बेदखल कर दिया जाएगा.
सुरक्षा के दावे और शरणार्थियों की स्थिति
स्थानीय भाजपा विधायक विक्रम रंधावा ने ‘आर्टिकल 14’ से बातचीत में कहा कि रोहिंग्या शरणार्थियों को जम्मू में रहने नहीं दिया जाना चाहिए. उन्होंने कार्रवाई को केंद्र सरकार की नीति से जोड़ते हुए जनसांख्यिकीय बदलाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का भी उल्लेख किया. रंधावा ने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ अपराधों की शिकायतों का दावा किया. हालांकि, रिपोर्ट में इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि प्रस्तुत नहीं की गई है.
केंद्र सरकार ने पहले भी रोहिंग्या समुदाय को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है. सितंबर 2022 में केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था कि भारत में रोहिंग्या शरणार्थी राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं. दूसरी ओर, शरणार्थियों का कहना है कि वे स्थायी रूप से भारत में बसने नहीं आए हैं, बल्कि म्यांमार में असुरक्षित परिस्थितियों के कारण यहां शरण लेने को मजबूर हुए हैं.
यूनुस ने बताया कि उनके परिवार के पास संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के कार्ड हैं. उन्होंने कहा कि भारत का शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता न होना शरणार्थियों को सम्मान के साथ जीने के बुनियादी अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं होना चाहिए.
रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय कानून के नॉन-रिफाउलमेंट सिद्धांत का भी उल्लेख है, जिसके तहत शरणार्थियों को ऐसे स्थान पर वापस नहीं भेजा जाना चाहिए जहां उन्हें उत्पीड़न या गंभीर नुकसान का खतरा हो. मानवाधिकार संगठन फोर्टिफाई राइट्स के निदेशक जॉन क्विनले ने अधिकारियों से विस्थापित परिवारों को आश्रय और बुनियादी सहायता देने तथा यूएनएचसीआर और राहत संगठनों के साथ काम करने की अपील की.
आजीविका, शिक्षा और बच्चों का भविष्य
बेदखली से परिवारों की कमाई भी छिन गई है. मोहम्मद आलम की मछली की दुकान उजड़ गई, जबकि आरिफ को पिछले साल 16,000 रुपये में खरीदा रेफ्रिजरेटर आधी कीमत पर बेचना पड़ रहा है. कई परिवारों ने बताया कि वे सामान औने-पौने दाम पर बेचकर कुछ दिन गुजारने की कोशिश कर रहे हैं.
बच्चों की शिक्षा पर भी संकट गहरा गया है. समुदाय के कुछ लोग अस्थायी रूप से बच्चों को पढ़ाते थे, लेकिन घर और बस्तियां उजड़ने से यह व्यवस्था भी प्रभावित हुई है. 28 वर्षीय रबीउल आलम ने बताया कि उनका परिवार कई दिनों से खुले आसमान के नीचे सो रहा है और खाने तक की व्यवस्था नहीं है. बारिश में उनके बच्चों को बचाने के लिए भी कोई छत नहीं थी.
रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार में हिंसा से जान बचाकर आए इन परिवारों ने भारत में वर्षों तक मेहनत करके घर, दुकान और पारिवारिक जीवन बनाया था. अब बेदखली ने उन्हें फिर उसी अनिश्चितता में धकेल दिया है, जिससे बचने के लिए उन्होंने अपना देश छोड़ा था.

