राहुल देव | सरकार इस आंदोलन की शक्ति को भांप नहीं पाई
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार और संपादक राहुल देव के साथ जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन, सरकार और पुलिस के रवैये, आरएसएस की नई पीढ़ी को लेकर सोच और देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा पर विस्तार से बातचीत की.
राहुल देव के मुताबिक जंतर-मंतर का आंदोलन कई मायनों में अभूतपूर्व था. इसमें शामिल युवक-युवतियों की भाषा, विरोध के तरीके और आंदोलन का स्वरूप पुराने आंदोलनों से अलग था. उनका मानना है कि इसके पीछे किसी बड़े राजनीतिक दल या संगठन की संगठित ताकत दिखाई नहीं दी. उन्होंने इसकी तुलना अन्ना आंदोलन से करते हुए कहा कि उस समय व्यवस्थाओं के पीछे आरएसएस से जुड़े लोगों की मौजूदगी दिखती थी, जबकि इस आंदोलन में ऐसी संगठित व्यवस्था नहीं थी.
राहुल देव ने कहा, "ये एक शुद्ध स्वतःस्फूर्त आंदोलन था." उनके अनुसार पेपर लीक से शुरू हुआ आक्रोश जल्द ही शिक्षा व्यवस्था, रोजगार की कमी और युवाओं के भविष्य से जुड़े बड़े सवालों में बदल गया. वर्षों से जमा नाराजगी को अभिव्यक्ति का मौका मिला और आंदोलन इतनी तेजी से ताकतवर हुआ कि एक महीने के भीतर एक केंद्रीय मंत्री को जाना पड़ा.
बातचीत में युवाओं के प्रति सरकार के रवैये और पुलिस कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठे. राहुल देव ने कहा कि सरकार आंदोलन की व्यापकता और युवाओं की भावनाओं को समय रहते समझ नहीं सकी. उनके मुताबिक, "सरकार की उदासीनता, असंवेदनशीलता... और उनका अपना अहंकार" हालात को लगातार बिगाड़ता गया. उनका तर्क था कि शुरुआत में संवाद और सहानुभूति का रुख अपनाया जाता तो परिस्थितियां अलग हो सकती थीं.
चर्चा का दूसरा बड़ा हिस्सा आरएसएस और नई पीढ़ी के बीच वैचारिक दूरी पर केंद्रित रहा. राहुल देव ने कहा, "इस पीढ़ी से कोई संपर्क नहीं है, कोई संबंध नहीं है और इस पीढ़ी के बारे में कोई समझ नहीं." उनके मुताबिक समस्या सिर्फ राजनीतिक असहमति की नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी और आधुनिकता को समझने तथा युवाओं से समानता और सम्मान के साथ संवाद करने की भी है.
शिक्षा व्यवस्था पर राहुल देव ने गहरी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि शिक्षा भारत के भविष्य के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय चलाने के लिए जरूरी योग्यता, दृष्टि और गंभीरता को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा. उन्होंने पाठ्यक्रम और इतिहास में वैचारिक बदलावों पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई कि इनका असर तत्काल चुनावी राजनीति से कहीं आगे और कई दशकों तक रह सकता है.
राहुल देव के मुताबिक आज शिक्षा व्यवस्था में किए जा रहे बदलाव आने वाली पीढ़ियों की अकादमिक गुणवत्ता, वैज्ञानिक दृष्टि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था से निकलने वाले छात्रों की अकादमिक उत्कृष्टता कैसी होगी और दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों में उनकी स्वीकार्यता किस स्तर की होगी. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

