आंध्र प्रदेश का एआई सपना और साक्षरता का संकट
'साउथ फर्स्ट' के मुताबिक, आंध्र प्रदेश आज खुद को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर और डिजिटल इनोवेशन के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. सरकार निवेश आकर्षित करने, टेक्नोलॉजी आधारित विकास और ई-गवर्नेंस को अपनी विकास रणनीति के केंद्र में रख रही है. लेकिन इसी समय एक बुनियादी सच्चाई राज्य की पूरी विकास कहानी पर सवाल खड़े करती है. राज्य की साक्षरता स्थिति देश में सबसे कमजोर है.
पीएलएफएस 2023-24 के अनुसार आंध्र प्रदेश की साक्षरता दर 72.6 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 80.9 प्रतिशत से काफी नीचे है. मिजोरम 98.2 प्रतिशत के साथ शीर्ष पर है. यह आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय अंतर नहीं है, बल्कि एक गहरे सामाजिक और शैक्षिक संकट का संकेत है.
यह वही राज्य है जिसे लंबे समय तक प्रतियोगी परीक्षाओं के टॉपर तैयार करने के लिए जाना जाता रहा है. जेईई, नीट और सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं में आंध्र प्रदेश के छात्रों का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रहा है. लेकिन यह सफलता केवल एक छोटे वर्ग तक सीमित है, जबकि बड़ी आबादी अब भी बुनियादी साक्षरता से वंचित है.
यहीं से आंध्र प्रदेश का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है. एक तरफ टॉपर्स की कहानी है, दूसरी तरफ साक्षरता की विफलता.
टेक्नोलॉजी साक्षरता का विकल्प नहीं बन सकती
आंध्र प्रदेश में हाल के वर्षों में सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल गवर्नेंस और निवेश आकर्षण को अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है. नारा लोकेश जैसे मंत्री राज्य को तकनीकी हब के रूप में पेश करने में सक्रिय हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब राज्य खुद देश में सबसे कम साक्षर है, तब क्या यह तकनीकी महत्वाकांक्षा टिकाऊ हो सकती है.
शिक्षा का आधार केवल तकनीक या बुनियादी ढांचा नहीं होता, बल्कि बुनियादी पढ़ने और लिखने की क्षमता होती है. बिना साक्षरता के कोई भी डिजिटल या एआई आधारित मॉडल टिकाऊ नहीं हो सकता.
यही कारण है कि राज्य की विकास कहानी दो अलग दिशाओं में बंटी हुई दिखाई देती है. एक तरफ हाई-टेक भविष्य की योजनाएं हैं, दूसरी तरफ बुनियादी शिक्षा का संकट है.
कमजोर नींव
नीति आयोग की रिपोर्ट इस संकट की गहराई को स्पष्ट करती है. रिपोर्ट बताती है कि आंध्र प्रदेश में स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार हुआ है, इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ी है और नामांकन भी बेहतर हुआ है.
लेकिन इसके बावजूद सीखने के परिणाम कमजोर हैं. भाषा और गणित में बुनियादी दक्षता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है. लगभग एक चौथाई छात्र माध्यमिक से उच्च माध्यमिक तक नहीं पहुंच पाते हैं. स्कूल छोड़ने की दरें अब भी गंभीर समस्या बनी हुई हैं.
राज्य में लगभग तेरह हजार स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक पूरी व्यवस्था संभाल रहा है. ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है. यहां शिक्षा का मतलब अक्सर सिर्फ नामांकन रह जाता है, वास्तविक सीख नहीं.
यही कमजोर नींव राज्य की साक्षरता दर को लंबे समय से नीचे खींच रही है.
वर्षों से बनता संकट
आंध्र प्रदेश की यह स्थिति अचानक नहीं बनी. यह वर्षों की नीतिगत प्राथमिकताओं और संरचनात्मक बदलावों का परिणाम है.
राज्य में शिक्षा का तेजी से निजीकरण हुआ है. निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों का प्रभाव बढ़ा है. इससे एक तरफ टॉपर संस्कृति को बढ़ावा मिला, लेकिन दूसरी तरफ सरकारी शिक्षा प्रणाली कमजोर होती चली गई.
गरीब, ग्रामीण और आदिवासी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए. उनके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लगातार दूर होती गई.
बिहार जैसे राज्य, जिन्हें कभी शैक्षणिक रूप से सबसे कमजोर माना जाता था, आज साक्षरता के मामले में आंध्र प्रदेश से आगे निकल गए हैं. यह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही नीति उपेक्षा का परिणाम है.
राज्य विभाजन के बाद यह असमानता और स्पष्ट होकर सामने आई.
टेक्नोलॉजी साक्षरता का विकल्प नहीं बन सकती
आंध्र प्रदेश की सरकार लगातार निवेश, तकनीक और डिजिटल विकास पर जोर दे रही है. शिक्षा के क्षेत्र में तल्लिकी वंदनम जैसी योजनाएं भी लागू की गई हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों को स्कूल में बनाए रखना और परिवारों को आर्थिक सहायता देना है.
लेकिन केवल योजनाएं साक्षरता का समाधान नहीं बन सकतीं. वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधरेगी, शिक्षक रिक्तियां भरी जाएंगी और सीखने के परिणामों पर गंभीर ध्यान दिया जाएगा.
आज जरूरत इस बात की है कि साक्षरता को नीति का केंद्र बनाया जाए. एकल शिक्षक स्कूलों को समाप्त किया जाए, स्कूल छोड़ने की निगरानी मजबूत हो और ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष साक्षरता अभियान चलाए जाएं.
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सफलता का पैमाना बदला जाए. केवल टॉपर्स या परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि यह देखा जाए कि कितने लोग वास्तव में पढ़ना और लिखना जानते हैं.
आंध्र प्रदेश एआई और डिजिटल भविष्य की ओर बढ़ सकता है, लेकिन यह यात्रा तब तक अधूरी रहेगी जब तक उसकी बुनियाद मजबूत नहीं होती.
साक्षरता ही वह नींव है जिस पर कोई भी आधुनिक अर्थव्यवस्था खड़ी होती है. और बिना इस नींव के कोई भी तकनीकी सपना पूरा नहीं हो सकता.

