भारतीय प्रकाशक ने जो सैको की किताब क्यों छोड़ी?
जो सैको की किताब द वंस एंड फ्यूचर रायट मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में 2013 की गर्मियों के अंत में भड़के हिंदू-मुस्लिम दंगों का विस्तृत ग्राफ़िक वृत्तांत है. किताब में सैको न सिर्फ़ घटनाक्रम को दर्ज करते हैं, बल्कि यह भी पूछते हैं कि ऐसे दंगे होते क्यों हैं. उनका निष्कर्ष है कि बीजेपी जैसी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टियों को चुनाव से पहले इस हिंसा से राजनीतिक फ़ायदा था. इक्वेटर ने इस पर लेख लिखा हैै और ग्राफिक नॉवेल के कई चित्र भी छापे हैं.
भारत में किताब का वितरण पेंगुइन रैंडम हाउस करने वाला था, लेकिन सैको को कंपनी की क़ानूनी टीम का पाँच पन्नों का आपत्ति-पत्र मिला. कुछ आपत्तियाँ तथ्य-जाँच से जुड़ी थीं, लेकिन अधिकांश इस चिंता से प्रेरित थीं कि नेताओं और हिंसा के बीच के संबंध को मानहानिकारक माना जा सकता है, या पाठ को "भड़काऊ" या "धार्मिक भावनाएँ आहत करने वाला" समझा जा सकता है.
एक जगह जहाँ एक दक्षिणपंथी हिंदू नेता सैको से कहता है कि मुसलमानों की आबादी "सुअरों की तरह" बढ़ रही है — वहाँ क़ानूनी दस्तावेज़ की सलाह थी कि "सुअर" शब्द हटाकर बस इतना लिखें कि "मुसलमान तेज़ी से बढ़ रहे हैं."
पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के एक अधिकारी का कहना है कि इन "रेड फ़्लैग्स" पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, इसलिए किताब के वितरण से हाथ खींच लिया गया. लेख के साथ किताब का एक अंश भी छपा है, जिसमें नागला मंडौर गाँव की घटना है — जहाँ जाट नेताओं ने एक पंचायत बुलाई जिसमें हज़ारों लोग इकट्ठा हुए और अपने हाथों न्याय करने की माँग की. यह वह दौर था जब एक मुस्लिम युवक की हत्या के बाद बदले में दो जाट युवक भी मार दिए गए थे.

