श्रवण गर्ग | आज अगर विपक्ष कमजोर है और मीडिया अपनी भूमिका में नहीं है, तो जुडिशरी की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग से न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति और उसकी विश्वसनीयता को लेकर बातचीत की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि पिछले 12 वर्षों में जब देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर लगातार बहस चल रही है, तब न्यायपालिका ने सरकार, संविधान और आम नागरिकों के साथ कितना न्याय किया है और उसकी विश्वसनीयता किस स्थिति में पहुंची है.

श्रवण गर्ग ने कहा कि न्यायपालिका पर बात करना एक संवेदनशील विषय है. अदालतों और जजों को लेकर चर्चा कम होती है क्योंकि इसमें अवमानना और अन्य सीमाओं का सवाल जुड़ा रहता है. लेकिन उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों पर आज चर्चा हो रही है, उन पर कुछ मंचों और अखबारों में सवाल उठाए गए हैं.

उन्होंने सबसे पहले लंदन में हुए उस कार्यक्रम का जिक्र किया जिसमें भारत के जज, वकील और केंद्रीय मंत्री शामिल थे. श्रवण गर्ग ने कहा कि वहां बैडमिंटन खेलने को लेकर जो तस्वीरें सामने आईं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि न्यायपालिका और सरकार के बीच दिखने वाली नजदीकियों को किस तरह देखा जाए. उन्होंने कहा कि जजों के लिए एक आचार संहिता की बात पहले भी होती रही है, जिसमें यह तय करने की कोशिश की गई थी कि न्यायाधीशों को सरकार और वकीलों के साथ कितनी दूरी बनाए रखनी चाहिए.

श्रवण गर्ग ने कहा कि यहां तीन बातें महत्वपूर्ण हैं. पहली न्यायपालिका, वकीलों और सरकार के बीच बढ़ती नजदीकियां. दूसरी जजों के आचरण को लेकर बनी मर्यादाएं. और तीसरी न्यायपालिका की सार्वजनिक छवि.

इसके बाद उन्होंने लोकतंत्र के चार स्तंभों की चर्चा की. उन्होंने कहा कि आमतौर पर विधायिका, कार्यपालिका, मीडिया और न्यायपालिका को लोकतंत्र के प्रमुख आधार माना जाता है. लेकिन उनके अनुसार आज विधायिका की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है. उन्होंने दल-बदल और राजनीतिक घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि विधायिका पर कार्यपालिका के प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

श्रवण गर्ग ने कहा कि कार्यपालिका के प्रभाव को लेकर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वह पूरे सिस्टम पर हावी हो गई है. वहीं उन्होंने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आज मीडिया की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई है.

उन्होंने अपने आपातकाल के समय के अनुभवों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस दौर में भी मीडिया पर दबाव था और सेंसरशिप लागू थी, लेकिन इसके बावजूद कई पत्रकार और अखबार सत्ता के सामने सवाल खड़े कर रहे थे. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में अपने समय का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में न्यायपालिका भी दबाव में थी, लेकिन इसके बावजूद उसमें इतनी ताकत थी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती दे सका.

श्रवण गर्ग ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाले अध्यादेश का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि एक वरिष्ठ वकील के लेख में सवाल उठाया गया कि जब संसद का सत्र आने वाला था तो अध्यादेश लाने की जरूरत क्यों पड़ी. उन्होंने कहा कि अदालतों में लंबे समय से पद खाली हैं और मुकदमों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए नियुक्तियों की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है. पूरी बातचीत यहाँ देखें.

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