भारत में रोज़गार संकट: "विकसित भारत" का सपना और 121 करोड़ बेरोज़गार युवाओं की हक़ीक़त
भारत सरकार कहती है कि अर्थव्यवस्था 8.2% की दर से बढ़ रही है. बेरोज़गारी दर महज़ 3.2% है, यानी कई सालों में सबसे कम. "मेक इन इंडिया" चल रहा है, स्टार्टअप्स फल-फूल रहे हैं, और "विकसित भारत 2047" का नारा हर मंच से गूँजता है.
लेकिन देश के सबसे सम्मानित अर्थशास्त्रियों में से एक, प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा, इस सरकारी कथा को सिरे से चुनौती देते हैं. उनकी नई किताब "इंडिया आउट ऑफ वर्क" में वे तथ्यों, सरकारी आँकड़ों और अंतरराष्ट्रीय शोध के हवाले से बताते हैं कि भारत एक गहरे रोज़गार संकट में है, जिसकी जड़ें नीतिगत विफलताओं में हैं, और जिसके नतीजे आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ सकते हैं.
जीडीपी का दावा झूठा है और इसके सबूत हैं
प्रोफ़ेसर मेहरोत्रा की सबसे बड़ी और सबसे असहज करने वाली दलील यह है कि 2016 के बाद से जो जीडीपी विकास दर सरकार पेश कर रही है, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाती.
वे कहते हैं कि नवंबर 2016 में नोटबंदी एक ऐसा नीति-प्रेरित झटका था जो इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया. किसी सरकार ने महज़ चार घंटे के नोटिस पर अपनी 86% मुद्रा को अवैध घोषित नहीं किया था. एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहाँ कृषि और एमएसएमई क्षेत्र नक़दी पर निर्भर हैं, इस फ़ैसले ने पूरे असंगठित क्षेत्र को झकझोर दिया.
इसके छह महीने बाद ही बिना पर्याप्त तैयारी के लागू किया गया जीएसटी दूसरा बड़ा झटका था. पाँच अलग-अलग कर दरें, बिना परीक्षण के लागू किए गए कंप्यूटर सिस्टम, इन सबने एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी.
इन झटकों के बाद असंगठित क्षेत्र की उत्पादकता गिरती रही, लेकिन जीडीपी आकलन में जो पुराने प्रॉक्सी अनुमान इस्तेमाल होते थे, वे नहीं बदले. संगठित क्षेत्र जल्दी उबर गया, असंगठित क्षेत्र नहीं, मगर सरकारी गणना में यह अंतर दिखा ही नहीं.
यह सिर्फ़ मेहरोत्रा का आकलन नहीं है. जेएनयू के प्रोफ़ेसर अरुण कुमार, पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्यन के फरवरी 2026 के हालिया शोध-पत्र और ख़ुद आईएमएफ ने भी इस पर सवाल उठाए हैं. आईएमएफ ने भारत की जीडीपी अनुमान पद्धति को बी-ग्रेड से सी-ग्रेड पर उतार दिया है, यानी चार में से तीसरी श्रेणी.
मेहरोत्रा सीधे कहते हैं, "सरकार को उठकर हक़ीक़त देखनी होगी. जब तक वह ऐसा नहीं करती, वह यह भी नहीं समझ पाएगी कि रोज़गार क्यों नहीं बढ़ रहा."
12 करोड़ 10 लाख युवा, न काम, न पढ़ाई, न प्रशिक्षण
सरकार जब 3.2% बेरोज़गारी का आँकड़ा पेश करती है, तो मेहरोत्रा एक दूसरा आँकड़ा सामने रखते हैं. 121 मिलियन यानी 12 करोड़ 10 लाख युवा भारतीय ऐसे हैं जो न रोज़गार में हैं, न किसी शैक्षणिक संस्थान में, और न किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में. इन्हें अंग्रेज़ी में नीट कहा जाता है.
3.2% का आँकड़ा इसलिए भ्रामक है क्योंकि भारत जैसी ग़रीब और असंगठित अर्थव्यवस्था में जिसके पास कोई चारा नहीं होता, वह कोई भी काम कर लेता है, और तब वह "बेरोज़गार" नहीं गिना जाता. असली सवाल यह है कि काम की गुणवत्ता क्या है, वह टिकाऊ है या नहीं, और क्या वह युवाओं की तैयारी और आकांक्षाओं से मेल खाता है.
पढ़े-लिखे ज़्यादा बेरोज़गार, अनपढ़ कम, यह कैसी विडंबना है?
पहुँच गई है. इंजीनियरिंग स्नातकों में यह 18% से बढ़कर 26% हो गई. परास्नातक डिग्रीधारकों में यह 20% से बढ़कर 30% हो गई.
इसका मतलब यह हुआ कि जितना ज़्यादा पढ़े हो, उतनी ज़्यादा बेरोज़गार रहने की संभावना है.
इसकी व्याख्या करते हुए मेहरोत्रा कहते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोग अक्सर निम्न आय वर्ग से आते हैं. उनके पास इंतज़ार करने की सुविधा नहीं होती, इसलिए वे जो भी काम मिले कर लेते हैं. उच्च शिक्षित युवा बेहतर नौकरी का इंतज़ार कर सकते हैं और करते हैं. लेकिन जब नौकरियाँ हैं ही नहीं, तो यह प्रतीक्षा बेरोज़गारी के आँकड़े में दिखती है.
2012 से 2018 के बीच युवा बेरोज़गारी दर तीन गुना हो गई और तब से वह उसी ऊँचाई पर बनी हुई है.
खेती में वापसी — विकास की उलटी गिनती
2004 से 2019 के बीच भारत में एक ऐतिहासिक बदलाव हो रहा था. हर साल 50 लाख से ज़्यादा मज़दूर कृषि छोड़कर उद्योग और सेवा क्षेत्र में जा रहे थे. कृषि में लगे मज़दूरों की कुल संख्या पहली बार घट रही थी. ग्रामीण मज़दूरी बढ़ रही थी. ग़रीबी कम हो रही थी.
यह वही "संरचनात्मक बदलाव" था जो किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था की परिपक्वता की निशानी होती है.
लेकिन 2020 से 2024 के बीच 8 करोड़ मज़दूर वापस खेती में लौट आए. 2019 में कृषि में 20 करोड़ मज़दूर थे, वह संख्या अब 28 करोड़ हो गई है.
मेहरोत्रा इसे "दुनिया के इतिहास में इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर इस तरह की उलटी विस्थापन प्रक्रिया कभी नहीं हुई" बताते हैं. ये मज़दूर खेती में नहीं आए क्योंकि वहाँ अवसर था. वे लौटे क्योंकि कहीं और जाने की जगह नहीं थी.
कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बेहद कम है. जीडीपी में कृषि का योगदान महज़ 15 से 16% है, लेकिन कार्यबल का 42% हिस्सा अभी भी खेती में फँसा है. इतने लोगों को इतनी कम उत्पादकता वाले काम में खपाना किसी भी देश के विकास के लिए घातक है.
जनसांख्यिकीय लाभांश — सुनहरा मौक़ा हाथ से जा रहा है
"भारत एक युवा देश है", यह नारा हर भाषण में सुनाई देता है. मेहरोत्रा कहते हैं कि यह सच था, लेकिन अब यह तेज़ी से बदल रहा है.
देश की औसत आयु 29 वर्ष पहुँच चुकी है. आज के कार्यबल का आधे से ज़्यादा हिस्सा 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र का है. 2040 तक श्रम बाज़ार में प्रवेश करने वाले युवाओं की संख्या घटने लगेगी. उसके बाद भारत भी एक बुजुर्ग होती हुई अर्थव्यवस्था बन जाएगा.
इसका मतलब यह है कि रोज़गार पैदा करने की खिड़की बंद हो रही है और इसे खुला रखने के लिए हर साल 1 करोड़ से 1 करोड़ 20 लाख नए गैर-कृषि रोज़गार चाहिए.
ये रोज़गार तीन बड़े समूहों के लिए चाहिए. पहला, हर साल श्रम बाज़ार में आने वाले 60 लाख नए युवा. दूसरा, कृषि में फँसे 28 करोड़ मज़दूर, जिन्हें बाहर निकालना है. तीसरा, वे लोग जो पहले से बेरोज़गार हैं और जिनकी संख्या पिछले एक दशक में दोगुनी-तिगुनी हो गई है.
महिला श्रम भागीदारी — यमन और सऊदी अरब से भी बदतर
मेहरोत्रा एक और विस्फोटक तथ्य रखते हैं. भारत में महिला श्रम भागीदारी दर दुनिया में सबसे कम में से एक है, यमन और सऊदी अरब के समकक्ष.
सरकार कहती है कि हाल के वर्षों में यह दर बढ़ी है. लेकिन मेहरोत्रा बताते हैं कि यह वृद्धि इसलिए हुई क्योंकि महिलाएँ कृषि में वापस लौटीं और वहाँ वे अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक के रूप में काम कर रही हैं.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की सिफ़ारिश है कि अवैतनिक पारिवारिक श्रम को रोज़गार न माना जाए. अगर इसे हटा दें तो भारत की महिला श्रम भागीदारी दर यमन और सऊदी अरब से भी नीचे चली जाती है.
बिहार में यह दर 13% है. उत्तर प्रदेश में 20%.
इसकी वजह सिर्फ़ सामाजिक नहीं है. नौकरियाँ घरों के पास नहीं हैं. एमएसएमई क्लस्टर कमज़ोर पड़ रहे हैं. कार्यस्थल पर सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.
मेहरोत्रा कहते हैं कि अगर नीति सही हो, घरों के पास उद्योग, सुरक्षित माहौल और मातृत्व लाभ हों, तो परिवार अपनी बेटियों को काम पर भेजने में संकोच नहीं करेंगे.
सरकारी दावों का जवाब एक-एक करके
मेहरोत्रा सरकार के प्रमुख दावों को एक-एक करके खारिज करते हैं.
पहला दावा — 8 करोड़ औपचारिक नौकरियाँ बनीं: ये 8 करोड़ नौकरियाँ कृषि में थीं, न कि औपचारिक क्षेत्र में. आईटी क्षेत्र, जो सबसे ज़्यादा औपचारिक रोज़गार देता था, अब एआई की वजह से नई भर्तियाँ रोक चुका है.आईआईटी में 100% प्लेसमेंट नहीं हो रहा.
दूसरा दावा — पीएलआई से मैन्युफैक्चरिंग आ रही है: पीएलआई की 14 में से 12 सेक्टर पूँजी-प्रधान हैं, श्रम-प्रधान नहीं. 2 लाख करोड़ रुपये में से केवल 12% ख़र्च हुआ और उसमें से 75% अकेले एप्पल को मिला. सैमसंग पीएलआई से पहले भी भारत में था. सरकार ख़ुद 2026 में पीएलआईकी समीक्षा की बात कर रही है.
तीसरा दावा — 1.5 लाख स्टार्टअप्स, रोज़गार का नया इंजन: स्टार्टअप्स अच्छे हैं, लेकिन ये एडटेक, फिनटेक, ई-कॉमर्स में हैं. ये पूँजी-प्रधान हैं और बड़े पैमाने पर रोज़गार नहीं देते. 1 करोड़ 20 लाख नई नौकरियाँ हर साल बनाना इनके बूते की बात नहीं है.
चौथा दावा — जेएएम से औपचारिकीकरण हो रहा है: यूपीआई से भुगतान करने का मतलब औपचारिकीकरण नहीं है. चाय की दुकान पर यूपीआई से पैसे देने का मतलब यह नहीं कि वह दुकानदार कहीं पंजीकृत है. देश के 7 करोड़ 20 लाख उद्यमों में से 90% अभी भी अपंजीकृत हैं. श्रमिक के नज़रिए से औपचारिकीकरण का मतलब है सामाजिक बीमा, पेंशन, मातृत्व लाभ, मृत्यु-अपंगता बीमा. भारत के 61 करोड़ के कार्यबल में से 90% इनसे वंचित हैं जैसे 10 साल पहले थे, वैसे ही आज भी हैं.
चीन से तुलना — हम कहाँ चूके?
मेहरोत्रा चीन की सफलता की दो बुनियादी वजहें बताते हैं.
पहली — जब 1980 में चीन ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, तब उसके पास बेहतर मानव पूँजी थी. उसने स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में भारत से काफ़ी पहले निवेश कर दिया था. जब विकास हुआ तो लोग उसका लाभ उठाने के लिए तैयार थे.
दूसरी — चीन की वृद्धि निर्यात-उन्मुख, श्रम-प्रधान विनिर्माण पर आधारित थी. इसने करोड़ों लोगों को सीधे रोज़गार दिया. भारत ने श्रम-प्रधान विनिर्माण की उपेक्षा की और पूँजी-प्रधान क्षेत्रों पर दाँव लगाया — नतीजा सबके सामने है.
समाधान — बड़ा लक्ष्य, बड़ी ज़िम्मेदारी
मेहरोत्रा कहते हैं कि “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है जब देश की औसत जीडीपी विकास दर 8 प्रतिशत सालाना के आसपास बनी रहे और यह गति लंबे समय तक कायम रहे. उनके अनुसार इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अगले दशक में लगभग 9 प्रतिशत, उसके बाद 8 प्रतिशत और फिर 7 प्रतिशत की न्यूनतम वृद्धि ज़रूरी होगी.
लेकिन वर्तमान स्थिति में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (भारतीय रिज़र्व बैंक) इस साल लगभग 6.6 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगा रहा है. वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड), विश्व बैंक (वर्ल्ड बैंक) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) जैसे संस्थान भी 2030 तक भारत की विकास दर को 6.5 प्रतिशत से ऊपर जाते नहीं देख रहे.
इसका सीधा अर्थ यह है कि अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही तो रोजगार सृजन की गति धीमी रहेगी, कृषि में फंसा श्रम बल वहीं अटका रहेगा, युवाओं की उम्मीदें पूरी नहीं होंगी और अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे एक के आकार की (K-shaped) संरचना में बंटती जाएगी — जहाँ ऊपर का छोटा वर्ग तेज़ी से आगे बढ़ेगा और नीचे का बड़ा हिस्सा ठहराव में रहेगा.
आख़िरी बात
प्रोफ़ेसर मेहरोत्रा की किताब और यह विश्लेषण एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण सवाल उठाता है — आंकड़े अपने आप में गलत नहीं होते, लेकिन उन्हें कैसे पेश किया जाता है, यह पूरी कहानी बदल सकता है.
जब तक सरकार जीडीपी की गणना और रोजगार के वास्तविक स्वरूप को अधिक पारदर्शी नहीं बनाती, जब तक एमएसएमई और श्रम-प्रधान विनिर्माण को नीतिगत प्राथमिकता नहीं मिलती, और जब तक महिलाओं की श्रम भागीदारी को वास्तविक और सुरक्षित रोजगार से नहीं जोड़ा जाता, तब तक “विकसित भारत” एक लक्ष्य से ज़्यादा एक नारा ही बना रहेगा.
यह रिपोर्ट वैल्यू फॉर मनी के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित इंटरव्यू पर आधारित है. प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा भारत सरकार के योजना आयोग के तहत रोजगार शोध संस्थान के प्रमुख रह चुके हैं और यूनिसेफ में वरिष्ठ सलाहकार रहे हैं. उनकी किताब इंडिया आउट ऑफ वर्क अभी उपलब्ध है.
प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा से बातचीत |पूरा इंटरव्यू यहाँ देखें

