भारत की ‘गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था का मिथक; जीडीपी के मामले में भारत से आगे निकले जापान और ब्रिटेन
इंडियन एक्सप्रेस में अपने साप्ताहिक स्तंभ ‘ग्राफ्स, डेटा, पर्सपेक्टिव्स’ में वरिष्ठ लेखक उदित मिश्रा लिखते हैं कि फरवरी के बजट के समय आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भारतीय अर्थव्यवस्था को “दुर्लभ गोल्डीलॉक्स काल” बताया था — यानी वह स्थिति जहां विकास दर ऊंची हो, महंगाई कम हो और बेरोज़गारी भी कम हो. लेकिन ईरान युद्ध और रुपये की गिरावट के बाद जापान और ब्रिटेन दोनों जीडीपी के मामले में भारत से आगे निकल गए हैं. भारत छठे स्थान पर आ गया है.
पुरानी जीडीपी श्रृंखला के आंकड़े देखें तो हकीकत कहीं अधिक चिंताजनक है. पिछले 12 वर्षों (2014-2026) में नॉमिनल जीडीपी की सीएजीआर मुश्किल से 10 प्रतिशत रही, जबकि पिछले 22 वर्षों में यह 12.3 प्रतिशत थी. वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर पिछले 12 वर्षों में महज 6.2 प्रतिशत सालाना रही, और पिछले 7 वर्षों में तो 5.5 प्रतिशत से भी कम. मिश्रा के अनुसार यह दर अगले दो दशकों में विकसित देश बनने के लक्ष्य के लिए पर्याप्त नहीं है.
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कोविड-19 के बाद के केवल उच्च-वृद्धि वाले वर्षों को आधार बनाकर गोल्डीलॉक्स का भ्रम पैदा किया जाता है, जबकि वे आंकड़े निम्न आधार का प्रभाव मात्र हैं. कॉर्पोरेट आय का सुस्त रहना, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का ऋणात्मक होना और रुपये का लगातार कमज़ोर पड़ना — ये सब इसी धीमी वास्तविक वृद्धि के संकेत हैं. इस पर तुर्रा यह कि नई जीडीपी श्रृंखला ने भारत की अर्थव्यवस्था का आकार पहले से भी छोटा दर्शाया है.

