आनंद तेलतुंबड़े | भव्य नारों की नहीं, उत्तरदायी बनने की जरूरत
आनंद तेलतुंबड़े ने लिखा है कि भारत के सार्वजनिक जीवन से एक चीज़ स्पष्ट रूप से गायब है, और वह है-“जवाबदेही”. कोई संस्थान चाहे सार्वजनिक हो या निजी, उसके पदाधिकारी मुख्य रूप से 'ऊपर' की ओर ही जवाबदेह होते हैं—अपने संगठनात्मक पदानुक्रम, राजनीतिक आकाओं, मालिकों या नियामकों के प्रति. जो लोग अंतिम लाभार्थी होने चाहिए—संवैधानिक रूप से संप्रभु नागरिकों की बात तो छोड़ ही दीजिए—वे सार्वजनिक संस्थानों के हाथों केवल नुकसान या उपेक्षा ही झेलते हैं. जब ये संस्थान उनके विश्वास पर खरे नहीं उतरते, तो उनके पास न तो कोई आवाज़ होती है और न ही कोई सहारा.
लेख का मुख्य संदेश यह है कि भारतीय संस्थान नागरिकों के प्रति उत्तरदायी होने के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं और प्रशासनिक पदानुक्रम के प्रति जवाबदेह हैं. यह स्थिति आम नागरिकों, छात्रों और समाज के वंचित वर्गों को उपेक्षा और नुकसान की स्थिति में छोड़ देती है.
तेलतुंबड़े का कहना है कि शिक्षा प्रणाली इस संस्थागत विफलता का सबसे स्पष्ट रूप प्रस्तुत करती है. कोठारी आयोग से लेकर 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' तक, हर नीति में शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने की सिफारिश की गई है. इसके बावजूद, वास्तविक व्यय लगातार 2.7% से 2.9% के बीच अटका हुआ है. 'ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' के दावे इस बजटीय उपेक्षा के सामने खोखले साबित होते हैं.
दक्षता और 'युक्तिसंगत बनाने' के नाम पर कम दाखिले वाले सरकारी स्कूलों को बंद या विलय किया जा रहा है. कागजों पर यह फैसला प्रशासनिक रूप से कुशल दिख सकता है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह गरीब और दूर-दराज के बच्चों को शिक्षा से वंचित या ड्रॉपआउट करने के लिए मजबूर करता है.
ड्रॉपआउट और बुनियादी सीखने का संकट
‘शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली’ (यूडीआईएसई) 2024-25 के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11.5% तक पहुँच गई है. इसके अलावा, एएसईआर (2024) रिपोर्ट दर्शाती है कि ग्रामीण भारत में कक्षा III के केवल 23.4% बच्चे और सरकारी स्कूलों में कक्षा V के 44.8% बच्चे ही कक्षा II स्तर का पाठ पढ़ सकते हैं. यह दर्शाता है कि बच्चे बिना बुनियादी ज्ञान के सालों स्कूल में बिता रहे हैं.
लेखक के मुताबिक, उच्च शिक्षा प्रणाली सीखने के बजाय केवल डिग्रियों और परीक्षाओं तक सीमित रह गई है. लाखों युवा कुछ चुनिंदा नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जबकि उद्योग जगत को कुशल स्नातक नहीं मिल रहे हैं. '2025 ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स' के अनुसार, केवल 42.6% भारतीय स्नातक ही रोजगार के योग्य पाए गए.
जब परीक्षा प्रणाली की कुप्रबंधन और नीट-यूजी 2026 पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं, तो युवाओं ने इस गैर-जवाबदेह प्रणाली के खिलाफ आवाज उठाई. छात्रों ने जंतर-मंतर पर व्यापक प्रदर्शन किए, भूख हड़ताल की और पुलिस कार्रवाई का सामना किया. इस निरंतर जन दबाव के कारण 25 जुलाई को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.
लेख चेतावनी देता है कि किसी मंत्री का इस्तीफा ही अंतिम समाधान नहीं है. यह टूटी हुई परीक्षा प्रणाली, बंद हुए स्कूलों या शिक्षकों की कमी को रातों-रात ठीक नहीं कर सकता.
शिक्षा केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि 'सार्वजनिक भलाई' और सामाजिक परिवर्तन का संवैधानिक साधन है. गरीबों, आदिवासियों, दलितों और महिलाओं के लिए यह प्रगति का एकमात्र जरिया है. सरकार द्वारा खर्च बचाने के नाम पर स्कूलों को बंद करना जनसेवा के विचार के विपरीत है. शिक्षा की सफलता बचाए गए पैसों से नहीं, बल्कि बच्चों द्वारा सीखे गए ज्ञान और क्षमताओं से मापी जानी चाहिए.
कुलजमा निष्कर्ष यह है कि भारत को ‘ज्ञान की महाशक्ति’ बनाने के लिए भव्य नारों की नहीं, बल्कि एक कार्यशील लोकतंत्र की आवश्यकता है, जहाँ असफलताओं की जिम्मेदारी तय हो. सड़कों पर उतरे युवाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा प्रणाली को केवल अधिक धन की नहीं, बल्कि वास्तविक जवाबदेही की आवश्यकता है. सत्ता में बैठे लोगों को उन नागरिकों के प्रति उत्तरदायी होना ही होगा जिनके नाम पर वे शक्ति का प्रयोग करते हैं.
(आनंद तेलतुंबड़े एक विद्वान और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हैं. यह उनके लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

