भारत को और अधिक डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता है, न कि अधिक प्रवेश परीक्षाओं की

“आई लव यू, पापा.”

ये उन आखिरी शब्दों में से थे जो कथित तौर पर देहरादून की एक युवा छात्रा अपने पीछे छोड़ गई थी, जिसने भारत की राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) की तैयारी में सालों बिताए थे—जो मेडिकल शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में करियर का प्रवेश द्वार है. जब उसने आत्महत्या की, तब वह पेपर लीक के आरोपों और परीक्षा प्रक्रिया की ईमानदारी पर बढ़ते संदेहों के बीच दोबारा परीक्षा की तैयारी कर रही थी.

वह महज़ 24 वर्ष की थी और अपनी 12वीं कक्षा में टॉपर रही थी – दूसरे शब्दों में, एक अच्छी और गंभीर छात्रा जिसे 'भारतीय शिक्षा प्रणाली' नाम की हत्यारी मशीन ने तोड़ दिया था.

उसकी मृत्यु कोई अकेली त्रासदी नहीं है, बल्कि भारतीय शिक्षा प्रणाली की उस क्रूर वास्तविकता को दर्शाती है जो हर साल लाखों युवाओं को एक बेहद कठिन परीक्षा के चक्रव्यूह में धकेल देती है. मध्यमवर्गीय परिवार कोचिंग संस्थानों पर अपनी जीवन भर की कमाई लुटा देते हैं, और कोटा जैसे शहर छात्रों की इसी चिंता और उम्मीदों पर फल-फूल रहे हैं. अक्सर इस पूरी प्रक्रिया को 'गुणवत्ता बनाए रखने' के नाम पर सही ठहराया जाता है, लेकिन यह व्यवस्था मेधावी छात्रों को तोड़ने वाली एक मशीन बन चुकी है.

countercurrents.org में सत्य सागर की यह विस्तृत रिपोर्ट भारतीय स्वास्थ्य नीति के एक बड़े विरोधाभासी पहलू को उजागर करती है. एक तरफ भारत दुनिया की लगभग पांचवीं आबादी का घर है, जहाँ बीमारियों का भारी बोझ है और डॉक्टरों की अत्यधिक कमी है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खाली पड़े हैं, विशेषज्ञों की भारी किल्लत है और लोग इलाज के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं. दूसरी तरफ, हमारा चिकित्सा शिक्षा तंत्र डॉक्टरों को तैयार करने के बजाय, डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले युवाओं को बाहर निकालने की तकनीक पर काम करता है.

सरकार अक्सर यह दावा करती है कि भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के डॉक्टर-आबादी अनुपात को हासिल कर लिया है, लेकिन इन आंकड़ों में एलोपैथिक (एमबीबीएस) डॉक्टरों के साथ आयुष प्रणालियों के डॉक्टरों को भी जोड़ दिया जाता है. पारंपरिक प्रणालियों की महत्ता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उन्हें आधुनिक एलोपैथिक डॉक्टरों के साथ गिनने से वास्तविक साक्ष्य-आधारित चिकित्सा की कमी दूर नहीं होती. इसके अलावा, दक्षिण और पश्चिम भारत में मेडिकल कॉलेजों की संख्या अधिक है, जबकि मध्य और पूर्वी भारत अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

दशकों से कड़े नियमों, लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं और सीटों के प्रतिबंधों के कारण चिकित्सा शिक्षा को एक दुर्लभ वस्तु बना दिया गया है. इस कृत्रिम कमी को हमेशा 'मेरिट' और 'योग्यता' के तर्क से सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है. हालांकि, नीट जैसी परीक्षाओं की निष्पक्षता अब पूरी तरह संदिग्ध हो चुकी है. पेपर लीक, संगठित नकल गिरोह और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता के भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है. जब मेडिकल सीटों को पैसे और रसूख से खरीदा जा सकता है, तो योग्यता की रक्षा के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का तर्क खोखला साबित होता है. इस विफलता के कारण राजनीतिक स्तर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठ रही है, लेकिन यह मांग इस गहरे संकट का कोई स्थायी समाधान नहीं है.

दुनिया के कई देशों ने अपनी स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को सही दिशा में लागू किया. भारत जैसी विशाल आबादी और क्षेत्रीय असमानता का सामना करने के लिए चीन ने प्रवेश परीक्षाओं को कठिन बनाने के बजाय मेडिकल कॉलेजों का बड़े पैमाने पर विस्तार किया. नए संस्थान खोले और सरकारी निवेश से डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई, क्योंकि चीन का मानना था कि डॉक्टरों की कमी का इलाज केवल अधिक डॉक्टर पैदा करना ही है.

सीमित आर्थिक संसाधनों के बाद भी क्यूबा में दुनिया का सबसे बेहतर डॉक्टर-आबादी अनुपात है. वहाँ स्वास्थ्य सेवा को व्यापार के बजाय एक सार्वजनिक भलाई माना जाता है, जिससे वे संकट के समय विदेशों में भी अपनी टीमें भेज पाते हैं.

बिना निजीकरण के केवल सार्वजनिक निवेश के दम पर थाईलैंड ने 'यूनिवर्सल कवरेज स्कीम' लागू की. उसने सरकारी राजस्व से पिछड़े इलाकों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित कर तैनात किया. 'यूनिफाइड हेल्थ सिस्टम' के जरिए ब्राजील ने स्वास्थ्य को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय नागरिकों का संवैधानिक अधिकार बनाया.

जबकि भारत इन वैश्विक मॉडलों के विपरीत अमेरिकी मॉडल की तरफ बढ़ रहा है, जहाँ स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा एक बाजार बन चुके हैं. भारतीय परिवार केंद्र सरकार के वार्षिक शिक्षा बजट (₹1.39 लाख करोड़) की तुलना में निजी शिक्षा पर अपनी जेब से कहीं अधिक (सालाना ₹7.28 लाख करोड़ से ज्यादा) खर्च कर रहे हैं. अमेरिकी मॉडल को अपनाने का नतीजा यह हुआ है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों महंगे हो गए हैं और पूरा कार्यबल वहाँ केंद्रित है जहाँ मुनाफा ज्यादा है, न कि वहाँ जहाँ जरूरत है.

भारत की प्राथमिकताओं में विरोधाभास को इंजीनियरिंग शिक्षा के उदाहरण से समझाते हुए सत्य सागर कहते हैं कि दशकों से भारत ने आईआईटी और तकनीकी शिक्षा का भारी विस्तार किया, जिसे राष्ट्रीय उपलब्धि माना जाता है. वहाँ कोई यह नहीं कहता कि गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सीटों को कृत्रिम रूप से कम रखा जाए. तो फिर चिकित्सा के साथ ऐसा भेदभाव क्यों? एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर आर्थिक मूल्य बनाता है, लेकिन एक डॉक्टर माँ की जान बचाता है, टीबी का इलाज करता है और शिशु मृत्यु दर को कम करता है. डॉक्टरों का सामाजिक प्रतिफल किसी भी इंजीनियर से कहीं अधिक है.

अब समय आ गया है कि बहस को प्रवेश परीक्षाओं को बदलने के बजाय चिकित्सा शिक्षा के व्यापक विस्तार पर केंद्रित किया जाए. भारत को निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:

  • बुनियादी ढांचे का विस्तार: देश को अधिक सरकारी मेडिकल कॉलेजों, जिला-स्तरीय प्रशिक्षण केंद्रों, नर्सिंग स्कूलों और रेजिडेंसी पदों की आवश्यकता है.

  • अनौपचारिक प्रदाताओं का प्रशिक्षण: इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि ग्रामीण भारत आज भी अनौपचारिक या पारंपरिक चिकित्सकों पर निर्भर है. उन्हें अपराधी घोषित करने या नजरअंदाज करने के बजाय एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत 'ब्रिज कोर्स' और वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे बुनियादी जैव-चिकित्सा कौशल सीख सकें। एक अप्रशिक्षित झोलाछाप से बेहतर एक प्रशिक्षित और प्रमाणित स्वास्थ्य कार्यकर्ता होता है.

निष्कर्ष यह है कि भारत सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में वैश्विक महाशक्ति इसलिए बन सका क्योंकि उसने तकनीकी शिक्षा के द्वार सबके लिए खोले. स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यही चमत्कार तब होगा जब हम 'कमी की राजनीति' को छोड़कर 'प्रचुरता की राजनीति' को अपनाएंगे. भारत को मेडिकल छात्रों की संख्या कम करने की नहीं, बल्कि लाखों नए डॉक्टरों की आवश्यकता है. लिहाजा, देश में "लाखों मेडिकल कॉलेजों को खिलने देना चाहिए."

(यह हिंदी में अनुदित सारांश है, अंग्रेजी में मूल रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है)

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