'दिमागी नक्सल'? आज के दौर में वेद और उपनिषद के ऋषि भी इस श्रेणी में आते
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में "दिमागी नक्सल" शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया, जिनके विचार सरकार की राजनीतिक दिशा पर सवाल उठाते हैं. स्क्रोल में तुहिन भट्टाचार्य इस शब्द के जरिए एक दिलचस्प सवाल उठाते हैं. अगर सत्ता पर सवाल उठाना ही "दिमागी नक्सल" होने की पहचान है, तो वेद और उपनिषद की रचना करने वाले ऋषि भी आज के दौर में इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं.
लेखक का तर्क है कि हिंदुत्व की राजनीति अक्सर वेदों और उपनिषदों को अपनी वैचारिक परंपरा के स्रोत के रूप में पेश करती है. लेकिन इन प्राचीन ग्रंथों को गंभीरता से पढ़ने पर एक ऐसी परंपरा सामने आती है, जिसमें सवाल, बहस, संशय और सत्ता की आलोचना के लिए पर्याप्त जगह है.
पिछले साल अहमदाबाद के एक कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह ने सेवानिवृत्ति के बाद वेद और उपनिषद पढ़ने की इच्छा जताई थी. लेखक के अनुसार, यह रुचि स्वागत योग्य हो सकती है, लेकिन इन ग्रंथों में मौजूद विचारों को हिंदुत्व की मौजूदा राजनीति से जोड़कर देखने पर कई विरोधाभास सामने आते हैं.
वेदों में सवाल और संशय की परंपरा
लेख में ऋग्वेद के प्रसिद्ध नासदीय सूक्त का उदाहरण दिया गया है. सृष्टि की उत्पत्ति पर आधारित यह सूक्त सवाल उठाता है कि आखिर ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई और क्या देवताओं को भी इसकी पूरी जानकारी है. सूक्त के अंत में यह संशय तक व्यक्त किया गया है कि शायद सर्वोच्च सत्ता को भी सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में पूरी जानकारी न हो.
लेखक के अनुसार, यह धार्मिक और दार्शनिक निश्चितता को चुनौती देने वाली परंपरा है. वेदों और उपनिषदों में केवल आस्था या आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि गहरे बौद्धिक प्रश्नों की भी जगह है.
उपनिषद और सत्ता पर सवाल
उपनिषदों में यह सवाल और गहरा हो जाता है. बृहदारण्यक उपनिषद आत्मा और ब्रह्म की एकता की बात करता है. इसके अनुसार व्यक्ति के भीतर ही वह चेतना मौजूद है, जिसे बाहरी देवताओं या शक्तियों से अलग नहीं माना जा सकता.
लेख में बृहदारण्यक उपनिषद के एक प्रसंग का जिक्र करते हुए कहा गया है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य को रोकने की कोशिश करने वाले देवताओं का चित्रण भी मिलता है. लेखक इसे सत्ता और शक्ति के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि के उदाहरण के रूप में देखते हैं.
उपनिषदों में बहस और सार्वजनिक बौद्धिक विमर्श की भी मजबूत परंपरा दिखाई देती है. बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य और कई विद्वानों के बीच दार्शनिक बहस का वर्णन मिलता है. इनमें गार्गी वाचक्नवी जैसी महिला विदुषी भी शामिल हैं, जो याज्ञवल्क्य से कठिन सवाल पूछती हैं.
प्राचीन परंपरा और आज की असहमति
लेखक इस बौद्धिक परंपरा की तुलना मौजूदा राजनीतिक माहौल से करते हैं. उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सरकार की आलोचना करने वालों को "राष्ट्रविरोधी", "टुकड़े-टुकड़े गैंग", "अर्बन नक्सल" और अब "दिमागी नक्सल" जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है.
लेख में दावा किया गया है कि 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों के हाशिए पर जाने, प्रेस की स्वतंत्रता पर दबाव और असहमति की आवाजों को निशाना बनाए जाने को लेकर लगातार सवाल उठे हैं.
लेखक का कहना है कि अगर वेदों और उपनिषदों की परंपरा को वास्तव में अपनाया जाए, तो सवाल पूछने और सत्ता से असहमति को देशविरोधी मानने की बजाय उसे बौद्धिक परंपरा का हिस्सा समझना होगा.
प्राचीन भारत की एकरंगी तस्वीर पर सवाल
लेख में गोमांस खाने के मुद्दे का भी उल्लेख किया गया है. लेखक का तर्क है कि प्राचीन वैदिक समाज को एकरूप और आज की हिंदुत्व राजनीति के अनुरूप बताना ऐतिहासिक रूप से जटिल है. ऋग्वेद और अन्य प्राचीन संदर्भों के आधार पर लेख यह तर्क देता है कि उस दौर के खानपान और सामाजिक व्यवहार को आज के राजनीतिक मानकों से सीधे नहीं समझा जा सकता.
लेखक स्वामी विवेकानंद के एक संदर्भ का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज में गोमांस के सेवन को लेकर अलग ऐतिहासिक स्थिति की बात कही गई है.
हालांकि लेखक यह भी स्वीकार करते हैं कि वेद और अन्य प्राचीन ग्रंथ पूरी तरह आदर्श नहीं थे. इनमें वर्ण जैसी पदानुक्रम वाली अवधारणाएं भी मौजूद थीं, जो बाद में जातिगत उत्पीड़न की व्यवस्था से जुड़ीं. लेकिन इन ग्रंथों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी रही कि इनमें कई विरोधाभासी और प्रतिस्पर्धी विचार एक साथ मौजूद रहे.
लेख का निष्कर्ष है कि अगर वेदों और उपनिषदों के ऋषि आज जीवित होते और सत्ता, देवताओं या स्थापित मान्यताओं पर इसी तरह सवाल उठाते, तो संभव है कि उन्हें भी आज के राजनीतिक माहौल में "दिमागी नक्सल" कह दिया जाता.

