अपूर्वानंद | आरक्षण की बहस, जंतर-मंतर और हिंदुत्व की राजनीति का नया संकट
'हकारा डीप डाइव' के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ आरक्षण के खिलाफ उभरते आंदोलन, यूजीसी के भेदभाव-विरोधी नियमों और इसके पीछे दिखाई दे रही राजनीतिक रणनीति पर चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय सवाल था कि क्या परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के अवसरों के संकट से शुरू हुई बहस को अब आरक्षण की ओर मोड़ने की कोशिश हो रही है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने जुलाई में जंतर-मंतर पर परीक्षा प्रणाली और खासकर नीट से जुड़े सवालों को लेकर हुए युवा जमावड़े का जिक्र किया. उनके मुताबिक उस आंदोलन का मूल सवाल अवसरों की निष्पक्षता और परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता था. लेकिन बाद में आरक्षण के खिलाफ एक अलग राजनीतिक विमर्श उभरता दिखाई दिया. उन्होंने कहा कि बहस का केंद्र व्यवस्था की विफलता से हटाकर इस सवाल की ओर ले जाया जा रहा है कि युवाओं के अवसर आरक्षण की वजह से कम हो रहे हैं.
चर्चा में हर्ष दुबे और आरक्षण विरोधी समूहों की भूमिका का भी जिक्र हुआ. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने सवाल उठाया कि अलग-अलग समूहों के बीच सरकार की बातचीत और कुछ चेहरों को प्रमुखता मिलने का राजनीतिक अर्थ क्या है. उनके अनुसार भाजपा के सामने एक कठिन संतुलन है. पार्टी का एक वैचारिक आधार तथाकथित सवर्ण सामाजिक समूहों में है, जबकि उसकी चुनावी राजनीति दलितों और पिछड़ों के बड़े समर्थन के बिना नहीं चल सकती. यही वैचारिक और व्यावहारिक राजनीति के बीच का तनाव अब खुलकर सामने आता दिख रहा है.
यूजीसी की जनवरी 2026 की नियमावली भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा रही. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि परिसरों में भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों को इस तरह पेश किया गया, मानो वे सामान्य वर्ग के खिलाफ हों, जबकि नियमों का दायरा विभिन्न आरक्षित श्रेणियों से जुड़े लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकना था. उन्होंने सवाल उठाया कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए बने नियम अचानक गांवों और कस्बों में राजनीतिक बहस का विषय कैसे बन गए.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने इसे हिंदुत्व की राजनीति के सामने एक गहरे अंतर्विरोध के रूप में देखा. उनके मुताबिक हिंदू एकता की राजनीति जाति को पीछे धकेलकर एक साझा धार्मिक पहचान बनाने की कोशिश करती रही, लेकिन संसाधनों, अवसरों और प्रतिनिधित्व का सवाल आते ही जाति फिर केंद्र में आ जाती है. आरक्षण की बहस इसी टकराव को सामने ला रही है.
जुलाई के जंतर-मंतर जमावड़े को लेकर उन्होंने एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव की ओर भी इशारा किया. उनके अनुसार वहां अलग-अलग जातियों और समुदायों के युवाओं ने शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था जैसे साझा मुद्दों पर एक साथ आवाज उठाई. एक दलित युवा के नेतृत्व में तथाकथित उच्च जातियों और अन्य समुदायों की भागीदारी को उन्होंने भारतीय राजनीति के लिए एक असाधारण दृश्य बताया.
बातचीत के अंत में निधीश त्यागी ने इसे "दो भारतों" के संघर्ष से जोड़ा. एक भारत वह है जो शिक्षा, अवसर, सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता के सवालों पर लोगों को साथ लाने की कोशिश करता है. दूसरा भारत वह है, जिसकी राजनीति जाति, असमानता और सामाजिक विभाजन के सवालों से लगातार जूझ रही है.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि आगे की राजनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि विपक्ष और सामाजिक समूह इन सवालों को केवल जातीय टकराव तक सीमित रखते हैं या संसाधनों के बंटवारे और सामाजिक समानता के व्यापक सवालों से जोड़ पाते हैं.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

