भारत ने किस तरह ‘ब्रेनवॉश’ किए गए निवेशकों की एक पीढ़ी तैयार की और इससे पैदा हुई व्यापक आर्थिक तबाही

 ‘जीक्वांट इनवेस्टेक’ के संस्थापक शंकर शर्मा बताते हैं कि 90 के दशक के उत्तरार्ध में पोखरण-2 के बाद, मैंने 'बिजनेस वर्ल्ड' के लिए एक लेख लिखा था. उस समय एक ज्वलंत सवाल था: यदि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) अपना सारा डॉलर एक साथ भारतीय बाज़ार से निकाल लें, तो क्या होगा? आम सहमति यह थी कि भारत 1991 की तरह फिर दिवालिया हो जाएगा. लेकिन मेरा तर्क बिल्कुल अलग था—भारत से डॉलर का अचानक बाहर उड़ जाना असंभव था. ऐसा देश के प्रति किसी प्रेम के कारण नहीं, बल्कि यहाँ से बाहर निकलने की जटिल व्यवस्था के कारण. शर्मा द्वारा पिछले वर्ष अंग्रेजी में लिखे गए लंबे लेख के हिंदी में अनुदित और संपादित अंश हम यहां पेश कर रहे हैं.

शर्मा के मुताबिक, सरल शब्दों में, जब एफआईआई बेचने का फैसला करते हैं, तो उन्हें किसी खरीदार की ज़रूरत होती है. उस दौर में हमारे पास खरीदारी की बड़ी ताकत नहीं थी. नतीजतन, बाज़ार बिना किसी बड़े वॉल्यूम के ही क्रैश हो जाता था. यदि एफआईआई अपनी 1 बिलियन डॉलर की होल्डिंग में से केवल 1 मिलियन डॉलर भी बेचते, तो कीमत 20% गिर जाती थी.  आगे और बेचने का मतलब था अपनी ही कागज़ी संपत्ति को और मटियामेट करना.

इसलिए, एफआईआई का 'मास एग्जिट' (बड़े पैमाने पर निकास) केवल एक सुस्त सैद्धांतिक संभावना थी. माफिया की तरह, वे केवल प्रवेश कर सकते थे, बाहर नहीं निकल सकते थे. भारतीय शेयर बाज़ार 'द परफेक्ट फाइनेंशियल होटल कैलिफोर्निया' था, जहाँ आना आसान था पर जाना नामुमकिन. एक चतुर सेल्समैन के रूप में, मैं अक्सर बेचने आए एफआईआई को यह कहकर उल्टा खरीदार बना देता था कि "शेयर बहुत सस्ता हो चुका है, अब 10 मिलियन डॉलर की और खरीदारी करो." यह बकवास पर टिकी व्यावहारिक 'देशभक्ति' थी, जो काम करती थी.

लेकिन पिछले पांच वर्षों में कहानी पूरी तरह बदल चुकी है. आज हमने बहुत प्यार से युवा भारतीय निवेशकों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार की है, जिसे एफआईआई की बिकवाली के समय खरीदारी करने के लिए स्टेरॉयड देकर मोटा किया गया है. इसने विदेशी पूंजी जुटाने के मूल मैक्रोइकोनॉमिक तर्क को ही ख़त्म कर दिया है. गरीब देश में विदेशी डॉलर लाने का नियम यही है कि वह आसानी से बाहर न जा सके; उसे बाहर निकलने के लिए खुद से बड़ा कोई विदेशी मूर्ख ढूंढना होगा. लेकिन हमारे यहाँ, एफआईआई को सुरक्षित निकास देने के लिए भारतीय रिटेल निवेशकों ने खुद इस 'सबसे बड़े मूर्ख' की भूमिका को अपना लिया है.

म्यूचुअल फंडों, डिस्ट्रीब्यूटर्स और राजनीतिज्ञों के नेतृत्व में चाटुकारों का एक पूरा उद्योग खड़ा हुआ है, जिसे वित्तीय मीडिया 'देशभक्ति के नारे' का तड़का देता है. इन सबने मिलकर लगातार बढ़ते बाज़ारों का एक काल्पनिक स्वर्ग रच दिया है, जिसका अंतर्निहित संदेश है: एफआईआई  मूर्ख हैं और भारतीय जनता जीनियस है. यदि कोई इसके विपरीत सच कहना चाहे, तो उसे वित्तीय मीडिया द्वारा सर्जिकल तरीके से चुप करा दिया जाता है.

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मीडिया द्वारा वित्तीय शिक्षा के नाम पर केवल कचरा परोसा गया है. सभी असुविधाजनक तथ्यों को जनता से छुपाया गया है. "भारतीय शेयरों ने 30-40 वर्षों में 15% का चक्रवृद्धि रिटर्न दिया है" यह वाक्य 'अच्छे दिन' का वित्तीय रूप है. लेकिन कोई उतार-चढ़ाव और शार्प रेशियो की बात नहीं करता कि क्या यह वास्तव में फिक्स्ड डिपॉजिट को मात देता है?

मैंने 2019 की मॉर्निंगस्टार कॉन्फ्रेंस में दिखाया था कि उससे पिछले 10 वर्षों में भारतीय शेयरों से मिलने वाला डॉलर रिटर्न बिल्कुल 'शून्य' था. उसके बाद भारतीय पैसे का विदेशी इक्विटी में जाना शुरू हुआ, लेकिन इस सीधे पैमाने पर जनता को कभी शिक्षित नहीं किया गया. आज की पीढ़ी टीवी और यूट्यूब से केवल सतही ज्ञान ले रही है. सोशल मीडिया पर किसी अपवाद वाली घटना को अचूक नियम बनाकर चमकाया जाता है. 80 और 90 के दशक में टीवी या यूट्यूब न होने के कारण हमें डेटा का वास्तविक विश्लेषण करना पड़ता था, न कि टीवी एंकरों के साथ मिलकर अंधाधुंध पैसा कमाने की दौड़ में भागना.

मीडिया और फंड मैनेजर्स ने कभी यह नहीं बताया कि कैसे सरकारी पूंजीगत व्यय से प्रेरित जीडीपी विकास ने राजकोषीय घाटे को आसमान पर पहुँचा दिया है, जिसका जीवनकाल कछुए जैसा नहीं बल्कि तितली जैसा छोटा है. किसी ने टीवी पर आकर यह स्वीकार नहीं किया कि 2014-2020 के बीच देश की जीडीपी वृद्धि और शेयर बाज़ार का रिटर्न बेहद कमज़ोर था. किसी अखबार ने नहीं बताया कि भारत पूरे 2024 में दुनिया के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले बाज़ारों में (24वें नंबर पर) था. हमने निवेशकों को प्रयोगशाला की पेट्री डिशेज में पाला है और उनकी सोचने की क्षमता छीन ली है.

निवेश केवल बहादुरी का खेल नहीं है; यह मूल रूप से पूंजी के संरक्षण के बारे में है. लेकिन हमारे यहाँ गोलियां और मोर्टार के गोले झेलने को सामान्य समझ का विकल्प बना दिया गया है. जब सुनामी आ रही हो, तो बीच बार पर मुफ्त कॉकटेल का इंतज़ार नहीं किया जाता, बल्कि वहाँ से भागा जाता है.

अतीत में हम रद्दी शेयर विदेशियों को बेचकर गर्व करते थे कि "अंग्रेज़ों ने हमें 200 साल लूटा, अब हमारी बारी है." लेकिन आज, हमारे लोग फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफ एण्ड ओ) के सट्टे में डूबे हैं, जिससे ब्रोकिंग उद्योग तो हज़ारों करोड़ कमा रहा है, लेकिन हमारे लोग लाखों करोड़ रुपये का डेरिवेटिव मुनाफा 'जेन स्ट्रीट' जैसे विदेशी फंडों को निर्यात कर रहे हैं.

विदेशी मुद्रा भंडार का यह नुकसान तो बुरा था ही, लेकिन बिना किसी कीमत के एफआईआई को इक्विटी बाज़ार से यह 'जेल ब्रेक' देना और अपने लोगों के सिर अवमूल्यित कबाड़ मढ़ना, इतिहास की सबसे खौफनाक कहानी होगी. यह सम्मोहित लेमिंग्स (बिना सोचे भागने वाले जीवों) की तरह चट्टान से नीचे कूदने जैसा है, जिन्हें लाखों फॉलोअर्स वाले म्यूचुअल फंड सीआईओ बड़े लाड-प्यार से देख रहे हैं. हर साल बाज़ार के 40% बढ़ने के बाद एफआईआई से अरबों डॉलर की खरीदारी करना कभी भी 'स्वीकार्य जोखिम' नहीं हो सकता.

डेरिवेटिव और इक्विटी के ये दो रास्ते पूरे आर्थिक इतिहास में गरीबों से अमीरों की ओर धन के सबसे बड़े हस्तांतरण का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह औपनिवेशिक काल में गोरों द्वारा की गई लूट से भी बड़ा है. इतिहास में पहली बार गरीबों ने अमीरों को भीख दी है—धारावी ने अंततः मैनहट्टन को और अमीर बना दिया है. सचमुच, अजूबों का अंत कभी नहीं होता.

 

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