भारत में चावल उत्पादन में दो दशकों की सबसे बड़ी गिरावट की आशंका, घरेलू कीमतें बढ़ेंगी

‘रॉयटर्स’ में राजेंद्र जाधव की रिपोर्ट है कि भारत का चावल उत्पादन एक दशक में पहली बार गिर सकता है और यह गिरावट लगभग 20 वर्षों में सबसे अधिक हो सकती है. फसल के पकने के समय सामान्य से कम बारिश के कारण पैदावार घटने का खतरा पैदा हो गया है.

अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक और निर्यातक देश में उत्पादन घटने से घरेलू कीमतें बढ़ेंगी और निर्यात महंगा हो जाएगा. यह स्थिति ऐसे समय में बन रही है जब थाईलैंड और वियतनाम जैसे अन्य निर्यातक देशों में भी कीमतें पहले से बढ़ रही हैं. हालांकि, हाल के वर्षों में रिकॉर्ड पैदावार से तैयार हुआ भारी स्टॉक नई दिल्ली को कम उत्पादन के बावजूद रिकॉर्ड स्तर पर निर्यात बनाए रखने की अनुमति देगा.

राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्णा राव ने कहा, "बारिश में कमी के कारण पैदावार कम होगी. हमारा अनुमान है कि उत्पादन में लगभग 10 मिलियन मीट्रिक टन की गिरावट आ सकती है."

यह पिछले साल के रिकॉर्ड 154 मिलियन टन से लगभग 6.5% की गिरावट होगी और 2009/10 के बाद से सबसे बड़ी गिरावट होगी, जब अल नीनो के कारण पड़े सूखे ने उत्पादन को घटा दिया था. राव ने कहा कि हाल के हफ्तों में लंबे समय तक रहे सूखे ने दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में पैदावार की क्षमता को काफी कम कर दिया है.मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि 1 जून से शुरू हुए चार महीने के मानसून सत्र के बाद से भारत में अब तक सामान्य से 15% कम बारिश हुई है. लेकिन चावल उगाने वाले कुछ राज्यों में यह कमी 42% तक है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 11 सितंबर तक ग्रीष्मकालीन (खरीफ) चावल का रकबा 42.68 मिलियन हेक्टेयर था, जो एक साल पहले की तुलना में लगभग 4% कम है. ग्रीष्मकालीन फसलें कुल उत्पादन का 80% से अधिक हिस्सा होती हैं, जबकि बाकी हिस्सा शीतकालीन (रबी) फसलों का होता है.

कृषि जिंस व्यापारी 'ओलम एग्री इंडिया' के डिप्टी कंट्री हेड नितिन गुप्ता ने कहा कि जलाशयों में सामान्य से कम पानी होने के कारण शीतकालीन चावल के रकबे में भी गिरावट आने की संभावना है.

कम उत्पादन की उम्मीद में स्थानीय चावल की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं, जिससे निर्यात कीमतें एक साल से अधिक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं. राव ने कहा, "इस साल प्रीमियम किस्मों को उगाने वाले किसानों को खुले बाजार में ऊंची कीमतें मिलेंगी। इससे सरकार को होने वाली बिक्री में भी कमी आएगी."

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