भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमानों के अनुसार, देश की नाममात्र जीडीपी 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गई है और भारत दुनिया की चार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है. अर्थव्यवस्था का विस्तार, निवेश में वृद्धि और वित्तीय गतिविधियों में लोगों की बढ़ती भागीदारी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं. लेकिन इस विकास का लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है. आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए वेतन, रोजगार की सुरक्षा और क्रय शक्ति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है. इस स्थिति को 'के-आकार की आर्थिक वृद्धि' कहा जाता है.
अंग्रेजी के अक्षर 'के' की तरह इस अर्थव्यवस्था में एक वर्ग की आय, संपत्ति और अवसर बढ़ रहे हैं, जबकि दूसरा वर्ग स्थिर आमदनी, असुरक्षित रोजगार और आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है. भारत की आर्थिक विकास यात्रा में ये दोनों स्थितियां एक साथ दिखाई दे रही हैं.
विकास का लाभ किसे मिल रहा है?
भारत के म्यूचुअल फंड उद्योग की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां मार्च 2019 में लगभग 24.5 लाख करोड़ रुपये थीं, जो मार्च 2025 तक बढ़कर 65.7 लाख करोड़ रुपये हो गईं. डिजिटल निवेश मंचों, व्यवस्थित निवेश योजनाओं (एसआईपी) और शेयर बाजार में बढ़ती भागीदारी ने निवेशकों का दायरा बढ़ाया है. लंबे समय में बाजार के विस्तार से उन लोगों को संपत्ति बनाने का अवसर मिला है, जिनके पास निवेश की क्षमता है. यह आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन सवाल है कि इसका लाभ कितने लोगों तक पहुंच रहा है.
मजदूरी और रोजगार की दूसरी तस्वीर
श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2010 के दशक के मध्य से वास्तविक ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि कमजोर रही है या लंबे समय तक ठहराव बना रहा है. इसका अर्थ है कि मजदूरी में रुपये के रूप में हुई मामूली बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा महंगाई के कारण खर्च हो गया.
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, 2023-24 में नियमित वेतन पाने वाले कर्मचारियों की औसत मासिक आय 20,702 रुपये थी. स्वरोजगार करने वालों की औसत आय 13,279 रुपये और दिहाड़ी मजदूरों की औसत दैनिक आय 418 रुपये थी. पिछले वर्ष की तुलना में नियमित कर्मचारियों की आय में 6.2 प्रतिशत, जबकि स्वरोजगार करने वालों की आय में केवल 1.1 प्रतिशत वृद्धि हुई. ये आंकड़े महंगाई के प्रभाव को शामिल नहीं करते.
घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति औसत मासिक उपभोग व्यय 4,122 रुपये और शहरी भारत में 6,996 रुपये था. ग्रामीण औसत के आधार पर चार सदस्यों वाले परिवार का मासिक खर्च लगभग 16,500 रुपये बैठता है. इसी राशि से भोजन, बिजली, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जरूरतें पूरी करनी होती हैं. ऐसे परिवारों के लिए बचत करना और बीमारी या बेरोजगारी जैसी आपात स्थिति का सामना करना कठिन है.
बढ़ती आर्थिक असमानता
विश्व असमानता प्रयोगशाला के शोध के अनुसार, भारत की राष्ट्रीय आय का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी को मिलता है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत है. देश की कुल संपत्ति का लगभग 40.1 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास केवल 6.4 प्रतिशत संपत्ति है.
संपत्ति केवल वर्तमान खर्च की क्षमता नहीं बढ़ाती, बल्कि बेहतर शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा और निवेश के अवसर भी उपलब्ध कराती है. जिन परिवारों के पास संपत्ति नहीं है, उनके लिए बेरोजगारी और आर्थिक संकट का सामना करना अधिक कठिन होता है. इस तरह असमानता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रह सकती है.
महिलाओं का रोजगार और महंगाई का दबाव
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, 2022-23 में ग्रामीण महिलाओं के लगभग 71 प्रतिशत रोजगार को स्वरोजगार की श्रेणी में रखा गया था. लेकिन इसमें सफल कारोबारी महिलाओं के साथ परिवार की खेती या घरेलू व्यवसाय में बिना वेतन काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं. इसलिए स्वरोजगार में वृद्धि को अपने आप आर्थिक स्वतंत्रता या उद्यमिता का प्रमाण नहीं माना जा सकता. महत्वपूर्ण यह है कि महिलाओं को काम से स्वतंत्र आय, सुरक्षा और आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं या नहीं.
खाद्य महंगाई ने भी कम आय वाले परिवारों पर दबाव बढ़ाया है. सितंबर 2024 में खाद्य महंगाई 9.24 प्रतिशत और अक्टूबर में 10.87 प्रतिशत रही. गरीब परिवारों के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा भोजन पर जाता है. कीमतें बढ़ने पर उन्हें पौष्टिक भोजन में कटौती, इलाज टालने या कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. स्वास्थ्य खर्च इस असुरक्षा को और बढ़ाता है. सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च अभी भी जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लक्ष्य से कम है. ऐसे में गंभीर बीमारी परिवार की वर्षों की बचत खत्म कर सकती है.
मनरेगा और नीतिगत सुधार
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों तक मजदूरी वाले रोजगार की कानूनी गारंटी देती है. कृषि संकट और आर्थिक मंदी के दौरान यह ग्रामीण आय को सहारा देती है. लेकिन मजदूरी भुगतान में देरी और अपर्याप्त बजट इसकी प्रभावशीलता कम करते हैं. योजना को वास्तविक रोजगार मांग के अनुसार धन मिलना और मजदूरी का समय पर भुगतान होना जरूरी है.
के-आकार की वृद्धि को बदलने के लिए रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों, विनिर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देना होगा. न्यूनतम मजदूरी को प्रभावी ढंग से लागू करना, महंगाई के अनुसार उसमें संशोधन करना और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाना भी जरूरी है. इसके साथ ही संपत्ति, विरासत और पूंजीगत आय पर कर व्यवस्था के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक बुनियादी ढांचे के लिए संसाधन जुटाने पर विचार किया जाना चाहिए.
भारत का 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य केवल जीडीपी, शेयर बाजार या निवेश के आंकड़ों से पूरा नहीं होगा. आर्थिक विकास की असली अहमियत उसकी गति में ही नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसका लाभ कितने लोगों तक पहुंचता है. भारत आगे बढ़ रहा है. अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि देश के नागरिक भी उसके साथ आगे बढ़ें.
(डॉ. दिव्याश्री एलायंस यूनिवर्सिटी में और डॉ. अनुराधा पी. एस. क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. मूल लेख अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है.)

