कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं: भारत में सेंसरशिप के दबाव से निजी फिल्म स्क्रीनिंग के मंच हो रहे बंद

विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक केंद्रों और फिल्म महोत्सवों में राजनीतिक रूप से संवेदनशील फिल्मों की स्क्रीनिंग पर सेंसर बोर्ड के हस्तक्षेप, पुलिस के दबाव और अनुमति से इनकार की घटनाएं बढ़ रही हैं. औपचारिक प्रतिबंध न होने के बावजूद आयोजक संभावित कार्रवाई के डर से फिल्में दिखाने से पीछे हट रहे हैं.

'आर्टिकल 14' में तत्सम मुखर्जी की रिपोर्ट के मुताबिक, 17 सितंबर 2026 को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्मकार ललित वाचानी की डॉक्यूमेंट्री प्रिजनर नंबर 626710 इज प्रेजेंट की हैदराबाद स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईआईआईटी) में प्रस्तावित स्क्रीनिंग पर आपत्ति जताई. बोर्ड ने संस्थान के आयोजकों को आवश्यक कार्रवाई के लिए चेतावनी दी. इससे कुछ दिन पहले बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में इसी फिल्म की स्क्रीनिंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की आपत्ति के बाद रद्द कर दी गई थी.

यह डॉक्यूमेंट्री सामाजिक कार्यकर्ता और शोधकर्ता उमर खालिद की जेल में कैद पर आधारित है. खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों में कथित भूमिका के लिए गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामला दर्ज है. उनकी सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई है और वह छह साल से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं. फिल्म में उनके करीबी सहयोगियों के साक्षात्कार के जरिए उनकी गिरफ्तारी के पीछे राजनीतिक कारण होने का तर्क रखा गया है.

फिल्मकार अनुराग कश्यप ने कहा कि निजी और गैर-लाभकारी स्क्रीनिंग पर सीबीएफसी का अधिकार क्षेत्र नहीं है. उन्होंने मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हम पहले से ही ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां लोकतंत्र की टी-शर्ट पहनकर फासीवादी समय में रह रहे हैं.”

ललित वाचानी ने बताया कि अगस्त 2024 से उन्हें अपनी फिल्मों की स्क्रीनिंग के लिए जगह मिलने में मुश्किलें आने लगीं. दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र ने उनकी फिल्म की निजी स्क्रीनिंग की अनुमति तो दी, लेकिन सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते समय आयोजन स्थल का नाम छिपाने को कहा. एक फिल्म महोत्सव ने आरएसएस पर उनकी आलोचनात्मक फिल्मों के शीर्षक भी कार्यक्रम सूची में अधूरे प्रकाशित किए. आयोजकों ने इसकी वजह पास में आयोजित आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के कार्यक्रम को बताया.

फिल्मकार हनी त्रेहान की फिल्म सतलुज, जिसका पहले नाम पंजाब '95 था, करीब चार साल तक सेंसर बोर्ड की मंजूरी के लिए संघर्ष करती रही. यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. त्रेहान ने इस दौरान पत्रकारों, वकीलों और सामाजिक संगठनों के लिए एक दर्जन से अधिक निजी स्क्रीनिंग आयोजित कीं. लेकिन अगस्त 2025 में मुंबई में प्रस्तावित एक स्क्रीनिंग से पहले पुलिस अधिकारियों ने आयोजन स्थल के मालिकों से कार्यक्रम रद्द करने को कहा. बाद में त्रेहान को भी कथित तौर पर निजी स्क्रीनिंग रोकने के लिए कहा गया.

फिल्म 3 जुलाई 2026 को जी5 पर रिलीज हुई, लेकिन 48 घंटे से भी कम समय में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत जारी आदेश के बाद इसे हटा दिया गया. सरकार की अंतर-विभागीय समिति ने फिल्म पर रोक को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे राष्ट्रीय संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो सकता है. इसके बावजूद फिल्म की प्रतियां इंटरनेट पर प्रसारित होने लगीं और पंजाब के गुरुद्वारों तथा गांवों में इसकी स्क्रीनिंग आयोजित की गई.

फिल्मकार आनंद पटवर्धन के मुताबिक, 2014 के बाद सेंसरशिप का दबाव बढ़ा है. पहले फिल्मकार सेंसर बोर्ड के फैसलों को फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण में चुनौती दे सकते थे, लेकिन इसे 2021 में भंग कर दिया गया. वहीं, दिबाकर बनर्जी की फिल्म तीस को 2024 से अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया गया, जबकि उसे सेंसर प्रमाणपत्र के लिए भेजा भी नहीं गया था.

दबाव का असर फिल्म महोत्सवों पर भी दिख रहा है. केरल के अंतरराष्ट्रीय डॉक्यूमेंट्री एवं लघु फिल्म महोत्सव 2026 की 31 फिल्में अब भी मंजूरी का इंतजार कर रही हैं. राज्य की चलचित्र अकादमी का कहना है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सेंसर प्रमाणपत्र से छूट देने से इनकार किया है, जबकि मंत्रालय ने इस दावे को खारिज किया है. फिल्म प्रोग्रामर मोनिका वाही के मुताबिक, अनुमति देने की प्रक्रिया अनिश्चित और मनमानी हो गई है. मंत्रालय ने आवेदन में फिल्म के मूल देश के प्रमाणपत्र और महोत्सव के वित्तपोषण जैसे नए विवरण भी मांगने शुरू किए हैं.

कानूनी विशेषज्ञ आरती राघवन का कहना है कि निजी स्क्रीनिंग को नियंत्रित करने के लिए सीबीएफसी की शक्तियां स्पष्ट नहीं हैं. उन्होंने संस्थानों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्रवाई करने वाले अधिकारियों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत बताई.

रिपोर्ट के अनुसार, सेंसरशिप अब केवल फिल्मों पर औपचारिक प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं है. कई बार आयोजन स्थल स्क्रीनिंग स्थगित कर देते हैं, आयोजक मंजूरी का इंतजार करते रहते हैं या बिना कारण बताए फिल्म हटा देते हैं. इस अनिश्चितता के कारण निजी सांस्कृतिक मंच भी दबाव में आ रहे हैं और आयोजक संभावित कार्रवाई के डर से खुद ही फिल्मों का प्रदर्शन रोक रहे हैं.

(तत्सम मुखर्जी बेंगलुरु के फिल्म समीक्षक और संस्कृति पत्रकार हैं.)

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ललित वाचानी डॉक्यूमेंट्री उमर खालिद स्क्रीनिंग रद्द

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