विस्तृत अध्ययन पूरा होने तक ग्रेट निकोबार परियोजनाओं को स्थगित करें: यूएन समिति की अनुशंसा

संयुक्त राष्ट्र की 'नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति' (सीईआरडी) ने भारत सरकार को ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित ₹92,000 करोड़ की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तुरंत स्थगित करने की सिफारिश की है. समिति का सुझाव है कि जब तक स्वतंत्र और विस्तृत पर्यावरण, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक प्रभाव अध्ययन पूरे नहीं हो जाते, तब तक निर्माण कार्य रोक दिया जाए.

प्रस्तावित परियोजनाओं (ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, हवाई अड्डा, पावर प्लांट आदि) के कारण लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वर्षावन नष्ट हो जाएंगे.  इससे द्वीप के स्वदेशी 'शोम्पेन' और 'निकोबारी' जनजातियों का अस्तित्व और अधिकार गंभीर खतरे में हैं. समिति ने चिंता व्यक्त की है कि इन समुदायों से उनकी "स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति" नहीं ली गई.

आतिरा पेरिनचेरी की रिपोर्ट के अनुसार, सीईआरडी ने ध्यान दिलाया कि भारत का वर्तमान विधायी ढांचा, विशेषकर वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार स्वदेशी समुदायों के भूमि और संसाधनों के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा नहीं कर पा रहा है. समिति ने सिफारिश की है कि भारत अपने एफआरए और पेसा (पंचायत विस्तार) जैसे कानूनों की समीक्षा करे और उन्हें अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुरूप बनाए.

रिपोर्टों के अनुसार, दावों के निपटारे में ग्राम सभाओं को दरकिनार कर राज्य द्वारा नियुक्त निकायों को शक्तियां दी गई हैं. वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2024 के तहत जन-परामर्श से दी गई छूट पर भी सवाल उठाए गए हैं. जनजातीय अधिकार शोधकर्ता बिजॉय सी.आर. के अनुसार, मुख्य समस्या कानून में नहीं, बल्कि प्रशासन और न्यायपालिका द्वारा एफआरए के प्रावधानों के "व्यवस्थित उल्लंघन" में है.

बहरहाल, शोम्पेन और निकोबारी समुदाय बिना वन अधिकार तय हुए परियोजनाओं को दी गई मंजूरी का विरोध कर रहे हैं. कोलकाता उच्च न्यायालय में अंडमान प्रशासन ने माना कि ग्राम सभाओं की सहमति बैठकों में केवल 2% से 15% उपस्थिति थी, जिसे समिति ने अनुचित प्रक्रिया माना है.

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