असम राइफल्स ने म्यांमार और पूर्वोत्तर भारत पर आरएसएस से जुड़े संगठन के साथ मिलकर सेमिनार की मेजबानी की

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ में अंगना चक्रवर्ती की यह रिपोर्ट गुवाहाटी में आयोजित एक अभूतपूर्व दो-दिवसीय सम्मेलन पर आधारित है, जिसका विषय “भारत-म्यांमार सीमा मुद्दे और आगे की राह” था. इस आयोजन की सबसे उल्लेखनीय बात इसकी सह-मेजबानी थी. इस सेमिनार का आयोजन केंद्र सरकार के प्रमुख उग्रवाद-विरोधी अर्धसैनिक बल 'असम राइफल्स' और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सहयोगी संगठन 'सीमांत चेतना मंच पूर्वोत्तर' द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था. इस कार्यक्रम में पूर्वोत्तर के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों (डिब्रूगढ़, मणिपुर और राजीव गांधी विश्वविद्यालय) ने भी भागीदारी की. यहां रिपोर्ट का हिंदी में अनुदित सारांश प्रस्तुत है:

सेमिनार के दौरान आरएसएस से जुड़े वक्ताओं ने अपने पारंपरिक वैचारिक दृष्टिकोण को खुलकर सामने रखा. धर्मांतरण और उग्रवाद पर बोलते हुए वरिष्ठ आरएसएस कार्यकर्ता जगदंबा मल्ल ने सीधे तौर पर ईसाई धर्म और मिशनरियों को नागालैंड में उग्रवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने दावा किया कि जहाँ धार्मिक बदलाव (धर्मांतरण) होता है, वहीं उग्रवाद पनपता है. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीतियों और अंग्रेजों की भी आलोचना की.

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अखंड भारत के संदर्भ में मल्ल का तर्क था कि पूर्वोत्तर के आदिवासी मूल रूप से हिंदू थे, जिन्हें अंग्रेजी और मिशनरियों के प्रभाव से 'गैर-हिंदू' बना दिया गया. वहीं, 'सीमा जागरण मंच' के अखिल भारतीय संयोजक मुरलीधर भिंडा ने 'अखंड भारत' की अवधारणा का जिक्र करते हुए म्यांमार को भारत का पुराना हिस्सा बताया और वहाँ चल रही भारत-विरोधी गतिविधियों को समाप्त करने के लिए अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया.

इस सेमिनार में असम राइफल्स के महानिदेशक (डीजी) लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेरा, महानिरीक्षक (आईजी) मेजर जनरल हरिंदर सिंह मावी और सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता सहित कई सेवारत और सेवानिवृत्त सैन्य व खुफिया अधिकारी शामिल हुए.

मेजर जनरल मावी ने असम राइफल्स और आरएसएस के संगठन के इस संयुक्त प्रयास की सराहना की और इसे "परिचालन अनुभव" और "शैक्षणिक कठोरता" का मिलन स्थल बताया. सैन्य अधिकारियों ने आम नागरिकों के साथ सीमा सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील डेटा और विश्लेषण साझा किए, जो आमतौर पर सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं.

सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने भारत-म्यांमार सीमा को अत्यधिक संवेदनशील और जटिल बताते हुए कई बड़ी चुनौतियाँ रेखांकित कीं. मसलन, एनएससीएन, उल्फा, और पीएलए जैसे भारतीय उग्रवादी समूह म्यांमार के सगाइंग और चिन क्षेत्रों में अपने शिविर चला रहे हैं और नशीले पदार्थों की तस्करी तथा पारगमन कर से अपनी फंडिंग कर रहे हैं. म्यांमार में चीन आर्थिक लाभ और हथियारों की आपूर्ति के जरिए जातीय सशस्त्र संगठनों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ रणनीतिक क्षमता बढ़ाने के लिए कर रहा है. बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता, ऑनलाइन सूचना युद्ध, जनसांख्यिकीय चिंताएं और अलगाववादी नैरेटिव इस खतरे को केवल "सैन्य बल" से हल करने लायक नहीं छोड़ते; इसके लिए रणनीतिक धैर्य और एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है.

सेमिनार में म्यांमार के भीतर चल रहे संघर्ष और भारत की कूटनीति पर भी चर्चा हुई. पूर्व सैन्य खुफिया अधिकारी कर्नल उज्ज्वल अभिषेक झा ने चेतावनी दी कि म्यांमार की सैन्य सरकार (जुंटा) के खिलाफ लड़ रहे 'चिन नेशनल आर्मी' (सीएनए) जैसे समूहों का समर्थन करना भारत के लिए राजनयिक संकट पैदा कर सकता है, क्योंकि भारत सरकार के म्यांमार जुंटा के साथ गहरे संबंध हैं. इसके अतिरिक्त, शिक्षाविदों ने रेखांकित किया कि अमेरिका और चीन दोनों ही आर्थिक और रणनीतिक परियोजनाओं के माध्यम से म्यांमार में अपना प्रभाव बढ़ाने की होड़ में हैं, जिससे भारत पर भी प्रभाव पड़ता है.

पारंपरिक रूप से, भारत के सुरक्षा बल और रक्षा एजेंसियां किसी भी प्रकार के राजनीतिक या वैचारिक विवादों से दूरी बनाए रखने के लिए सीधे तौर पर ऐसे मंच साझा नहीं करतीं. कलेक्टिव की रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर सरकार की ओर से केवल सेवानिवृत्त अधिकारी या थिंक-टैंक ही बोलते रहे हैं. परंतु, इस गुवाहाटी सम्मेलन ने उस पुरानी परंपरा को पूरी तरह से तोड़ दिया.

खास बात यह भी है कि यह बैठक ऐसे समय में हुई जब मणिपुर में कुकी और नागा सशस्त्र समूहों के बीच हिंसा में तेजी देखी जा रही है. असम राइफल्स पर एक बार फिर, इस बार नागा नेताओं द्वारा (जिन्होंने कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे) कुकी सशस्त्र समूहों का पक्ष लेने का आरोप लगाया गया है. असम राइफल्स ने ऐसे आरोपों से इनकार किया है. इसके अलावा, खुद आरएसएस को मणिपुर घाटी में मैतेई समुदाय के भीतर अधिक गहरा भगवा रंग भरने का प्रयास करने की अपनी भूमिका के लिए जांच का सामना करना पड़ा है.

बहरहाल, इस पूरी रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह है कि यहाँ महत्वपूर्ण बात प्रस्तुतियों की विषय-वस्तु (जो कि पहले से स्थापित सुरक्षा राय जैसी ही थी) नहीं, बल्कि उसका माहौल और मंच था. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक मातृ संगठन (आरएसएस) और देश के एक संवेदनशील राज्य सुरक्षा बल का इस प्रकार एक साथ आना एक बड़ा संकेत है. यह मिलाप दर्शाता है कि भारत के सुरक्षा तंत्र, उसकी रणनीतिक सोच और नीतियों पर अब दक्षिणपंथी वैचारिक ताकतों का प्रभाव संभावित रूप से बढ़ रहा है. 

Previous
Previous

मनोज कुमार झा | लोकतंत्र संदेह के सिद्धांत पर चलने लगा है

Next
Next

श्रवण गर्ग | विदेशी सरकारों ने प्रधानमंत्री की एक कमजोरी पहचान ली है. सम्मान दीजिए, तारीफ कीजिए और फिर अपने हित साध लीजिए