श्रवण गर्ग | विदेशी सरकारों ने प्रधानमंत्री की एक कमजोरी पहचान ली है. सम्मान दीजिए, तारीफ कीजिए और फिर अपने हित साध लीजिए

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार विदेश यात्राओं, विदेशी सरकारों से मिल रहे सर्वोच्च सम्मानों और भारत के भीतर मौजूद गंभीर चुनौतियों के बीच बनते विरोधाभास पर विस्तार से चर्चा की. उनका कहना है कि सवाल पुरस्कारों का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं और शासन की जवाबदेही का है.

चर्चा की शुरुआत इस सवाल से होती है कि जब देश महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, किसानों की समस्याओं, मणिपुर की हिंसा, राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवादों और सीबीएसई छात्रों के आंदोलन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब प्रधानमंत्री लगातार विदेशी दौरों और सम्मान समारोहों में व्यस्त दिखाई देते हैं. इसी संदर्भ में ब्रिटिश अखबार द गार्डियन में प्रकाशित उस रिपोर्ट का उल्लेख किया गया, जिसमें दावा किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पुरस्कार देने की विदेशी सरकारों में एक अलग तरह की उत्सुकता दिखाई देती है.

श्रवण गर्ग का तर्क है कि हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री को मिले कई विदेशी सम्मान अभूतपूर्व बताए गए हैं. कुछ सम्मान पहली बार स्थापित किए गए, तो कुछ को लेकर जल्दबाजी और औपचारिक त्रुटियों की भी चर्चा हुई. उनके अनुसार इससे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सम्मान कैसे मिले, बल्कि यह है कि क्या विदेशी सरकारें भारत की कूटनीतिक जरूरतों और प्रधानमंत्री की सार्वजनिक छवि को समझते हुए इन सम्मानों का इस्तेमाल अपने हित साधने के लिए कर रही हैं.

चर्चा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय प्रवासी समुदाय यानी इंडियन डायस्पोरा को लेकर है. श्रवण गर्ग का कहना है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरों का सबसे प्रमुख सार्वजनिक कार्यक्रम अक्सर प्रवासी भारतीयों के साथ संवाद होता है. उनके अनुसार पिछले एक दशक में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने प्रवासी भारतीयों के साथ इतने बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं किए. वे इसकी तुलना जवाहरलाल नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश दौरों से करते हुए कहते हैं कि पहले विदेश यात्राओं का केंद्र द्विपक्षीय संबंध और कूटनीतिक बातचीत हुआ करती थी, जबकि अब सार्वजनिक स्वागत और बड़े आयोजन अधिक प्रमुख दिखाई देते हैं.

चर्चा में यह सवाल भी उठाया गया कि जब विपक्षी नेता विदेश जाकर सरकार की आलोचना करते हैं तो उन पर देश की छवि खराब करने का आरोप लगाया जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री स्वयं विदेशों में अपने राजनीतिक विरोधियों और पूर्ववर्ती सरकारों की आलोचना करते रहे हैं. इस दोहरे राजनीतिक मानदंड पर भी सवाल खड़े किए गए.

श्रवण गर्ग का एक और तर्क यह है कि विदेशी सरकारें भारत की रणनीतिक और आर्थिक अहमियत को देखते हुए सम्मानों और प्रशंसाओं के जरिए अपने हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश करती हैं. उनके मुताबिक रक्षा सौदे, व्यापार समझौते और सामरिक साझेदारियां ऐसे अवसर होते हैं, जहां प्रतीकात्मक सम्मान भी कूटनीति का हिस्सा बन जाते हैं. इसलिए इन पुरस्कारों को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के व्यापक संदर्भ में भी देखने की जरूरत है.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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