कैसे ‘हिंदुत्व पॉप’ न्यू इंडिया का साउंडट्रैक बना और बिग टेक ने नफरत को मुख्यधारा तक पहुंचाया
सात साल पहले झारखंड के ग्रामीण इलाकों में रिपोर्टिंग के दौरान मैंने पहली बार हिंदुत्व पॉप संगीत को करीब से सुना था. उस समय यह सिर्फ कुछ इलाकों तक सीमित दिखाई देता था. खुले ट्रकों पर लगे विशाल लाउडस्पीकरों से बजते ये गीत हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ ऐतिहासिक प्रतिशोध लेने, उनके बहिष्कार की अपील करने और कई बार उनके खिलाफ हिंसा की खुली भाषा तक का इस्तेमाल करते थे. रामनवमी जैसे आयोजनों में ये गीत गांवों और कस्बों की सड़कों पर गूंजते थे.
लेकिन जब मैं मुंबई लौटता था, तब शहर के अधिकांश लोगों ने इन गीतों का नाम तक नहीं सुना होता था. यह एक सीमित भूगोल और सीमित श्रोताओं की दुनिया लगती थी.
आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. पिछले कुछ वर्षों में वही गीत, जो कभी झारखंड और उत्तर प्रदेश के छोटे कस्बों तक सीमित थे, अब मुंबई जैसे महानगरों के सार्वजनिक आयोजनों का हिस्सा बन चुके हैं. रामनवमी के जुलूसों से लेकर नवरात्रि के बड़े आयोजनों तक, जहां महंगे टिकट खरीदकर पहुंचने वाला शहरी मध्यवर्ग और अभिजात वर्ग मौजूद रहता है, वहां भी हिंदुत्व पॉप संगीत लोकप्रिय हो चुका है. गणेशोत्सव जैसे पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों में भी कई जगह भक्ति संगीत और लोकप्रिय फिल्मी गीतों की जगह इस तरह के गीतों ने ले ली है.
इस बदलाव का असर केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहा. 2023 के क्रिकेट विश्व कप के दौरान भारत-पाकिस्तान मैच में ऐसा गीत बजाया गया जिसमें हिंदुओं से अपने "दुश्मनों" के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया गया था. स्टेडियम में मौजूद भीड़ उस गीत के साथ गाती और झूमती दिखाई दी. 2024 में महाराष्ट्र में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भी एक ऐसे हिंदुत्व पॉप गीत का मंचन हुआ जिसमें ऐतिहासिक मस्जिदों की जगह मंदिर स्थापित करने की मांग को सांस्कृतिक उत्सव की तरह प्रस्तुत किया गया. कार्यक्रम में देश की राजनीति, उद्योग और मनोरंजन जगत की कई बड़ी हस्तियां मौजूद थीं.
सवाल यह है कि आखिर यह संगीत, जो कभी भारत के कुछ हिस्सों तक सीमित था, पूरे देश में कैसे फैल गया? इसका जवाब हाल में सामने आए एक अध्ययन में दिखाई देता है—बिग टेक कंपनियों की भूमिका.
वॉशिंगटन डीसी स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट (CSOH) के शोधकर्ताओं के साथ किए गए एक अध्ययन में यह जांचने की कोशिश की गई कि यूट्यूब, मेटा, स्पॉटिफाई और एप्पल म्यूजिक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने हिंदुत्व पॉप संगीत के प्रसार में कैसी भूमिका निभाई. अध्ययन में ऐसे 523 गीतों की पहचान की गई जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों, के खिलाफ घृणा, अपमान, भेदभाव या हिंसा का संदेश मौजूद था.
शोध के अनुसार केवल यूट्यूब पर ही ऐसे 210 गीत मिले, जिनमें से लगभग आधे सीधे तौर पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की बात करते थे. इन गीतों को कुल मिलाकर करीब 19.8 करोड़ बार देखा गया. दूसरी तरफ इंस्टाग्राम पर इन गीतों का इस्तेमाल करते हुए लगभग 59 लाख रील्स बनाई गईं. इनमें से प्रत्येक रील सैकड़ों से लेकर लाखों लोगों तक पहुंच सकती थी.
मामला केवल पहुंच और लोकप्रियता का नहीं था. अध्ययन के अनुसार डिजिटल प्लेटफॉर्म इन गीतों को आर्थिक रूप से भी प्रोत्साहित कर रहे थे. यूट्यूब पर उपलब्ध ऐसे 86 प्रतिशत गीतों पर विज्ञापन दिखाई दे रहे थे जो मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसक या घृणास्पद सामग्री रखते थे. इन विज्ञापनों से होने वाली कमाई का हिस्सा कंटेंट निर्माताओं तक पहुंचता था. इसके अलावा "सुपर थैंक्स" जैसे फीचर्स के जरिए दर्शकों को सीधे पैसे भेजने की सुविधा भी उपलब्ध थी.
शोध में जिन बड़े चैनलों का उल्लेख किया गया, उनमें मयूर म्यूजिक जैसे चैनल शामिल थे, जहां ऐसे कई गीत मौजूद थे जो धार्मिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देते थे. यूट्यूब ने इस चैनल को सिल्वर क्रिएटर अवॉर्ड भी प्रदान किया था. इसी तरह मेटा के प्लेटफॉर्मों पर भी कई ऐसे कलाकार विज्ञापन और परफॉर्मेंस बोनस के जरिए कमाई कर रहे थे.
दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश डिजिटल प्लेटफॉर्मों की नीतियां कागज पर घृणास्पद और हिंसक सामग्री के खिलाफ हैं. यूट्यूब ने कुछ चर्चित हिंदुत्व पॉप गायकों के अकाउंट कई बार हटाए भी. लेकिन अध्ययन का दावा है कि इन कार्रवाइयों का असर बेहद सीमित रहा. पुराने अकाउंट हटने के बाद नए अकाउंट बनते रहे और प्रतिबंधित सामग्री दूसरे उपयोगकर्ताओं के जरिए फिर से अपलोड होती रही.
शोधकर्ताओं ने स्वयं 523 में से 225 गीतों की शिकायत प्लेटफॉर्मों से की और उन्हें हेट स्पीच के रूप में रिपोर्ट किया. छह महीने बाद केवल 18 गीत हटाए गए थे. इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या प्लेटफॉर्म अपनी घोषित नीतियों को वास्तव में लागू करने के इच्छुक हैं.
हिंदुत्व पॉप की दुनिया को करीब से देखने वाले लोगों का कहना है कि यह पूरा इकोसिस्टम सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों पर काफी हद तक निर्भर है. कलाकारों की कमाई का बड़ा हिस्सा डिजिटल मोनेटाइजेशन और रॉयल्टी से आता है. सोशल मीडिया पर बढ़ती लोकप्रियता उन्हें ऑफलाइन कार्यक्रमों, राजनीतिक-सांस्कृतिक आयोजनों और मंचीय प्रस्तुतियों के अवसर भी दिलाती है. कई आयोजक कलाकारों को उनके फॉलोअर्स की संख्या के आधार पर भुगतान करते हैं.
यही वजह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों की भूमिका केवल तकनीकी माध्यम की नहीं रह जाती. वे इस सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रवाह के निर्माण में सक्रिय भागीदार बन जाते हैं. आलोचकों का तर्क है कि यदि ये कंपनियां चाहें तो अपनी नीतियों और तकनीकी संसाधनों के जरिए इस तरह की सामग्री के प्रसार को काफी हद तक सीमित कर सकती हैं. लेकिन व्यवहार में ऐसा होता दिखाई नहीं देता.
नतीजा यह है कि जो संगीत कभी सीमित क्षेत्रों में सुनाई देता था, वह आज "न्यू इंडिया" की सांस्कृतिक ध्वनि का हिस्सा बन चुका है. और इस बदलाव के पीछे केवल राजनीतिक माहौल ही नहीं, बल्कि वे डिजिटल मंच भी हैं जिन्होंने इसे दर्शक, पहुंच, पैसा और वैधता उपलब्ध कराई.
(कुणाल पुरोहित स्वतंत्र पत्रकार हैं और एच-पॉप: द सीक्रेटिव वर्ल्ड ऑफ हिंदुत्व पॉपस्टार्स पुस्तक के लेखक हैं.)

