संजय बारू | भारत-चीन रणनीतिक आर्थिक वार्ता को फिर से शुरू करने का समय आ गया है
हाल ही में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में दोनों देशों को एक-दूसरे का भागीदार बताया गया. चीनी पक्ष ने सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों के एक उचित दायरे में रखने और व्यापार एवं वित्त जैसे क्षेत्रों में 'रणनीतिक आर्थिक वार्ता' को जल्द बहाल करने का सुझाव दिया है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 से 2019 के बीच दोनों देशों के बीच ऐसी छह बैठकें हुई थीं, लेकिन 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हुए सैन्य गतिरोध के बाद से यह संवाद पूरी तरह निलंबित है.
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और दोनों देशों के रिश्तों में आई हालिया नरमी को देखते हुए सिर्फ सैन्य या सुरक्षा स्तर की वार्ता पर्याप्त नहीं है. भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता चीन के साथ लगातार बढ़ता भारी व्यापार घाटा है, जिसे बीजिंग की व्यापारिक संकीर्णता बढ़ावा देती है. पूर्व में इस वार्ता का उद्देश्य व्यापक था, जिसके तहत ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, फार्मास्यूटिकल्स और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए कार्य समूह बनाए गए थे. आज एक केंद्रित 'आर्थिक सुरक्षा वार्ता' को पुनर्जीवित करना बेहद जरूरी हो गया है.
भारत और चीन के बीच "मुख्य मुद्दों" की परिभाषा केवल भू-राजनीति या सीमा विवाद तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. इसमें भारत की विकासात्मक प्राथमिकताओं और औद्योगिक क्षमताओं के निर्माण को भी शामिल किया जाना चाहिए. चीन को यह समझना होगा कि भारत का आर्थिक रूप से मजबूत होना उसके अपने हित में भी है। उदाहरण के लिए, ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों का आपसी सहयोग पारंपरिक और गैर-पारंपरिक ऊर्जा चुनौतियों से निपटने में एक 'वैश्विक सार्वजनिक भलाई' साबित हो सकता है.
पिछले एक दशक में अमेरिका द्वारा व्यापार, वित्त और ऊर्जा का जो शस्त्रीकरण किया गया है, उसने वैश्विक बाजार को प्रभावित किया है. शुरुआत में अमेरिका के निशाने पर भले ही चीन था, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष नुकसान भारत को भी भुगतना पड़ा. डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पिछले और वर्तमान कार्यकाल में व्यापार के मोर्चे पर भारत को भी सीधे तौर पर प्रभावित किया है. अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते में आ रही कठिनाइयों को देखते हुए भारत को चीन के प्रति अधिक व्यावहारिक और सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है.
एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के उदय के साथ वैश्विक स्तर पर "पश्चिम बनाम अन्य" का विभाजन स्पष्ट दिखने लगा है. ऐसे में चीन को अन्य विकासशील देशों के विऔद्योगिकीकरण का कारण बनने के बजाय उनके उत्थान में सहायक भूमिका निभानी चाहिए. हकीकत यह है कि भारतीय निजी क्षेत्र (चाहे बड़े उद्योग हों या मध्यम) मशीनरी और उन्नत तकनीक के लिए आज भी बड़े पैमाने पर चीन पर निर्भर है. भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से पूरी तरह मुंह नहीं मोड़ सकती, खासकर तब जब अमेरिका से मिलने वाले आर्थिक संकेत लगातार चिंताजनक बने हुए हैं.
वर्ष 2006 में चीनी नेतृत्व ने माना था कि एशिया का उत्थान भारत और चीन दोनों के विकास पर निर्भर है. भले ही आज चीन आर्थिक रूप से बहुत आगे निकल चुका है, लेकिन यदि वह भारत के प्रति दूरदर्शी नीति अपनाता है, तो यह दोनों के लिए फायदेमंद सौदा होगा. इसके लिए नई दिल्ली और बीजिंग दोनों को अपनी मानसिकता बदलनी होगी. 2020 के बाद से रिश्तों की कमान सैन्य नेतृत्व के हाथों में आने से आर्थिक मुद्दे पीछे छूट गए थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हालिया शिखर वार्ता से रिश्तों में सकारात्मक सुधार की उम्मीद जगी है. बारू का सुझाव है कि जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों को एनएसए संभालते हैं, उसी तरह भारत-चीन आर्थिक सुरक्षा वार्ता के संचालन के लिए एक सशक्त 'आर्थिक सिपहसालार' नियुक्त किया जाना चाहिए, जो सीधे प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह हो और निर्णयों को तेजी से लागू करवा सके.

