यशोवर्धन आज़ाद | अयोध्या में राम मंदिर आस्था से बना था. चोरी सिर्फ़ पैसे की नहीं, भरोसे की हुई है.

अयोध्या में राम मंदिर में चोरी की जांच के लिए उत्तर प्रदेश की विशेष जांच टीम (एसआईटी) पहुंची.

अयोध्या में सबसे बड़ी चोरी धन की नहीं, बल्कि विश्वास की हुई है. राम मंदिर ट्रस्ट को "ट्रस्ट" यूँ ही नहीं कहा जाता. उसके न्यासियों का पहला दायित्व संपत्ति का प्रबंधन करना नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की आस्था की रक्षा करना था जिन्होंने उन पर भरोसा किया. यही कारण है कि अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन का मामला किसी सामान्य वित्तीय घोटाले जैसा नहीं है. करोड़ों भारतीयों ने स्वेच्छा से दान दिया था. किसी ने अपनी एक दिन की मजदूरी अर्पित की, किसी ने गहने, किसी ने पेंशन की बचत और किसी ने अपने परिवार की धरोहर. उन्होंने इसलिए दान दिया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे भारतीय सभ्यता के एक ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बन रहे हैं. उन्हें भरोसा था कि उनका हर रुपया मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सेवा में लगेगा, जो सत्य, न्याय और ईमानदारी के प्रतीक हैं.

इसीलिए इस पूरे प्रकरण को जिस तरह संभाला गया, वह कथित चोरी से भी अधिक गंभीर सवाल खड़े करता है. विडंबना यह है कि पहला सवाल उसी संस्था पर उठता है जिसे श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. जब बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप सामने आए और प्रारंभिक जांच में व्यवस्था संबंधी गंभीर कमियों के संकेत मिले, तब स्वाभाविक प्रश्न यह था कि क्या जांच पूरी होने तक उस संस्था की संरचना यथावत रहनी चाहिए थी. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार की मंजूरी से हुआ था. उसके महासचिव और एक ट्रस्टी ने इस्तीफा दे दिया है. लेकिन यदि पूरी व्यवस्था ही विफल रही, तो जांच शुरू होने के बाद ट्रस्ट को निलंबित या भंग क्यों नहीं किया गया. यह किसी को दोषी मान लेने का प्रश्न नहीं, बल्कि संस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने का सवाल है.

दूसरा प्रश्न ट्रस्ट से जुड़े वरिष्ठ नौकरशाहों की भूमिका को लेकर है. सिविल सेवकों को यह सिखाया जाता है कि जिम्मेदारी के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है. यदि वरिष्ठ अधिकारी उस संस्था का हिस्सा थे जो जनता के भारी-भरकम दान का प्रबंधन कर रही थी, तो उनकी निगरानी की वास्तविक भूमिका क्या थी. क्या उनकी मौजूदगी केवल अधिकार का प्रदर्शन करने के लिए थी, या वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए भी.

सार्वजनिक संस्थान इस सिद्धांत पर नहीं चल सकते कि अधिकार ऊपर केंद्रित रहे, लेकिन जवाबदेही नीचे जाकर समाप्त हो जाए. ट्रस्ट के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया. लेकिन ट्रस्ट से जुड़े नौकरशाहों की जवाबदेही का क्या.

तीसरा सवाल जांच की शुरुआती प्रक्रिया को लेकर है. हर अनुभवी जांच अधिकारी जानता है कि वित्तीय अपराधों में समय सबसे बड़ा दुश्मन होता है. इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बदले जा सकते हैं, सीसीटीवी फुटेज मिट सकती है, डिजिटल साक्ष्य नष्ट किए जा सकते हैं, संपत्तियां इधर-उधर की जा सकती हैं और गवाहों को प्रभावित किया जा सकता है. इसके बावजूद शुरुआती प्रतिक्रिया चौंकाने वाली और गैर-पेशेवर रही. तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर हर संभव साक्ष्य सुरक्षित करने के बजाय प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर से शुरू की गई.

इसी कारण कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं. क्या साक्ष्यों को और बेहतर ढंग से सुरक्षित किया जा सकता था. क्या बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल उपकरण और वित्तीय लेनदेन से जुड़े दस्तावेज तुरंत सुरक्षित कर लिए गए थे.

चौथा मुद्दा जांच की प्रकृति से जुड़ा है. विशेष जांच दल (एसआईटी) प्रभावी व्यवस्था हो सकती है, लेकिन तभी जब उसके पास इस मामले के अनुरूप विशेषज्ञता हो. भारी सार्वजनिक दान, जटिल वित्तीय लेनदेन और व्यापक दस्तावेजी साक्ष्यों वाले मामलों की जांच केवल प्रशासनिक प्रक्रिया से नहीं हो सकती. इसके लिए वित्तीय फॉरेंसिक, साइबर जांच, लेखांकन, खरीद प्रक्रिया, बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों के विशेषज्ञों की जरूरत होती है, जो अनुभवी जांच अधिकारियों और विधि विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करें. उद्देश्य केवल तथ्यों का पता लगाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा मुकदमा तैयार करना भी होना चाहिए जो अदालत की कसौटी पर टिक सके. जब करोड़ों लोगों की आस्था और भारी धनराशि दांव पर हो, तब जांच देश की सबसे सक्षम और बहु-विषयक टीम को सौंपी जानी चाहिए.

पांचवां मुद्दा संस्थागत स्वतंत्रता का है. बताया गया है कि एसआईटी की रिपोर्ट वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से आगे बढ़ी, जिनमें ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारी भी शामिल थे. इससे स्वाभाविक रूप से यह धारणा बनती है कि जांच उसी प्रशासनिक तंत्र के भीतर चल रही है जिसकी कार्यप्रणाली स्वयं जांच के घेरे में है. न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए. सार्वजनिक आस्था से जुड़े मामलों में जांच की स्पष्ट स्वतंत्रता कानूनी प्रक्रिया जितनी ही महत्वपूर्ण होती है.

छठा मुद्दा एक सेवानिवृत्त नौकरशाह के उस सुझाव से जुड़ा है, जिसमें समाधान के रूप में फिर किसी नौकरशाह को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) बनाने की बात कही गई. यह वही सोच है जिसने अनेक सार्वजनिक संस्थाओं की प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर किया है. असली सवाल यह नहीं है कि सीईओ नौकरशाह हो या निजी क्षेत्र से आया व्यक्ति. सवाल यह है कि क्या खुली, पारदर्शी और योग्यता-आधारित प्रक्रिया के जरिए सबसे सक्षम पेशेवर का चयन किया जाएगा. दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थानों में से एक का संचालन वित्त, लेखा परीक्षा, खरीद प्रक्रिया, अनुपालन, प्रौद्योगिकी, जोखिम प्रबंधन और संस्थागत प्रशासन जैसे क्षेत्रों की विशेषज्ञता मांगता है. जवाबदेही तय किए बिना केवल एक नौकरशाही परत की जगह दूसरी परत बिठा देना बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि केवल उसके लक्षणों पर पर्दा डालना है.

सातवां मुद्दा पारदर्शिता का है. यह धन श्रद्धालुओं का था. इसलिए उन्हें नैतिक रूप से यह जानने का अधिकार है कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ रही है. अब तक कौन-कौन से सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं. व्यवस्था की कौन-सी कमियां सामने आई हैं. जांच को प्रभावित किए बिना यदि समय-समय पर सार्वजनिक जानकारी साझा की जाए, तो इससे लोगों का भरोसा और मजबूत होगा.

अंततः यह पूरा प्रकरण सरकार और विपक्ष दोनों को सरकार तथा धार्मिक संस्थाओं के संबंधों पर व्यापक स्तर पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करता है.

राज्य का यह वैध दायित्व है कि जिन संस्थाओं को जनता से भारी दान प्राप्त होता है, वे ईमानदारी और कानून के अनुरूप संचालित हों. लेकिन नौकरशाही की निगरानी कभी भी मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों या गुरुद्वारों जैसे बड़े धार्मिक संस्थानों के पेशेवर प्रबंधन का विकल्प नहीं बन सकती, जिनके पास सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति और संसाधन होते हैं. इसके लिए पेशेवर तरीके से चुने गए मुख्य कार्यकारी अधिकारी, स्वतंत्र संचालन बोर्ड, अनिवार्य फॉरेंसिक ऑडिट, पारदर्शी खरीद व्यवस्था, डिजिटल लेखांकन, हितों के टकराव की अनिवार्य घोषणा, व्हिसलब्लोअर संरक्षण और समय-समय पर ऑडिट की गई वित्तीय रिपोर्टों का सार्वजनिक प्रकटीकरण आवश्यक है.

राम मंदिर का उद्देश्य केवल पत्थरों से बना एक भव्य भवन खड़ा करना नहीं था. वह उन आदर्शों का प्रतीक बनना था जिनका प्रतिनिधित्व भगवान राम करते हैं—सत्य, कर्तव्य, त्याग, ईमानदारी और न्याय. करोड़ों लोगों की इसी आस्था का सम्मान अब नए वादों, नई समितियों या केवल दिखावटी प्रशासनिक फेरबदल से नहीं, बल्कि पूरी तरह स्वतंत्र, पेशेवर और पारदर्शी जांच से किया जाना चाहिए. क्योंकि यह मामला केवल चोरी हुए धन का नहीं, बल्कि चोरी हुए विश्वास का भी है.

(यशोवर्धन आज़ाद सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं. वे केंद्रीय सूचना आयुक्त, भारत सरकार में सुरक्षा सचिव और इंटेलिजेंस ब्यूरो में विशेष निदेशक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं.  )

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