सुशांत सिंह | मोदी का दमन एक रणनीतिक भूल
‘फॉरेन पॉलिसी’ में सुशांत सिंह ने लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों का इस्तेमाल एक बड़ी रणनीतिक भूल है. उनके मुताबिक, मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए जाने के विवाद ने पहले से मौजूद आर्थिक असंतोष, बेरोजगारी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर चिंताओं को एक व्यापक जनांदोलन में बदल दिया है. सरकार की दमनकारी कार्रवाई इस असंतोष को कम करने के बजाय और बढ़ा रही है.
मतदाता सूची विवाद से व्यापक आंदोलन
10 अक्टूबर से नई दिल्ली में सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए हजारों लोगों को हिरासत में लिया. अनुमानों के मुताबिक, अकेले उस दिन 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें विपक्षी नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, छात्र नेता, वरिष्ठ वकील और पत्रकार शामिल थे. ये लोग भारतीय निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे.
प्रदर्शनों से पहले प्रशासन ने दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशन बंद कर दिए, रेलगाड़ियां रद्द कीं और राजधानी के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दीं. दिल्ली में 30,000 से अधिक अर्धसैनिक जवानों की तैनाती की गई. प्रदर्शनकारियों को घसीटकर पुलिस वाहनों में डालने और सांसदों के साथ बल प्रयोग की घटनाएं भी सामने आईं. इसके बावजूद विरोध प्रदर्शन जारी रहे और आंदोलन का दायरा बढ़ता गया.
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है. लेखक के मुताबिक, विपक्षी दल पहले से ही मतदाता सूची से नाम हटाए जाने पर सवाल उठा रहे थे. इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में अन्य निर्वाचन आयुक्तों की ओर से कुमार के कामकाज पर उठाई गई आपत्तियों और कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन की सक्रियता ने इस मुद्दे को नई गति दी. लेख में जुलाई के परीक्षा प्रश्नपत्र लीक विवाद का भी उल्लेख है, जिसके बाद आंदोलन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए दबाव बनाया था.
मोदी की राजनीतिक ताकत पर सवाल
सुशांत सिंह का तर्क है कि मोदी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति उनके शुरुआती दो कार्यकालों से अलग है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई और मोदी को गठबंधन सरकार चलानी पड़ी. इस वर्ष संसदीय सीटों के विस्तार और परिसीमन जैसे प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में भी सरकार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. ऐसे में सरकार के पास दमनकारी शक्तियां तो हैं, लेकिन पहले जैसा राजनीतिक बहुमत और विरोध को नजरअंदाज करने की सुविधा नहीं है.
पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जरिए आंदोलन को नियंत्रित करने की रणनीति सरकार को कमजोर दिखा रही है. प्रदर्शनकारी इसे सत्ता की घबराहट के रूप में देख रहे हैं. पुलिस हिंसा पर प्रधानमंत्री की चुप्पी उनकी लोकतांत्रिक वैधता को नुकसान पहुंचा रही है. इससे मध्यमार्गी मतदाताओं के भी सरकार से दूर होने का खतरा है.
मोदी सरकार के सामने एक अन्य चुनौती बदलता मीडिया परिदृश्य है. लेखक का कहना है कि स्वतंत्र डिजिटल मंचों और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने पारंपरिक मीडिया पर सरकार के नियंत्रण को कम प्रभावी बना दिया है. प्रदर्शनों के दौरान कम से कम 37 पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने का उल्लेख भी लेख में किया गया है.
बेरोजगारी, आर्थिक दबाव और विदेश नीति
12 वर्ष से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद मोदी के सामने राजनीतिक थकान की चुनौती है. युवा आबादी अब पिछली सरकारों को मौजूदा समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराने के तर्क से संतुष्ट नहीं है. सितंबर के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग आधे उत्तरदाताओं ने माना कि पिछले वर्ष रोजगार की स्थिति खराब हुई है, जबकि 35.5 प्रतिशत लोगों को अगले वर्ष हालात और बिगड़ने की आशंका थी.
आर्थिक मोर्चे पर लेखक ने बताया है कि 2026 में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से रिकॉर्ड 33 अरब डॉलर निकाले हैं. इस वर्ष अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 6.5 प्रतिशत से अधिक कमजोर हुआ है. हालांकि, पिछली तिमाही में भारत की वार्षिकीकृत जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, लेकिन निवेश की निकासी और रुपये में गिरावट सरकार के आर्थिक दावों पर सवाल खड़े करती हैं.
विदेश नीति भी मोदी के लिए चुनौती बन रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत पर ऊंचे शुल्क लगाए गए हैं और द्विपक्षीय व्यापार समझौता अटका हुआ है. प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वेक्षण में 50 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने भारत के प्रति नकारात्मक राय जताई, जबकि 45 प्रतिशत की राय सकारात्मक थी. दूसरी ओर, चीन के साथ सीमा विवाद और व्यापार घाटा बरकरार है. पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के बीच इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत की नजदीकी वाली नीति भी दबाव में है.
लोकतांत्रिक संस्थाओं का भविष्य
भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर होने की चिंताएं गंभीर हैं. वी-डेम परियोजना ने भारत को ‘चुनावी निरंकुशता’ की श्रेणी में रखा है. फ्रीडम हाउस ने भारत को ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ बताया है, जबकि इंटरनेशनल आईडीईए ने न्यायिक स्वतंत्रता और राजनीतिक दलों की स्वतंत्रता में गिरावट की ओर संकेत किया है.
जब जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली संस्थाएं प्रभावी ढंग से काम नहीं करतीं, तब जनता के पास सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज उठाने का रास्ता बचता है. भारत जैसे असमानता वाले देश में मतदान का अधिकार सभी वयस्क नागरिकों को समान राजनीतिक दर्जा देता है. इसलिए मतदाता सूची की निष्पक्षता पर सवाल केवल चुनावी प्रक्रिया का विवाद नहीं, बल्कि नागरिकता और लोकतांत्रिक गरिमा से जुड़ा मुद्दा बन जाता है.
लेख के अंत में सिंह कहते हैं कि भारत की संघीय व्यवस्था, क्षेत्रीय विविधता, विपक्ष की सक्रियता और युवाओं की भागीदारी मोदी के लिए सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण को कठिन बनाती है. दिल्ली में हुई गिरफ्तारियां उनकी असीमित शक्ति के बजाय उनकी राजनीतिक छवि में उभरती दरारों का संकेत हो सकती हैं. उनके मुताबिक, सरकार के सामने अब दो रास्ते हैं, जनता से संवाद करना या दमन जारी रखना. मोदी का चुनाव न केवल उनके तीसरे कार्यकाल की दिशा तय करेगा, बल्कि भारत के लोकतंत्र के भविष्य पर भी गहरा असर डालेगा.
(यह हिंदी में अनूदित सारांश है. सुशांत सिंह की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है)

