खाना अब सिर्फ भोजन नहीं, एक ऐप है. क्या शहरी भारत में खत्म हो रही है साथ बैठकर खाने की संस्कृति?

कभी रसोई घर परिवार का सबसे जीवंत हिस्सा हुआ करती थी. यहीं भोजन बनता था, बातचीत होती थी, रिश्ते मजबूत होते थे और यादें बनती थीं. लेकिन अब महानगरों के कई घरों में रसोई का महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. उसकी जगह फूड डिलीवरी ऐप्स, माइक्रोवेव और क्लाउड किचन लेते दिखाई दे रहे हैं.

‘स्क्रोल’ में प्रकाशित अंजलि भाटिया की रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में स्विगी, जोमैटो और ब्लिंकिट जैसे प्लेटफॉर्म ने खाने की आदतों को तेजी से बदला है. अब बाहर जाकर खाना ही नहीं, बल्कि रेस्तरां का खाना घर मंगाकर खाना भी सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है. कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन ने इस बदलाव को और तेज कर दिया. बाहर खाना संभव नहीं था, इसलिए "ईटिंग इन-ईटिंग आउट" यानी घर में रहकर बाहर का खाना खाने का चलन तेजी से बढ़ा.

इस बदलाव का सबसे बड़ा असर रसोई पर पड़ा है. पहले जहां गैस चूल्हा हर दिन जलता था, अब कई घरों में उसकी जगह माइक्रोवेव और रेफ्रिजरेटर ने ले ली है. कई परिवारों में खाना पकाने के बजाय केवल खाना गर्म किया जाता है. त्योहारों पर भी घर के बने भोजन के साथ बाहर से मंगाए गए व्यंजन परोसे जाने लगे हैं.

सिर्फ भोजन का तरीका ही नहीं बदला, बल्कि साथ बैठकर खाने का अनुभव भी बदल गया है. डाइनिंग टेबल पर बातचीत की जगह अब मोबाइल फोन और लैपटॉप ने ले ली है. परिवार के सदस्य एक ही मेज पर बैठते हैं, लेकिन उनका ध्यान अक्सर अलग-अलग स्क्रीन पर होता है. भोजन एक साझा अनुभव की बजाय व्यक्तिगत गतिविधि बनता जा रहा है.

इस बदलाव के सकारात्मक पक्ष भी हैं. कामकाजी महिलाओं के लिए फूड डिलीवरी ऐप्स ने रोजाना खाना बनाने के दबाव को कम किया है. इससे घर और नौकरी के बीच संतुलन बनाना अपेक्षाकृत आसान हुआ है. तेज रफ्तार शहरी जीवन में ये सेवाएं समय बचाने का भी माध्यम बनी हैं.

लेकिन समाजशास्त्रियों का मानना है कि इसकी एक सामाजिक कीमत भी है. खाना बनाना केवल भोजन तैयार करना नहीं होता. यह परिवार के भीतर संवाद, सहयोग, स्नेह और अपनापन विकसित करने की प्रक्रिया भी है. रसोई में बनने वाली खुशबू, किसी व्यंजन की तारीफ या शिकायत, साथ बैठकर खाना और छोटी-छोटी बातचीत परिवार की सामूहिक स्मृतियों का हिस्सा बनती हैं. जब खाना बनाने और परोसने की जिम्मेदारी बाजार को सौंप दी जाती है, तो इन अनुभवों की जगह सुविधा ले लेती है.

लेखिका का तर्क है कि क्लाउड किचन और फूड ऐप्स ने भोजन को एक सेवा में बदल दिया है. खाने वाले, डिलीवरी पार्टनर और खाना बनाने वाले लोग एक-दूसरे के लिए लगभग अजनबी हैं. ऐसे में भोजन से जुड़े रिश्ते भी धीरे-धीरे औपचारिक और व्यावसायिक होते जाते हैं.

फिर भी यह बदलाव पूरे भारत की तस्वीर नहीं है. आज भी कई संयुक्त परिवारों और पारंपरिक घरों में रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं, बल्कि परिवार को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण जगह बनी हुई है. शायद यही वे स्थान हैं, जहां भोजन का स्वाद केवल मसालों से नहीं, बल्कि रिश्तों, बातचीत और साझा यादों से तैयार होता है.

अंजलि भाटिया नई दिल्ली स्थित लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वुमेन के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

Previous
Previous

"मुझे गोली क्यों मारी गई?" पेलेट गन से अंधी हुई छात्रा की कहानी, जो फिल्म ‘चौहान’ से गायब कश्मीरियों की सच्चाई सामने लाती है

Next
Next

पर्यावरण बचाने के दावे, लेकिन रैंकिंग में सबसे नीचे. भारत 176वें स्थान पर क्यों पहुंचा?