आदर्श मतदाता का निर्माण: एसआईआर बना आघात और नागरिकता की राष्ट्रीय परीक्षा

'सबस्टैक' पर समर हलारनकर ने लिखा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने भारत में मतदान के अधिकार, नागरिकता और राज्य के साथ नागरिक के संबंध को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एसआईआर के जरिए ऐसा "आदर्श मतदाता" तैयार होता दिखाई दे रहा है जो दस्तावेजों से प्रमाणित, आसानी से खोजे जा सकने वाला, वैध और राज्य के लिए स्वीकार्य हो. बाकी लोगों से पहले यह साबित करने को कहा जा रहा है कि उन्हें वोट देने का अधिकार क्यों मिलना चाहिए.

430 से अधिक दिनों में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रही इस प्रक्रिया में अब तक 13.3 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से बाहर हो चुके हैं. महाराष्ट्र में 2.07 करोड़, उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़, कर्नाटक में एक करोड़, तमिलनाडु में 97 लाख और पश्चिम बंगाल में 91 लाख नाम हटाए गए हैं. तीसरे चरण में अकेले 61 लाख नाम बाहर किए गए. इतने बड़े आंकड़ों के पीछे वास्तविक लोग हैं और इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का बाहर होना सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है.

एसआईआर का मॉडल असम में पहले आजमाया जा चुका है. 1997 से 2019 के बीच "डी-वोटर" यानी संदिग्ध मतदाता व्यवस्था और एनआरसी के जरिए कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान करने की कोशिश हुई. इसके बाद दस्तावेज होने के बावजूद बंगाली भाषी मुसलमानों को नागरिकता संबंधी कार्यवाहियों का सामना करना पड़ा. 2025 में असम में ऐसी व्यवस्था सामने आई जिसमें नौकरशाहों को लोगों को अवैध प्रवासी घोषित कर 24 घंटे के भीतर बाहर भेजने की शक्ति देने की बात सामने आई.

अब ऐसी ही प्रक्रिया देशभर में मतदाता सूची के जरिए आगे बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. केंद्रीय गृह मंत्री और मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा एसआईआर के लिए "शुद्धिकरण" शब्द का इस्तेमाल भी राजनीतिक और धार्मिक संकेतों को लेकर सवाल खड़े करता है.

अव्यवस्था और दस्तावेजों का संकट

दिल्ली में एसआईआर शुरू होने से पहले ही 11 लाख नाम गायब होने की शिकायतें सामने आईं. कई सूचियों में नामों की वर्तनी गलत थी, कुछ मतदाताओं को बिना वजह "स्थानांतरित" या "अनुपस्थित" बताया गया और कई लोगों के नाम फॉर्म जमा करने के बावजूद सूची से गायब हो गए.

बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ, जिनमें शिक्षक, क्लर्क, इंजीनियर और दूसरे सरकारी कर्मचारी शामिल हैं, भारी काम के दबाव में हैं. हैदराबाद के कुछ हिस्सों में केवल करीब 5 प्रतिशत घरों तक सत्यापन पहुंचने की रिपोर्ट आई. कर्नाटक में 35 बीएलओ को कारण बताओ नोटिस दिए गए और मुंबई में 300 से अधिक बीएलओ शुरुआती दौर में काम से दूर रहे.

बेंगलुरु में लेखक ने खुद 2002 की मतदाता सूची से अपनी और अपनी मां की जानकारी खोजकर फॉर्म जमा किए. दोनों के नाम 24 अगस्त की मसौदा सूची में आ गए, लेकिन बाद में उन्हें नोटिस मिला. नोटिस में "स्वयं के नाम में अंतर" कारण बताया गया, जबकि उनका नाम 2002 की सूची में भी उसी तरह दर्ज था.

उन्हें उपलब्ध दस्तावेजों में केवल दसवीं की अंकतालिका और पासपोर्ट मिला. सरकार पहले ही कह चुकी है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है. जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं होने के कारण उनकी नागरिकता साबित करने के लिए दसवीं की अंकतालिका ही एकमात्र सहारा बचता है.

यह समस्या और गंभीर तब हो जाती है जब लोग दूसरे शहरों या विदेशों में काम कर रहे हों. कई लोगों को यह तक पता नहीं है कि उन्हें मतदान अधिकार से जुड़े नोटिस जारी हुए हैं. बेंगलुरु में 28 सितंबर की सुनवाई और 22 अक्टूबर तक दावे-आपत्तियों की समयसीमा के बीच कर्नाटक में करीब 43.8 लाख और अकेले बेंगलुरु में 24 लाख लोगों के चुनावी अधिकारों पर निर्णय होना है. 90 वर्षीय महिला मतदाता के लिए सुनवाई स्थल तक पहुंचना भी मुश्किल है, जबकि बीएलओ ने शारीरिक उपस्थिति को अनिवार्य बताया.

सबसे ज्यादा दबाव वंचितों पर

मतदाता सूची की जांच में बड़े पैमाने पर नाम हटने के बावजूद मृत लोगों की संख्या इतनी नहीं है कि इसे पूरी तरह समझाया जा सके. सबर इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के अनुसार दिल्ली में हटाने के लिए चिन्हित 94 प्रतिशत लोग जीवित पाए गए, जबकि हैदराबाद में यह आंकड़ा 92 प्रतिशत था.

एसआईआर के दौरान आदिवासी, गरीब, प्रवासी, महिलाएं और अल्पसंख्यक सबसे अधिक दस्तावेजी दबाव झेल रहे हैं. झारखंड में आदिवासियों के काम छोड़कर दस्तावेज लेकर कतार में खड़े होने की तस्वीरें सामने आईं. हैदराबाद में हटाने के लिए चिन्हित नामों में 40.7 प्रतिशत मुस्लिम नाम बताए गए. मुंबई की कुछ मुस्लिम बहुल सीटों में नाम हटाने की दर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंची. दिल्ली में 45.5 प्रतिशत ट्रांसजेंडर मतदाता मसौदा सूची से बाहर हो गए.

निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची का डेटा मुख्य रूप से तस्वीरों के रूप में जारी करने से स्वतंत्र शोध और जांच भी मुश्किल हो जाती है, जबकि आयोग के पास यही जानकारी संरचित रूप में मौजूद है.

निर्वाचन आयोग और भाजपा की भूमिका पर सवाल

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. निर्वाचन आयुक्त बनने से पहले वह गृह मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी थे और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन तथा अयोध्या राम मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने जैसी भाजपा की प्रमुख वैचारिक परियोजनाओं से जुड़े रहे थे. नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने उनकी सेवानिवृत्ति के कुछ ही सप्ताह बाद उन्हें निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया था.

एसआईआर के दौरान कई राज्यों में भाजपा कार्यकर्ताओं या एजेंटों पर मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के प्रयासों से जुड़े आरोप लगे हैं. झारखंड के अलावा ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और असम में भी ऐसे मामले सामने आए. बिहार की ढाका विधानसभा सीट में 78,384 मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के प्रयास का उल्लेख किया गया है, जबकि उत्तराखंड में यह संख्या करीब 6,500 बताई गई.

महाराष्ट्र में भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को "अयोग्य" मतदाताओं की पहचान करने के लिए एसआईआर में सक्रिय होने को कहा. इस पूरी प्रक्रिया को गृह मंत्री अमित शाह के पुराने "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" अभियान से भी जोड़ा गया है.

आदर्श मतदाता और नागरिकता का भविष्य

मतदाता सूची में संशोधन जरूरी हो सकता है, क्योंकि लोग मरते हैं, स्थान बदलते हैं या डुप्लीकेट नाम सामने आते हैं. लेकिन लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करना इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता. स्थानांतरित व्यक्ति वोटर रहना बंद नहीं करता और मृत लोगों की पहचान करना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है.

एसआईआर की मौजूदा प्रक्रिया में दस्तावेजों और प्रक्रियागत बाधाओं का बोझ खासकर उन लोगों पर पड़ रहा है जिनके पास सीमित संसाधन हैं. यही इसे केवल मतदाता सूची की सफाई से आगे ले जाकर नागरिकता और राजनीतिक भागीदारी का सवाल बना देता है.

यदि एसआईआर आगे चलकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी का आधार बनता है तो करोड़ों लोगों की नागरिकता पर मनमाने ढंग से सवाल खड़े हो सकते हैं. इससे लोग पहले मतदान के अधिकार और बाद में नागरिकता से भी वंचित हो सकते हैं.

भारत में "आदर्श नागरिक" और अब "आदर्श मतदाता" बनाने की यह प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदान का अधिकार केवल चुनाव में एक वोट डालने का माध्यम नहीं है. यह नागरिक के राजनीतिक अस्तित्व और राज्य में उसकी बराबर हिस्सेदारी की बुनियादी गारंटी है. यदि बड़ी आबादी को इस अधिकार से बाहर कर दिया जाता है तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सार्वभौमिक मताधिकार की संवैधानिक प्रतिज्ञा ही कमजोर पड़ सकती है.

समर हलारनकर पत्रकार और लेखक हैं.

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