राकेश कायस्थ | सुभाष चंद्रा के मामले ने कॉरपोरेट कर्ज का पूरा खेल खोल दिया
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने आर्थिक मामलों के पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ सुभाष चंद्रा से जुड़े कर्ज और इनसॉल्वेंसी मामले के बहाने भारत की कॉरपोरेट गवर्नेंस और बैंकिंग व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र यह समझना था कि बड़े कॉरपोरेट कर्ज के मामलों में "हेयरकट" क्या होता है और क्यों आम लोगों को लगता है कि बड़े उद्योगपतियों को कर्ज के मामलों में राहत मिल जाती है, जबकि किसान और मध्यवर्गीय व्यक्ति को ऐसी सुविधा नहीं मिलती.
राकेश कायस्थ ने समझाया कि सुभाष चंद्रा से जुड़े मामले में करीब 226.57 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले लगभग 6.5 करोड़ रुपये में मामला निपटाने की प्रक्रिया सामने आई है. उन्होंने बताया कि कॉरपोरेट मामलों में "हेयरकट" का मतलब उस रकम से है, जिसकी वसूली संभव नहीं मानी जाती और क्रेडिटर्स को उसे छोड़ना पड़ता है.
उनके मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में करीब 16 से 17 लाख करोड़ रुपये की ऐसी रकम सामने आई है, जिसे सिस्टम में रिकवर नहीं किया जा सका. उन्होंने इसे देश की जीडीपी के करीब 5 प्रतिशत के बराबर बताया. उनका तर्क था कि यह पैसा बैंकों से जुड़ा है और बैंकों में जमा पैसा आखिरकार आम लोगों का ही होता है. इसलिए किसी बड़े कॉरपोरेट कर्ज के डूबने का असर केवल बैंक की बैलेंस शीट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका बोझ अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता पर भी पड़ सकता है.
चर्चा में 2016 में लागू हुए इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी की भूमिका भी समझाई गई. राकेश कायस्थ ने उदाहरण के जरिए बताया कि एनसीएलटी में किसी कंपनी के दिवालिया होने के बाद क्रेडिटर्स के दावों की समीक्षा होती है और यह तय किया जाता है कि कितनी रकम वास्तव में वापस मिल सकती है. इसके बाद कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स के जरिए प्रस्ताव पर मतदान होता है.
उन्होंने वीडियोकॉन के मामले का उदाहरण देते हुए बताया कि करीब 64,000 करोड़ रुपये के दावों में बड़ी रकम को रिकवर न होने वाली मानकर हेयरकट लिया गया और कंपनी को बहुत कम रकम में नए खरीदार के हवाले किया गया. इसी तरह उन्होंने अन्य कॉरपोरेट मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी कंपनियों के अधिग्रहण का एक रास्ता भी तैयार हुआ है.
बातचीत में विजय माल्या और किसानों की कर्जमाफी की तुलना भी सामने आई. राकेश कायस्थ ने कहा कि किसानों की करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये की कर्जमाफी पर बड़ा राजनीतिक शोर होता है, जबकि कॉरपोरेट कर्ज में लाखों करोड़ रुपये की रकम के हेयरकट पर वैसी बहस नहीं होती.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए कर्ज की लागत अधिक होती है. छोटे कर्जदारों को कई बार 20 से 25 प्रतिशत तक ब्याज चुकाना पड़ता है, जबकि बड़े कॉरपोरेट्स को अपेक्षाकृत आसान शर्तों पर बड़ा कर्ज उपलब्ध हो जाता है. उनके मुताबिक, आर्थिक व्यवस्था में यह अंतर असमानता को और बढ़ाता है.
बातचीत में टैक्स व्यवस्था का मुद्दा भी उठा. राकेश कायस्थ ने कहा कि आम लोगों पर उपभोग के जरिए जीएसटी का बोझ पड़ता है, जबकि बड़े आर्थिक वर्गों के पास टैक्स का बोझ कम करने के कई रास्ते मौजूद हैं. उन्होंने डिविडेंड और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स पर टैक्स को लेकर भी सवाल उठाए.
अंत में सवाल यही रहा कि क्या सरकार और बैंकिंग व्यवस्था आम लोगों के पैसे की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर हैं. राकेश कायस्थ ने अर्थव्यवस्था में कुछ सकारात्मक संकेतों का जिक्र किया, लेकिन रोजगार, विदेशी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग जैसे मोर्चों पर गंभीर चुनौतियां भी गिनाईं.
यह बातचीत एक बड़े सवाल के साथ खत्म होती है: जब कॉरपोरेट कर्ज का जोखिम आखिरकार सार्वजनिक धन से जुड़ा है, तो जवाबदेही और नुकसान का बोझ तय करने के लिए आम नागरिक और बड़े कॉरपोरेट्स के लिए क्या एक जैसे मापदंड होने चाहिए?
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

