गार्डियन | ‘कॉकरोच आंदोलन’ ने डर के साए को पूरी तरह हटा दिया

‘द गार्डियन’ में हन्ना एलिस-पीटरसन की रिपोर्ट है कि भारत में पिछले 12 वर्षों से सत्ता में काबिज़ नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ असहमति को दबाना आम बात मानी जाती थी, लेकिन हाल ही में उभरे ‘कॉकरोच आंदोलन’ ने सरकार की राजनीतिक पकड़ के सामने एक अप्रत्याशित चुनौती खड़ी कर दी. इसकी शुरुआत बोस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़े अभिजीत दिपके (30 वर्ष) द्वारा बनाई गई एक पैरोडी वेबसाइट 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) से हुई. यह वेबसाइट भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को कथित रूप से "परजीवी" और "कॉकरोच" कहने के विरोध में एक हास्य-व्यंग्य के रूप में शुरू की गई थी. हालाँकि, जब जेन-ज़ी युवाओं ने इसे सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में समर्थन दिया, तो यह व्यंग्य युवाओं के आक्रोश की आवाज़ बन गया.

इस आंदोलन के केंद्र में मेडिकल कॉलेज प्रवेश परीक्षा (नीट)  का पेपर लीक होना और शिक्षा व्यवस्था का भ्रष्टाचार है. लगभग 22 लाख छात्रों को 1,30,000 सीटों के लिए फिर से कठिन परीक्षा देने पर मजबूर होना पड़ा, जिससे कई छात्रों ने मानसिक तनाव में आकर आत्महत्या तक कर ली. सीजेपी ने तीन प्रमुख माँगों को रेखांकित किया. परीक्षा लीक की निष्पक्ष जवाबदेही तय करना, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तुरंत इस्तीफ़ा और कुप्रबंधित और भ्रष्ट उच्च शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार.

मई में शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन जून के अंत तक दिल्ली के दिल में एक विशाल जन-आंदोलन बन गया. मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने युवाओं के समर्थन में 20 दिनों की भूख हड़ताल की. जब पुलिस ने उन्हें जबरन अस्पताल पहुँचाया, तो जनता का आक्रोश भड़क उठा. संसद मार्च के दौरान पुलिस ने 10,000 की तैयारी की थी, लेकिन लगभग 1,00,000 युवा सड़कों पर उतर आए. प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने आँसू गैस, लाठीचार्ज और पैलेट गन का इस्तेमाल किया, जिससे सैकड़ों छात्र घायल और अस्पताल में भर्ती हुए. इस दमन ने इस आंदोलन को केवल परीक्षा लीक के विरोध से बढ़ाकर "डगमगाते लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई" में बदल दिया.

विश्लेषकों के अनुसार, यह आंदोलन पिछले प्रदर्शनों की तुलना में सरकार के लिए अधिक जटिल और कठिन चुनौती पेश करता है.

गैर-पक्षपाती और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप: शिक्षा और पेपर लीक का मुद्दा सत्ताधारी पार्टी के कोर वोट बैंक (उच्च-वर्ग के हिंदू परिवारों) को भी प्रभावित करता है. प्रदर्शनों में हिंदू, मुस्लिम और सिख ने एकजुट होकर हिस्सा लिया.

राष्ट्रवाद का नया रूप: युवाओं ने इस आंदोलन को देशभक्ति से जोड़कर सरकार से राष्ट्रवाद का कार्ड छीन लिया.

सोशल मीडिया बनाम गोदी मीडिया: मुख्यधारा के मीडिया (जिसे 'गोदी मीडिया' कहा जाता है) द्वारा आंदोलन को "आतंकवादी" या "देशद्रोही" बताने के प्रयासों को युवाओं ने इंस्टाग्राम रील्स और मीम्स के ज़रिए अपने सूचना नेटवर्क से नाकाम कर दिया.

प्रधानमंत्री मोदी ने पेपर लीक के दोषियों पर कार्रवाई का वादा किया, लेकिन वे अपने वफ़ादार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त करने से हिचकते रहे. क्योंकि इसे उनकी राजनीतिक कमज़ोरी के रूप में देखा जा सकता है. विश्लेषकों (जैसे प्रताप भानु मेहता) का मानना है कि यद्यपि सरकार के पास अभी समय है, लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने “डर के साए को हटा दिया है.”

उन्होंने कहा, "इस सरकार को बिना किसी जवाबदेही के शासन करने की आदत हो गई है. उनके लिए फिर से अपने एकतरफ़ा वर्चस्व को स्थापित करना बहुत मुश्किल होने वाला है."

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