सुदीप ठाकुर | जेन जी के जार्गन में उलझी सरकार
तेरह साल पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह फरवरी 2013 को दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसी) में छात्र-छात्राओं को संबोधित किया था. इसे मोदी के अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी की तरह देखा गया. और फिर 13 सितंबर, 2013 को मोदी को भाजपा संसदीय दल ने पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित भी कर दिया था.
एसआरसी के अपने उस चर्चित भाषण में मोदी ने अपनी रहनुमाई में गुजरात में विकास के दावे किए थे और खुद को ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया था, जो सकारात्मकता की बात करता है. इस क्रम में मोदी ने डायस पर रखा पानी से आधा भरा गिलास उठाकर छात्र-छात्राओं से कहा था, आशावादी कहते हैं कि गिलास आधा भरा है, निराशावादी कहते हैं कि गिलास आधा खाली है—मैं कहता हूँ, यह गिलास भरा हुआ है—आधा हवा से, आधा पानी से!"
तब तक इन छात्र छात्राओं और युवाओं के लिए जेन जी शब्द प्रचलन में नहीं आया था. मोदी को अंदाजा नहीं रहा होगा कि यही छात्र छात्राएं उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरेंगे. अपने कार्यक्रमों और नीतियों से ज्यादा उनके नामो की एक्रनमी (शब्द संक्षेप) के जरिये सियासत का नया जार्गन बनाने वाले मोदी और उनकी सरकार को यह एहसास भी नहीं रहा होगा कि उन्हें जेन जी के जार्गन का सामना करना होगा.
ऐसा जार्गन, जिसमें तल्खी है, गुस्सा है, विट है, व्यंग्य है, खिलंदड़पन है और इससे भी अधिक यह कि उसमें किसी भी तरह का सवाल पूछने का साहस है.
यदि कोई जंतर मंतर में जुटे युवाओं के लोकतांत्रिक प्रतिरोध के मेले को सिर्फ नीट परीक्षा लीक से उपजे तात्कालिक आक्रोश तक सीमित कर रहा है, तो वह चूक कर रहा है.
पहले ही लिखा जा चुका है यह आंदोलन सोनम वांगचुक से आगे निकल चुका है. 20 जुलाई की पुलिसिया कार्रवाई और उसके बाद कई तरह के सरकारी फरमानों के बावजूद वहां देशभर से छात्र-छात्राएं जुट रहे हैं, तो इसे सिर्फ तात्कालिक आक्रोश तक सीमित नहीं कहा जा सकता.
जेन जी की भाषा और उसके जार्गन को समझने में यह सरकार नाकाम साबित हो रही है.
गजब यह है कि भाजपा और आरएसएस और गोदी मीडिया का इकोसिस्टम मुद्दों को छोड़ इन युवाओं की भाषा पर सवाल उठाकर उनके गुस्से और जज्बे को कमतर कर रहा है.
जिस देश में केंद्रीय गृहमंत्री तक के संसद में दिए भाषण के हिस्से में असंसदीय हिस्से को हटाना पड़े, जिस देश के कई मुख्यमंत्री कैमरे में अपशब्द कहते कैद हो जाएं वहां भाषायी मर्यादा एकतरफा मामला नहीं हो सकता.
निश्चित रूप से भाषा की मर्यादा होनी चाहिए और यह बात सब पर समान रूप से लागू होती है, जेन जी से लेकर संसद में बैठे इस देश के रहनुमाओं तक.
जेन जी की यह भाषा प्रतिरोध से उपजी भाषा है. यह प्रतिरोध सिर्फ सत्ता ही नहीं समाज की नैतिकता के खिलाफ उपजे आक्रोश का नतीजा भी है.

