"आपने अपने शरीर के बजाय अपना करियर क्यों चुना?" बृजभूषण सिंह के बरी होने से यह दिखता है कि कटघरे में वह नहीं थे

'आर्टिकल 14' के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बरी किए जाने के बाद फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. प्रकाशन का कहना है कि अदालत ने उन्हें कानूनी रूप से दोषमुक्त कर दिया, लेकिन मुकदमे की पूरी प्रक्रिया ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या वास्तव में आरोपी कटघरे में था या फिर शिकायत करने वाली महिला पहलवानों को ही अपनी विश्वसनीयता साबित करनी पड़ रही थी.

महिला पहलवानों ने 2016 से 2022 के बीच यौन उत्पीड़न की सात घटनाओं का आरोप लगाया था. एक शिकायत के अनुसार, 2016 ओलंपिक क्वालिफायर के दौरान बृजभूषण सिंह ने एक पहलवान को अपने पास बुलाकर उसकी अनुमति के बिना उसके सीने और पेट को कई बार छुआ और "सांस जांचने" के बहाने अनुचित हरकत की. दूसरी पहलवान ने भी आरोप लगाया कि एक प्रतियोगिता जीतने के बाद फोटो खिंचवाते समय उन्होंने इसी तरह उसके शरीर को छुआ और कहा, "आज तुम्हारी सांस ठीक है."

 एक पहलवान ने अदालत में कहा कि उन्होंने उस समय विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा करने पर उनका करियर खत्म हो सकता है. सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने बार-बार सवाल उठाया कि शिकायत पहले क्यों नहीं की गई और करियर को शरीर से ऊपर क्यों रखा गया. प्रकाशन का कहना है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में अक्सर पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने में समय लगता है और लंबे समय बाद घटनाओं के हर विवरण को पूरी तरह याद रख पाना हमेशा संभव नहीं होता.

महिला पहलवानों की ओर से पैरवी करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने फैसले को "बेहद दुखद और निराशाजनक" बताया. उन्होंने कहा कि अदालतें सामान्यतः मामूली विरोधाभासों के आधार पर शिकायतकर्ताओं की गवाही को खारिज नहीं करतीं. आर्टिकल 14 ने प्रिया रमानी बनाम एम.जे. अकबर मानहानि मामले का भी उल्लेख किया है, जिसमें अदालत ने कहा था कि महिलाएं दशकों बाद भी यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा सकती हैं और इसके लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता.

महिला पहलवानों को प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा था. उन्होंने महीनों तक जंतर-मंतर पर धरना दिया और संसद की ओर मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई का भी सामना किया. रिपोर्ट में उस नाबालिग पहलवान के मामले का भी जिक्र है, जिसमें शिकायत में संशोधन के बाद बाल यौन अपराध संरक्षण कानून के तहत दर्ज मामला आगे नहीं बढ़ सका.

फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे "सम्मानजनक बरी" बताया है. वहीं शिकायत करने वाली महिला पहलवान इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रही हैं. आर्टिकल 14 का कहना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति के बरी होने का नहीं, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि यदि लंबे संघर्ष, सार्वजनिक विरोध, विस्तृत आरोपों और अदालत में गवाही देने के बाद भी शिकायतकर्ताओं को न्याय नहीं मिलता, तो भविष्य में यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाएं न्याय व्यवस्था पर कितना भरोसा कर पाएंगी.

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