“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से पलायन की पीड़ा के बीच नोएडा से तमिलनाडु तक मज़दूर असंतोष
देश के औद्योगिक परिदृश्य पर इस समय एक गहरी बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही है. नोएडा के कारखानों से लेकर तमिलनाडु के उत्पादन केंद्रों तक, बिहार, उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के भिवाड़ी तक, हर जगह मज़दूर या तो सड़कों पर उतर आए हैं या फिर भूख, असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच अपने गांवों की ओर लौटते नज़र आ रहे हैं. यह केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय संकट का संकेत है. इसी पृष्ठभूमि में सूरत से एक प्रवासी मज़दूर का वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वह यह कहते सुनाई दे रहे हैं, “अब नहीं आऊंगा दोस्त, बता देना”. यह वाक्य लाखों मज़दूरों की सामूहिक पीड़ा और टूटन का प्रतीक बन गया है. ये वही लोग हैं जो छोटे कस्बों और गांवों से बड़े शहरों में रोज़गार की तलाश में आए थे, लेकिन अब परिस्थितियां उन्हें वापस लौटने पर मजबूर कर रही हैं. कोविड-19 के दौरान जो तस्वीरें देश ने देखी थीं, वैसी ही बेचैनी एक बार फिर उभरती दिखाई दे रही है.
गुजरात के सूरत में उदना रेलवे स्टेशन पर उमड़ी भीड़ इस संकट की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करती है. हजारों प्रवासी मज़दूर लंबी कतारों में खड़े होकर अपने घर लौटने की कोशिश करते दिखे. इकनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह मज़दूर एलपीजी की कमी और बढ़ती कीमतों ने उनके लिए शहर में रहना मुश्किल कर दिया है. नोएडा में यह असंतोष खुले विरोध के रूप में सामने आया. हज़ारों फैक्ट्री मज़दूर सड़कों पर उतर आए और ऊंचे वेतन तथा बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग करने लगे. इनमें अधिकतर गैर-यूनियन ठेका मज़दूर थे, जो ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़ा उद्योग में काम करते हैं. उनकी मासिक आय 10,000 से 15,000 रुपये के बीच है, जो वर्षों से लगभग स्थिर बनी हुई है. बढ़ती महंगाई के बीच यह आय उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है.
इस असंतोष को और बढ़ाया राज्यों के बीच वेतन में असमानता ने, हरियाणा सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम वेतन में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी किए जाने के बाद, आसपास के राज्यों के मज़दूरों में भी समान वृद्धि की मांग तेज़ हो गई. लेकिन जब अन्य राज्यों में ऐसी बढ़ोतरी नहीं हुई, तो यह असंतोष और गहरा गया. दरअसल 2021 से 2026 के बीच महंगाई में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन कई राज्यों में बेस न्यूनतम वेतन का समय पर संशोधन नहीं किया गया. भारत की न्यूनतम वेतन प्रणाली दो हिस्सों पर आधारित है, पहला बेस वेतन और दूसरा महंगाई भत्ता, लेकिन बेस वेतन में देरी के कारण कुल आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई. नतीजतन, मज़दूरों की वास्तविक आय घटती गई.
फरवरी 2026 से ही यह असंतोष अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में दिखाई देने लगा था. 2 फरवरी को बिहार के बरौनी में इंडियन ऑइल (आईओसीएल) की रिफाइनरी के मज़दूरों ने लंबे काम के घंटे, बिना भुगतान के ओवरटाइम और खराब कामकाजी परिस्थितियों के खिलाफ प्रदर्शन किया. इसके बाद 23 फरवरी को पानीपत रिफाइनरी में करीब 30,000 मज़दूरों का विरोध उग्र हो गया, जिसमें पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं. 27 फरवरी को सूरत के हजीरा में आर्सेलरमित्तल/निप्पॉन स्टील इंडिया (एम/एनएस) प्रोजेक्ट साइट पर भी मजदूरों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई. इन सभी आंदोलनों के केंद्र में एक साझा कारण रहा, महंगाई और ठहरे हुए वेतन के बीच बढ़ता अंतर. खासकर एलपीजी संकट ने मज़दूरों की स्थिति को और कठिन बना दिया. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे सिलेंडरों की कीमत काला बाज़ार में 3-4 गुना तक बढ़ गई. इसका सीधा असर मज़दूरों के भोजन और दैनिक जीवन पर पड़ा.
द फ़ेडरल की रिपोर्ट के मुताबिक़ तमिलनाडु में 12 फरवरी को हुए “भारत बंद” ने इस असंतोष को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया. मज़दूर संगठनों और किसान समूहों ने मिलकर केंद्र सरकार की नीतियों और नए श्रम कानूनों का विरोध किया. सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियनस ने आरोप लगाया कि ये कानून मज़दूरों की सुरक्षा को कमज़ोर करते हैं और कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देते हैं.
नए श्रम कानूनों को लेकर भी मज़दूरों में भ्रम और निराशा है. ऑक्यूपेशनल सेफ्टी हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020 साप्ताहिक 48 घंटे का कार्य समय निर्धारित करता है, लेकिन दैनिक काम के घंटों को स्पष्ट नहीं करता. इसका फायदा उठाकर कई जगह 12 घंटे की शिफ्ट लागू की जा रही है, बिना उचित ओवरटाइम भुगतान के. उत्तराखंड के मोटाहल्दू और राजस्थान के भिवाड़ी जैसे क्षेत्रों में भी मजदूर सड़कों पर उतर आए. उत्तराखंड में मज़दूरों ने ₹20,000 न्यूनतम वेतन और 8 घंटे की शिफ्ट की मांग की, साथ ही बिना भुगतान ओवरटाइम और असुरक्षित कामकाजी हालात की शिकायत की. महिला कर्मचारियों ने अमानवीय व्यवहार और बुनियादी सुविधाओं की कमी के आरोप भी लगाए.
भारत के श्रम बाजार की एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि 90 प्रतिशत से अधिक मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां न्यूनतम वेतन का कानून अक्सर कागज़ों तक सीमित रह जाता है. 31 करोड़ से अधिक श्रमिक बिना किसी ठोस सामाजिक सुरक्षा के काम कर रहे हैं.
इन प्रदर्शनों की एक खास बात यह रही कि इनमें किसी बड़े ट्रेड यूनियन का नेतृत्व नहीं था. वहीं उद्योग जगत का कहना है कि अचानक वेतन बढ़ाना उनके लिए भी आसान नहीं है. छोटे और मध्यम उद्योग सीमित मुनाफे पर चलते हैं, और लागत बढ़ने से उनके लिए संचालन कठिन हो सकता है.

