रांगा नायकम्मा | जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों के पीछे का सच

31 अगस्त को केंद्र सरकार ने देश की संपत्ति में वृद्धि से संबंधित कुछ आंकड़े जारी किए. इन आंकड़ों का सार यह था कि पिछले वर्ष यानी 2025 में अप्रैल से जून के बीच देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य यानी सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में 2026 की इसी अवधि में उत्पादन का कुल मौद्रिक मूल्य अधिक रहा.

सरकार का एक विभाग, जैसे सांख्यिकी विभाग या वित्त विभाग, वास्तविक मौद्रिक आंकड़ों की गणना करता है. इस विभाग के अर्थशास्त्री हर वर्ष तीन महीनों के दौरान देशभर में हुए कुल उत्पादन का विवरण जुटाते हैं. वे अपनी उपयुक्त समझी जाने वाली ‘कार्यप्रणाली’ के आधार पर इन आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं और फिर उन्हें समाचार पत्रों तथा टेलीविजन चैनलों के लिए जारी करते हैं.

एक सप्ताह पहले जारी हुए इन आंकड़ों को देखकर प्रधानमंत्री प्रसन्न हुए और उन्होंने सरकार के शासन में हुए आर्थिक विकास का उल्लेख करते हुए विपक्ष को निराशावादी बताया. उन्होंने कहा कि जो लोग विनाश की भविष्यवाणी करते थे, वे खुद समाप्त हो गए, जबकि भारत आगे बढ़ा है.

प्रधानमंत्री के इस दावे पर विपक्ष चुप कैसे रह सकता है. विपक्ष ने भी अपनी भाषा में जवाब दिया. उसके अनुसार सरकार द्वारा घोषित जीडीपी का अर्थ है ‘ग्रेटली डिस्टॉर्टेड पिक्चर’, यानी “बहुत विकृत तस्वीर”. विपक्ष ने सरकार के आंकड़ों को सांख्यिकीय चाल, आंकड़ों की हेराफेरी और जानबूझकर तैयार की गई जानकारी तक बताया.

सरकार से असहमत लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब पिछले कुछ वर्षों से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दो बड़े युद्ध चल रहे हैं और कई देशों की विकास दर प्रभावित हो रही है, तब भारत की विकास दर पहले की तुलना में कैसे बढ़ सकती है.

सत्ता और विपक्ष दोनों हर बार एक जैसी बातें दोहराते हैं. सत्ता में रहने पर वे कहते हैं कि उनके शासन में कितना आर्थिक विकास हुआ. सत्ता से बाहर होने पर वे पूछते हैं कि ऐसा विकास किस काम का है, यदि इससे बेरोजगारी, गरीबी और बढ़ती कीमतें कम नहीं होतीं. दोनों पक्षों के अर्थशास्त्री भी जीडीपी के आंकड़ों को लेकर एक-दूसरे से अलग तर्क देते हैं.

एक पक्ष के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि उत्पादन की गणना इस आधार पर नहीं की गई कि कारखाने में उसे बनाने में कितना पैसा लगा, बल्कि इस आधार पर की गई कि उसे बेचने से अंततः कितना पैसा मिला. इसलिए ऐसा दिखाई देता है कि उत्पादन अधिक हुआ है.

सरकार समर्थक पक्ष इसका जवाब देते हुए अलग-अलग माप इकाइयों का उदाहरण देता है. उसका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति का वजन 150 पाउंड या 70 किलोग्राम बताया जाए तो क्या वास्तव में कोई बड़ा अंतर होगा. एक माप में संख्या बड़ी और दूसरे में छोटी दिखाई देती है, लेकिन वजन वही रहता है.

लेकिन सत्ता पक्ष, विपक्ष और उनके अर्थशास्त्री मजदूर वर्ग को जीडीपी का वास्तविक रहस्य नहीं बताते. इसे समझने के लिए कार्ल मार्क्स की ओर देखना होगा, जिन्होंने मजदूर वर्ग के हितों के दृष्टिकोण से पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था का अध्ययन किया.

मार्क्स के समय ‘जीडीपी’ यानी ‘ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट’ शब्द अस्तित्व में नहीं था. मार्क्स की मृत्यु के लगभग पचास वर्ष बाद एक पूंजीवादी अर्थशास्त्री ने इस शब्द को प्रचलित किया.

यह शब्द ‘श्रम के शोषण’ के वास्तविक रहस्य को छिपा देता है और केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित करता है कि पूंजीपतियों ने हर तीन महीने या हर वर्ष मुनाफे के रूप में कितनी नई संपत्ति अर्जित की.

विकास दर की गणना करने वालों को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि उत्पादित वस्तुओं में से कितनी वस्तुएं कामकाजी लोगों तक पहुंचीं. उन्हें यह भी चिंता नहीं होती कि उन उत्पादों में सिगरेट, ब्रांडी और व्हिस्की जैसी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुओं का कितना हिस्सा है या बंदूक, बम, युद्धक टैंक और अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल जैसे विनाशकारी हथियार कितने हैं.

सरकार और उसके अर्थशास्त्री केवल उन शब्दों में बात करते हैं जिनका इस्तेमाल अपनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए किया जा सकता है. वे बताते हैं कि अर्थव्यवस्था का मूल्य कितने लाख करोड़ रुपये हो गया है.

सरकार, जो पूंजीपतियों के सामान्य हितों की देखरेख करने वाली समिति के रूप में काम करती है, उत्पादन के मूल्य में वृद्धि को दिखाकर अपनी उपलब्धि का दावा करती है. लेकिन न तो अर्थशास्त्री और न ही सरकार यह बताती है कि इस बढ़े हुए मूल्य को पैदा करने वाला श्रम किसका था. इसे हमें स्वयं समझना होगा.

मार्क्स के सिद्धांत के आधार पर किसी निश्चित अवधि में उत्पादन का मूल्य तीन हिस्सों से मिलकर बनता है. पहला, उत्पादन के साधनों में लगाया गया धन. यह निवेश की गई राशि के बराबर ही वापस आता है, इसलिए इसे ‘स्थिर पूंजी’ कहा जाता है. दूसरा, उन मजदूरों को दिए जाने वाले वेतन पर खर्च किया गया धन, जो उत्पादन के साधनों का इस्तेमाल करके वस्तुओं का उत्पादन करते हैं. तीसरा, मजदूर अपने वेतन के मूल्य से अधिक मूल्य पैदा करते हैं. इस अतिरिक्त मूल्य को ‘अधिशेष मूल्य’ कहा जाता है. मजदूरी पर खर्च धन को ‘परिवर्तनशील पूंजी’ कहा जाता है, क्योंकि उत्पादन पूरा होने पर वह उसी रूप में स्थिर नहीं रहता.

इस प्रकार जीडीपी में स्थिर पूंजी + परिवर्तनशील पूंजी + अधिशेष मूल्य शामिल होते हैं.

यही जीडीपी का वास्तविक रहस्य है.

तो फिर अर्थशास्त्री यह रहस्य क्यों नहीं बताते. क्योंकि वे पूंजीवादी अर्थशास्त्री हैं. उनके द्वारा कही गई बातों को महान आर्थिक विज्ञान के रूप में क्यों प्रचारित किया जाता है. मार्क्स ने अपनी पुस्तक पूंजी के एक उपसंहार में इसका जवाब दिया था:

“राजनीतिक अर्थशास्त्र तभी तक विज्ञान बना रह सकता है, जब तक वर्ग संघर्ष छिपा हुआ हो या केवल अलग-अलग और छिटपुट घटनाओं के रूप में सामने आता हो.”

जब कामकाजी लोग, जो वास्तव में उत्पादन करते हैं, इस बात को समझेंगे, तब आज सत्ता में मौजूद राजनीतिक दलों, विपक्षी दलों और उनके अर्थशास्त्रियों द्वारा कही जा रही बातों के पीछे की वास्तविकता अधिक स्पष्ट हो जाएगी.

(‘काउंटरकरंट्स’ में रांगा नायकम्मा का यह लेख 18 सितंबर 2026 को प्रकाशित हुआ है. मूल लेख तेलुगु में ‘आंध्र ज्योति’ में प्रकाशित हुआ था.)

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