'द क्विंट' में उमेश कुमार रे ने लिखा है कि बिहार में बौद्धिक दिव्यांगता से जूझ रहे लोगों और उनके परिवारों का जीवन इलाज, सरकारी सुविधाओं और सामाजिक स्वीकार्यता के लिए संघर्ष करते हुए गुजर रहा है. जागरूकता की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता उनकी मुश्किलें और बढ़ा रही हैं. कई परिवारों को न केवल आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है, बल्कि अपने बच्चों की देखभाल और सुरक्षा को लेकर भी लगातार चिंता बनी रहती है.
इसकी एक मिसाल 20 वर्षीय कुणाल कुमार (बदला हुआ नाम) हैं. जुलाई में अपनी मां कविता देवी (बदला हुआ नाम) के साथ दिव्यांगता संबंधी जांच रिपोर्ट जमा कराने के बाद वे जहानाबाद रेलवे स्टेशन के पास से गुजर रहे थे. कुणाल को चलने में परेशानी होती है. वह बिना सहारे 15-20 कदम से अधिक नहीं चल पाते और अक्सर संतुलन खोकर गिर जाते हैं. उस दिन भी ऐसा ही हुआ. पास की पुलिस चौकी के कर्मियों ने उन्हें शराब के नशे में समझकर हिरासत में ले लिया.
कविता ने पुलिस को बताया कि उनका बेटा बीमार है, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उनकी बात नहीं मानी. बिहार में 2016 से लागू मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम के तहत शराब का उत्पादन, सेवन, बिक्री और खरीद प्रतिबंधित है. पुलिस कुणाल को वाहन में बैठाकर जहानाबाद नगर थाने ले गई. वहां ब्रेथ एनालाइजर से जांच की गई, जिसका परिणाम नकारात्मक आया. करीब 10 मिनट बाद उन्हें छोड़ दिया गया.
कविता के मुताबिक, इस घटना से मां-बेटे इतने आहत हुए कि उन्होंने दो दिनों तक खाना नहीं खाया. इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस), पटना की रिपोर्ट के अनुसार, कुणाल को 50% बौद्धिक दिव्यांगता है. उनकी वास्तविक उम्र 20 वर्ष है, जबकि उनकी सामाजिक उम्र नौ वर्ष आंकी गई है. जहानाबाद नगर थाने के प्रभारी उमेश प्रसाद ने इस घटना के बारे में जानकारी होने से इनकार किया.
जागरूकता की कमी और इलाज में देरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, बौद्धिक दिव्यांगता एक तंत्रिका-विकास संबंधी स्थिति है, जो बचपन या विकास के शुरुआती दौर में सामने आती है. इससे व्यक्ति की सीखने, समझने, संवाद करने, सामाजिक व्यवहार और शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी क्षमताएं प्रभावित हो सकती हैं.
भारत में 2016 के दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत बौद्धिक दिव्यांगता को कानूनी मान्यता दी गई. 2011 की जनगणना में देश में लगभग 2.68 करोड़ दिव्यांग व्यक्तियों की पहचान हुई थी. इनमें करीब 6% लोगों को उस समय प्रचलित शब्दावली के अनुसार मानसिक मंदता से प्रभावित बताया गया था. बिहार में लगभग 23.31 लाख दिव्यांग व्यक्ति हैं, जो राज्य की कुल 10.42 करोड़ आबादी का 2.24% हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें लगभग 0.1% लोग बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक, बचपन में दिव्यांगता की पहचान और समय पर हस्तक्षेप से बच्चों के जीवन में सुधार लाया जा सकता है. लेकिन बिहार में जागरूकता की कमी के कारण कई परिवार शुरुआती लक्षणों को सामान्य व्यवहार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. कुछ लोग डॉक्टरों के बजाय पहले पारंपरिक उपचार या झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं.
कुणाल भी जन्म के बाद कई वर्षों तक उचित देखभाल से वंचित रहे. एक साल की उम्र के बाद भी वे खुद बैठ या खड़े नहीं हो पाते थे. उनकी मां ने शुरुआत में इसे सामान्य माना और सोचा कि कुछ बच्चे देर से चलना सीखते हैं. छह साल की उम्र तक भी जब कुणाल ठीक से चल नहीं पाए, तब कविता ने इलाज कराने की बात उठाई. लेकिन उनके ससुराल वालों ने यह कहकर मना कर दिया कि कुछ बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं. आखिरकार, 2017 में कविता अपने बेटे के साथ अलग रहने लगीं और इसके बाद उन्होंने डॉक्टर से सलाह ली. इस तरह, कुणाल को जन्म के करीब 12 साल बाद विशेष देखभाल मिलनी शुरू हुई.
सेवन कलर्स वेलफेयर सोसाइटी के सह-संस्थापक सुनील झा के अनुसार, कई परिवार शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते. वे पहले पारंपरिक चिकित्सकों और झाड़-फूंक करने वालों के पास जाते हैं. स्थिति बिगड़ने पर ही योग्य डॉक्टरों से संपर्क करते हैं. उनकी संस्था पालिगंज और आसपास के इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य शिविर लगाती है. पिछले डेढ़ वर्ष में संस्था ने 369 लोगों को उपचार उपलब्ध कराया, जिनमें 25 लोग बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित थे.
जंजीर में बंधी जिंदगी
पालिगंज में 26 वर्षीय अमित कुमार (बदला हुआ नाम) को उनके परिवार ने एक पैर में लोहे की जंजीर से बांधकर रखा है. उनकी मां कुंती देवी के मुताबिक, अमित सात साल पहले घर से लापता हो गए थे और 12 दिन बाद 17 किलोमीटर दूर करपी में मिले. इसके बाद परिवार ने उन्हें दोबारा घर से निकलने या किसी को नुकसान पहुंचाने की आशंका के चलते बांधकर रखना शुरू कर दिया. जंजीर से उनके पैर में चोट भी आती है.
अमित के व्यवहार में बचपन से बदलाव दिखाई देते थे, लेकिन परिवार ने इसे बीमारी नहीं समझा. सात साल की उम्र में दस्त होने के बाद उनकी हालत बिगड़ गई थी. अस्पताल से लौटने के बाद वे कभी चिल्लाते, कभी कपड़े फाड़ते और कभी खाना उलट देते थे. परिवार ने इसे बचपन का व्यवहार समझा. बाद में उन्हें कई सरकारी और निजी अस्पतालों में दिखाया गया. एक तांत्रिक को भी पांच हजार रुपये दिए गए, जिसने उन्हें नौ दिन तक पीपल के पेड़ के नीचे सुलाने को कहा. कुंती के मुताबिक, इलाज और झाड़-फूंक पर उन्होंने लगभग एक लाख रुपये खर्च किए, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ. आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने इलाज की कोशिश छोड़ दी.
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, बौद्धिक दिव्यांगता के कई कारण हो सकते हैं. इनमें डाउन सिंड्रोम, मस्तिष्क के विकास में असामान्यता, गर्भावस्था के दौरान संक्रमण या मां की बीमारी, जन्म के समय बच्चे को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलना और जन्म के बाद गंभीर संक्रमण या सिर की चोट शामिल हैं.
उत्कर्ष सेवा संस्थान की सचिव डॉ. मनीषा कृष्णा का कहना है कि आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं को बच्चों के विकास संबंधी लक्षणों की पहचान करने का प्रशिक्षण देना जरूरी है. इसके लिए विकास संबंधी चार्ट माता-पिता को भी दिए जाने चाहिए, ताकि वे बच्चों की प्रगति पर नजर रख सकें और समस्या के संकेत मिलने पर उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या बुनियाद केंद्र भेज सकें.
सरकारी सुविधाओं तक पहुंच की चुनौती
बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित लोग पेंशन, स्वरोजगार के लिए ऋण और सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसी सुविधाओं के पात्र हो सकते हैं. लेकिन इनका लाभ लेने के लिए विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (यूडीआईडी) जरूरी है. इसके लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की जांच में कम से कम 40% दिव्यांगता प्रमाणित होनी चाहिए.
केंद्र सरकार के 2024 के दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक जिले में दिव्यांगता आकलन बोर्ड होना चाहिए. इसमें बाल रोग विशेषज्ञ, मनोचिकित्सक और क्लिनिकल या पुनर्वास मनोवैज्ञानिक जैसे विशेषज्ञ शामिल किए जाने हैं. विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी होने पर निजी चिकित्सकों को भी बोर्ड में शामिल किया जा सकता है. हालांकि, बिहार में जिला स्तर पर ऐसे बोर्ड प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं.
यूडीआईडी पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 1,28,047 आवेदन लंबित हैं. इस मामले में राज्य उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है, जहां 1,57,623 आवेदन लंबित हैं. बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने फरवरी में अपनी निरीक्षण रिपोर्ट में यूडीआईडी जारी करने की व्यवस्था में कमियां पाई थीं. प्राधिकरण ने लंबे समय से मानसिक बीमारी से जूझ रहे और उपचार से लाभ नहीं पा रहे लोगों तथा बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्तियों के लिए फास्ट ट्रैक मेडिकल बोर्ड बनाने की सिफारिश की थी. इसी रिपोर्ट के आधार पर पटना हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका शुरू की.
मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के सदस्य भावेश झा के मुताबिक, बिहार में बौद्धिक और मानसिक दिव्यांगता के लिए यूडीआईडी बनवाने की जिला स्तर पर प्रभावी व्यवस्था नहीं है. उन्होंने बताया कि उनके अपने भाई, जो ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर से प्रभावित हैं, उनके लिए भी यूडीआईडी हासिल करना मुश्किल रहा.
कुणाल को सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से यूडीआईडी मिल गया है, लेकिन अमित का आवेदन अब भी लंबित है. पालिगंज अनुमंडलीय अस्पताल में डॉक्टरों का बोर्ड पिछले एक महीने से नहीं बैठा है. अस्पताल के उपाधीक्षक उमाशंकर प्रसाद के मुताबिक, वहां न्यूरोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं है. इसलिए ऐसे मरीजों को आईजीआईएमएस या पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल भेजना पड़ता है. वहीं, आईजीआईएमएस के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश कुमार ने इलाज से इनकार के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि संस्थान दिव्यांगता का आकलन करके प्रमाणपत्र जारी करता है, जबकि यूडीआईडी के लिए मरीजों को अनुमंडलीय अस्पताल जाना होता है.
परिवारों के सामने भविष्य की चिंता
यूडीआईडी नहीं मिलने से परिवार सरकारी योजनाओं और आर्थिक सहायता से वंचित रह जाते हैं. कविता घरेलू काम करने और बच्चों को पढ़ाने के जरिए परिवार का खर्च चलाती हैं. उनके पति दिल्ली में मजदूरी करते हैं, लेकिन पर्याप्त पैसे नहीं भेज पाते. दूसरी ओर, कुंती और उनके पति पट्टे पर आधा बीघा जमीन लेकर खेती करते हैं. उनके लिए हर महीने मिलने वाली 1,100 रुपये की दिव्यांगता पेंशन भी बड़ी मदद साबित हो सकती है.
कुंती को सबसे अधिक चिंता अमित के भविष्य की है. उनका कहना है कि जब तक वे जीवित हैं, बेटे की देखभाल कर रही हैं, लेकिन उनके बाद उसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा, यह सवाल उन्हें लगातार परेशान करता है.

