अर्घ्य सेनगुप्ता | विवेक की आवाज़: जब न्यायपालिका ने सरकार को आईना दिखाया

तकनीकी पेचीदगियों, प्रक्रियाओं और शब्दों के जाल के बीच कानून बुनियादी तौर पर 'व्यावहारिक समझ' (कॉमन सेंस) पर आधारित होता है—इस बात को समय-समय पर याद दिलाने की आवश्यकता पड़ती है. हाल ही में यह सीख एक ऐसी जगह से आई, जिसकी उम्मीद कम ही थी.

‘द टेलीग्राफ’ में अर्घ्य सेनगुप्ता ने लिखा है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसीज़) की नियुक्ति से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई के दौरान भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की टिप्पणियों ने यह सिद्ध कर दिया कि सर्वोच्च न्यायालय को सत्ता के सामने सच बोलने वाली एक निर्भीक आवाज़ के रूप में क्यों बने रहना चाहिए.  न्यायमूर्ति दत्ता ने तीन प्रमुख बिंदु रेखांकित किए:

पहला: सीईसी और ईसीज़ की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति की संरचना मूल रूप से अनुचित है, क्योंकि यह संरचनात्मक रूप से हमेशा सरकार को ही लाभ पहुँचाती है.

दूसरा: बीते दशक का रिकॉर्ड दिखाता है कि 'भारत में जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं' का दावा एक मिथक है—अंतिम निर्णय सरकार का ही होता है.

तीसरा: यदि सरकार की मांग के अनुसार कानून के हर महत्वपूर्ण सवाल पर पांच जजों की पीठ ही फैसला करेगी, तो न्यायालय को समय बचाने के लिए एक स्थायी संविधान पीठ गठित कर देनी चाहिए.

ये बातें किसी टकराव के भाव से नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश के साथ कही गईं कि यदि सभी पक्षों को बेहतर कानूनी सलाह मिली होती, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही न होती.

संरचनात्मक संतुलन और संवैधानिक मंशा

अदालत के समक्ष प्रश्न सीधा था—क्या 2023 का वह कानून संवैधानिक रूप से सही है, जिसमें नियुक्ति समिति में सीजेआई के स्थान पर कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया? इसे 2023 के ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ ‘ मामले के फैसले के आलोक में परखा जाना था, जहाँ अदालत ने कहा था कि निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त रखना अनिवार्य है. तब अंतरिम व्यवस्था के रूप में समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को रखने का सुझाव दिया गया था.

न्यायमूर्ति दत्ता ने बेबाकी से कहा कि किसी कैबिनेट मंत्री से अपने ही प्रधानमंत्री का विरोध करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती. यदि वे ऐसा करते भी हैं, तो भी ऐसी समिति जनता की नज़र में निष्पक्ष नहीं दिख सकती. केवल कार्यकारी एकाधिकार न होने का भ्रम पैदा करने के लिए विपक्ष के नेता को शामिल कर लेना पर्याप्त नहीं है, जब पूरी संरचना ही सरकार के पक्ष में झुकी हुई हो.

सरकार ने इस कानून का सीधा बचाव करने के बजाय मामले का रुख मोड़ते हुए इसे बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की. न्यायमूर्ति दत्ता ने तुरंत स्पष्ट किया कि बड़ी पीठ को मामला केवल तभी संदर्भित किया जाता है जब संवैधानिक कानून का कोई प्रश्न अनसुलझा हो, जो कि यहाँ नहीं था. फिर भी, उन्होंने सीजेआई से शुद्ध संवैधानिक मुद्दों के लिए एक स्थायी पांच-न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का अनुरोध किया, ताकि बार-बार संदर्भ की मांग करने वाली सरकार को त्वरित उत्तर मिल सके.

आंतरिक आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता

न्यायमूर्ति दत्ता की टिप्पणियाँ सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी गहरे आत्मनिरीक्षण का अवसर हैं. स्वीकृत 38 न्यायाधीशों की संख्या के साथ, अदालत में अक्सर दो या तीन जजों की पीठें बैठती हैं. इससे अलग-अलग पीठों के फैसलों में भिन्नता आती है, वकील अपनी पसंद की पीठ चुनने (बेंच-हॉपिंग) का प्रयास करते हैं, और निर्णयों की अंतिम ताक़त प्रभावित होती है. यह स्थिति पक्षों को अपनी सुविधा अनुसार मामलों को बड़ी पीठों में भेजने की मांग करने का बहाना देती है. संवैधानिक मामलों के लिए एक स्थायी पांच-न्यायाधीशों की पीठ का गठन इस दिशा में एक बहु-प्रतीक्षित और आवश्यक सुधार होगा.

न्यायिक नियुक्तियाँ: कुतर्क बनाम वास्तविकता

न्यायमूर्ति दत्ता का सबसे तीखा प्रहार न्यायिक नियुक्तियों के मुद्दे पर था. 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को रद्द किए जाने के बाद से सरकार और न्यायपालिका के बीच खींचतान जारी है.  हालाँकि वह फैसला संवैधानिक रूप से विवादित था, लेकिन समय के साथ सरकार का रवैया और अधिक चिंताजनक हो गया है.

सरकार द्वारा कॉलेजियम की सिफारिशों को लंबे समय तक रोके रखना, सूचियों को छाँटना और बिना कारण बताए कुछ नामों को मंज़ूरी देकर अन्य को अटकाना—यह दर्शाता है कि जजों की नियुक्ति में अंतिम शब्द सरकार का ही होता है. ऐसे में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के बचाव में 'जज ही जजों को चुनते हैं' का तर्क देना एक स्पष्ट कुतर्क (व्हाटअबाउट्री) था.

सार यह है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया सरकार और न्यायपालिका दोनों के लिए एक चेतावनी भरी सीख है. दुर्भाग्य से, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया भी उसी असंतुलन की ओर बढ़ती दिखती है. लिहाजा वर्तमान संस्थागत संकट को दूर करने के लिए न्यायमूर्ति दत्ता की टिप्पणी नागरिक समाज, सरकार और स्वयं न्यायाधीशों के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शन है. यह टिप्पणी इस मौलिक सत्य की पुनः पुष्टि करती है कि सर्वोच्च न्यायालय का मूल अस्तित्व ही ऐसे समय में 'व्यावहारिक समझ' (कॉमन सेंस) की मुखर आवाज़ बनना है, जब इस विवेक को लगभग बेआवाज़ कर दिया गया हो.

(अर्घ्य सेनगुप्ता 'विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी' में रिसर्च डायरेक्टर हैं. यहां उनके लेख को हिंदी में अनूदित और संपादित कर पेश किया गया हैं.)

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