श्रवण गर्ग | अगर डीलिमिटेशन बिल नहीं आया तो सरकार के लिए यह सबसे बड़ा धक्का है

'हरकारा डीप डाइव' के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक श्रवण गर्ग ने मानसून सत्र के आखिरी दिनों में संसद के लगातार ठप रहने, सरकार की रणनीति, अमित शाह की गैरमौजूदगी और विपक्ष में फूट डालने की कोशिशों पर विस्तार से चर्चा की.

बातचीत की शुरुआत संसद में लगातार जारी गतिरोध से हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि सरकार अब संसद के भीतर विपक्ष और छात्रों की मांगों का जवाब देने के बजाय संसद के बाहर राजनीतिक टकराव की तैयारी करती दिखाई दे रही है. उनके मुताबिक, "सरकार की रणनीति कॉन्फ्रंटेशन की है और वो कॉन्फ्रंटेशन संसद के बाहर की है. संसद का सत्र खत्म हो जाने के बाद विपक्ष से निपटने की है."

उन्होंने सरकार की ओर से छात्र आंदोलनों पर चर्चा के लिए सहमति जताने को भी महत्वपूर्ण बताया. गर्ग के मुताबिक, विपक्ष की मूल मांग अमित शाह के सदन में आकर छात्रों पर हुई कार्रवाई, पैलेट गन के इस्तेमाल और पुलिस कार्रवाई पर बयान देने की है, जबकि सरकार पहले चर्चा और उसके बाद गृह मंत्री के जवाब की रणनीति अपना रही है.

इस पूरे घटनाक्रम में उन्होंने सरकार की "फूट डालो और राज करो" वाली रणनीति की ओर भी इशारा किया. उनके अनुसार, सरकार राहुल गांधी की प्राथमिकता छात्र आंदोलन और अखिलेश यादव की प्राथमिकता अयोध्या के चंदे-चढ़ावे से जुड़े मुद्दे को मानकर दोनों नेताओं के बीच अंतर पैदा करने की कोशिश कर रही है. हालांकि, विपक्ष लगातार दोनों मुद्दों पर एक साथ चर्चा की मांग कर रहा है.

श्रवण गर्ग ने अमित शाह की संसद से दूरी को भी रणनीतिक बताया. केरल का नाम बदलकर केरलम करने और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से जुड़े विधेयकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिन विधेयकों के बहाने अमित शाह के सदन में आने की उम्मीद थी, उन्हें गृह राज्य मंत्रियों के जरिए पेश करा दिया गया.

बातचीत में परिसीमन विधेयक को सरकार के लिए बड़ा संभावित झटका बताया गया. गर्ग के मुताबिक, अगर मानसून सत्र खत्म होने से पहले परिसीमन विधेयक नहीं आता है, तो अगले साल होने वाले कई राज्यों के चुनावों के बीच सरकार के लिए इसे आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है.

चर्चा संसद से निकलकर सड़क और चुनावी राजनीति तक पहुंची. श्रवण गर्ग ने झारखंड में छात्र आंदोलन, दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों के घरों तक पुलिस पहुंचने की खबरों और उत्तर प्रदेश में दारुल उलूम तथा कृष्ण जन्मभूमि जैसे धार्मिक मुद्दों के उभरने को एक बड़े राजनीतिक पैटर्न से जोड़कर देखा. उनके अनुसार, छात्र आंदोलन से निपटने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश का चुनाव हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के मुद्दों पर ले जाने की कोशिश हो सकती है.

अंत में 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर भी चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि संसद में जवाबदेही से बचने के बाद सरकार स्वतंत्रता दिवस के मंच से विपक्ष पर संसद न चलने देने का आरोप लगा सकती है. उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि जनता पहले से ही अनुमान लगा सकती है कि प्रधानमंत्री के भाषण में क्या कहा जाएगा. उनके मुताबिक, "मोदी जी के पास बोलने को कुछ नहीं है. उनके पास अब करने को ही बचा है."

पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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