श्रवण गर्ग | मोहन भागवत ने आंदोलनकारी छात्रों को राष्ट्रविरोधी मानने से इनकार कर पूरी बहस का केंद्र बदल दिया
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग चर्चा कर रहे हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के उस संवाद की, जिसने मौजूदा राजनीतिक माहौल में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. मुंबई में जनरेशन Z और अल्फा पीढ़ी के करीब दो हजार युवाओं के साथ हुई इस बातचीत को श्रवण गर्ग केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संघ की सार्वजनिक राजनीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटना मानते हैं. उनका कहना है कि हाल के दिनों में छात्र आंदोलन को लेकर संघ के कुछ पदाधिकारियों और उससे जुड़े संगठनों की ओर से जिस तरह के बयान आए, उनके बीच मोहन भागवत का रुख बिल्कुल अलग दिखाई दिया.
श्रवण गर्ग के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों से यह धारणा बन रही थी कि संघ छात्र आंदोलन के खिलाफ पूरी तरह आक्रामक रुख अपनाए हुए है. एबीवीपी और संघ के कुछ नेताओं की टिप्पणियों में आंदोलनकारियों पर राष्ट्रविरोधी ताकतों के प्रभाव तक की बात कही गई. लेकिन मुंबई में मोहन भागवत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार स्वाभाविक है, हर आंदोलन राष्ट्रविरोधी नहीं होता और नई पीढ़ी को संदेह की नजर से नहीं, बल्कि संवाद की भावना से देखा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं की शिकायतें वास्तविक होनी चाहिए, उनका उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि समाज को तोड़ना. लेकिन केवल किसी आंदोलन में शामिल होने के आधार पर किसी को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता.
श्रवण गर्ग इस बदलाव को सबसे महत्वपूर्ण संकेत मानते हैं. उनके अनुसार सवाल यह नहीं है कि मोहन भागवत ने क्या कहा, बल्कि यह है कि उन्होंने यह सब ऐसे समय में क्यों कहा, जब संसद छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर ठप पड़ी हुई है और सरकार लगातार विपक्ष के निशाने पर है. क्या संघ सरकार को कोई संदेश देना चाहता है? क्या यह छात्रों के बीच बढ़ती नाराजगी को समझने की कोशिश है? या फिर यह केवल राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई गई नई रणनीति है? श्रवण गर्ग का मानना है कि इन सभी संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.
बातचीत केवल छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं रही. मोहन भागवत ने शिक्षा पर अधिक सरकारी निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना देश की प्राथमिकता होनी चाहिए. आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सामाजिक भेदभाव समाप्त होने तक इसकी आवश्यकता बनी रहेगी. साथ ही उन्होंने संपन्न वर्गों से स्वेच्छा से अपने विशेषाधिकार छोड़ने की अपील की, ताकि सबसे वंचित तबकों तक आरक्षण का लाभ पहुंच सके. महिलाओं की भागीदारी के सवाल पर उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में संघ के भीतर भी नए रास्ते खुल सकते हैं. वहीं, LGBTQ समुदाय को लेकर भी उनका रुख पहले की तुलना में अधिक संवादपरक दिखाई दिया. उन्होंने कहा कि समाज और कानून, दोनों को समय के साथ इस विषय पर समाधान विकसित करना चाहिए.
श्रवण गर्ग का कहना है कि इस पूरे संवाद की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि मोहन भागवत ने अपने विचार किसी औपचारिक भाषण के बजाय प्रश्नोत्तर के माध्यम से रखे. इससे बातचीत अधिक स्वाभाविक लगी और कठिन मुद्दों पर भी उनकी राय सीधे सामने आई. उनके अनुसार यह संवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संघ की भविष्य की दिशा, भाजपा की राजनीतिक रणनीति और बदलते सामाजिक विमर्श को लेकर कई नए प्रश्न सामने आए हैं. क्या यह संघ के भीतर वैचारिक बदलाव की शुरुआत है, या केवल वर्तमान परिस्थितियों में अपनाई गई राजनीतिक रणनीति? इसका उत्तर आने वाले दिनों में मिलेगा. लेकिन इतना तय है कि मुंबई का यह संवाद केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उसने भारतीय राजनीति, संघ और सरकार की भूमिका को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

