प्रगति सक्सेना | गालियां हमें जोड़ती हैं!
शायद अनजाने ही- लेकिन बेशक-हिजास मूसा केरल के स्टैंडअप कॉमिक हैं, ज्यादातर अंग्रेजी में परफॉर्म करते हैं, हिंदी भी आती है. लेकिन दर्शकों/श्रोताओं के हंसी का फव्वारा तभी छूटता है जब वे खालिस हिंदी में देसी 'मां बहन' करते हैं.
अजीम बनातवाला मुंबई के स्टैंडअप कॉमिक हैं. वे भी ज्यादातर अंग्रेजी में परफॉर्म करते हैं लेकिन गालियां हिंदी में देना ही पसंद करते हैं.
डैनी फर्नांडिस गोआ के स्टैंडअप कॉमिक हैं. वे भी अपने जोक्स में गालियां खालिस हिंदी में ही देते हैं.
मनजीत सरकार छत्तीसगढ़ से आते हैं, जाति, धर्म वर्ग आदि गंभीर विषयों पर कमाल की कॉमेडी करते हैं. लेकिन गाली के मामले में हिंदी को ही प्रश्रय देते हैं.
मासूम राजवानी भी मुंबई के स्टैंडअप कॉमिक हैं, और क्या गजब की परफॉर्मेंस है उनकी! ज्यादातर अंग्रेजी में बोलते हैं लेकिन हिंदी, खासकर बंबइया हिंदी का बढ़िया इस्तेमाल करते हैं. और गालियां हिंदी में ही देते हैं.
महिलाएं भी इसमें पीछे नहीं हैं. गुरलीन पन्नू मशहूर स्टैंडअप कॉमिक और लेखक हैं. लाइव स्टैंडअप में चुनिंदा गालियों का इस्तेमाल करती हैं. प्रशस्ति सिंह, श्रीजा चतुर्वेदी, श्रेया राय इत्यादि सभी गालियों का उदार प्रयोग करती हैं.
अन्य मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन जो मूलतः हिंदी में ही परफॉर्म करते हैं, उनके लिए गालियां सहज-स्वाभाविक ही लगती हैं. अनुभव बस्सी, अभिषेक उपमन्यु, तो हैं ही. जाकिर खान भी शुरुआती परफॉर्मेंसेस में खासी गालियों का प्रयोग करते थे लेकिन अब जरा सेंटीमेंटल दास्तानगोई की तरफ बढ़ गए हैं तो गालियों से जरा परहेज करने लगे हैं.
पुनीत पानिया मुंबई से हैं और कमाल के राजनीतिक स्टैंड अप कॉमिक हैं, गालियां भी कमाल सप्रसंग इस्तेमाल करते हैं. जोक चाहें हिंदी में हो या अंग्रेजी में, गालियां जरूर हिंदी में ही होती हैं.
वरुण ग्रोवर और कुणाल कामरा सामाजिक और राजनीतिक व्यंग करने वाले स्टैंड अप कॉमेडियन हैं और उनके व्यंग में एक गंभीर कमेंट होता है, जिसे बर्दाश्त करना राजनीतिक हाकिमों के लिए जरा मुश्किल हो जाता है. वरुण का अंदाज जरा नरम और सूक्ष्म है जबकि कुणाल थोड़े रूखे और बहुत सीधे और स्पष्ट हैं. मगर गालियों के इस्तेमाल में दोनों उदार हैं और ठेठ हिंदी गालियों का ही प्रयोग करते हैं.
और बहुत से नाम हैं, जिनका यहां इस संदर्भ में जिक्र किया जा सकता है और जो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं (दरअसल आजकल स्टैंड अप कॉमेडियन ही पत्रकार, स्तंभकार, लेखक और टिप्पणीकार का कार्यभार पूरी जिम्मेदारी से उठा रहे हैं).
लेकिन चाहें राजनीतिक मजाक हो, सामाजिक या यूं ही फिजूल सा - सभी में एक बात सामान्य है - ठेठ हिंदी की गालियां. और यहां यह आलोचनात्मक स्वर में नहीं कहा जा रहा. यह एक दिलचस्प बात है कि भाषाई या प्रांतीय पृष्ठभूमि कोई भी हो, गालियों के लिए हम सभी हिंदी पर आ जाते हैं. एक जबरदस्त विभाजित और नफरत से भरे हुए हमारे आज के समाज में एक अच्छी बात तो है जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है- हिंदी की गालियां.
बहुत लोगों से बात करने पर यह मालूम हुआ कि बगैर हिंसा का प्रयोग किए गालियों में गुस्से, क्षोभ, अपमान, निरादर और अवमानना की जो पुरजोर अभिव्यक्ति होती है वह अन्य शब्दों, अन्य भाषाओं की गालियों में शायद नहीं होती. 'च' और 'ग' से शुरू होने वाले हिंदी शब्द अब अपमानजनक भी नहीं माने जाते खासकर इस तरह के शोज़ में. इनके उच्चारण मात्र से ही दर्शकों/श्रोताओं में हल्की खिलखिलाहट की एक लहर दौड़ जाती है.
गालियों ने दरअसल एक हद तक हमें उस मर्यादा तोड़ने की आजादी दी है जो हम यानी एक समाज पर समय के साथ साथ जबरन थोप दी गई.
हिंदी भाषी समाज तो वैसे भी औपचारिक व्यवहार में अति शालीन संकोची और लज्जालु माना जाता रहा है. जबकि हकीकत ये है कि यही समाज आम सड़कों, गलियों और परिवारों में भाषाई तौर पर बेहद रुखा, गाली गलौच से भरा और निर्लज्ज रहा है. औपचारिक और वास्तविक संवाद के बीच ये परस्पर विरोधी धारा देखना बहुत दिलचस्प है. कुछ हद तक तो यह हर समाज में होता है, लेकिन हिंदी भाषी समाज में यह खाई गहरी है और वक्त के साथ साथ और भी गहरी होती जा रही है.
बहुत सारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और पारिवारिक दबावों से बोझिल एक व्यक्ति के लिए अपनी असहायता, गुस्सा और झुंझलाहट निकालने का सबसे आसान और प्रभावशाली तरीका भला और क्या हो सकता है!
गालियां एक खास तरह की बेअदबी, गुस्ताखी और हिम्मत को भी प्रतिबिंबित करती हैं जो एक असहाय व्यक्ति का धारदार हथियार बन जाती हैं तो स्टैंड अप कॉमेडी के मजाक का नुकीलापन भी. और जब बोलने की आजादी पर प्रतिबंध लगने लगे तो ये गालियां आजादी का प्रतीक भी बन जाती हैं.
यूं तो मानवीय समाज में लगभग सभी गालियां स्त्रियों के प्रति अपमानसूचक शब्दों से बनी हैं, लेकिन आज महिलाएं और लड़कियां भी इन्हीं गालियों का इस्तेमाल कर आजादी और बराबरी को क्लेम कर रही हैं - कि और कहीं नहीं तो कम से कम भाषाई बराबरी तो हम हक से ले ही सकते हैं!
बहरहाल, हमारे देश के सभी कोनों से आए सभी जाति, धर्मों के स्टैंड अप कॉमेडियंस ने हिंदी गालियों का इस्तेमाल कर कम से कम एक स्तर पर तो इस समाज को जोड़ा ही है - मानो हुक्मरानों से कह रहे हों, "हममें कितनी भी फूट डाल लो मगर गालियों पर हंसने, अपमान, निरादर और मजाक उड़ाने के इस खेल में तो हम एकजुट हैं ही!"

