अपूर्वानंद | भारत के युवाओं ने मोदी का जादू तोड़ दिया है
लेखक और शिक्षाविद अपूर्वानंद का मानना है कि भारत में हालिया युवा आंदोलन को केवल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए. उनके मुताबिक, धर्मेंद्र प्रधान इस आंदोलन का वास्तविक निशाना नहीं थे. जंतर-मंतर पर जुटे युवाओं के नारे, तख्तियां, डिजिटल कला, मीम और आक्रोश मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीतिक सत्ता की छवि के खिलाफ थे. प्रधान का इस्तीफा आंदोलन की एक उपलब्धि जरूर था, लेकिन अपूर्वानंद इसे उस व्यापक राजनीतिक चुनौती का परिणाम मानते हैं, जो युवाओं ने सीधे प्रधानमंत्री के नेतृत्व और सत्ता के केंद्रीकरण के सामने खड़ी की.
अपूर्वानंद उस धारणा को भी खारिज करते हैं कि आज का भारतीय युवा राजनीति से उदासीन, केवल उपभोग और सोशल मीडिया में डूबा हुआ है. उनके अनुसार, जंतर-मंतर के आंदोलन ने दिखाया कि युवा न केवल राजनीतिक परिस्थितियों को समझते हैं, बल्कि सत्ता की संरचना और लोकतांत्रिक संस्थाओं में आए बदलावों को भी पहचान रहे हैं. उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था में सत्ता इतनी केंद्रीकृत हो चुकी है कि किसी मंत्री की जवाबदेही भी अंततः प्रधानमंत्री की राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ जाती है. इसलिए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग केवल प्रशासनिक कार्रवाई की मांग नहीं थी, बल्कि सत्ता के शीर्ष को पीछे हटने के लिए मजबूर करने की कोशिश थी.
इस आंदोलन की सबसे खास बात अपूर्वानंद इसके विकेंद्रीकृत स्वरूप को मानते हैं. यहां किसी बड़े संगठन की ओर से तैयार किए गए महंगे बैनर, एक जैसे पोस्टर या तयशुदा नारे नहीं थे. युवा गत्ते, कागज और मार्कर से अपनी बात लिख रहे थे. हर पोस्टर अलग था, लेकिन उनके मुताबिक इन अलग-अलग अभिव्यक्तियों के केंद्र में सत्ता और नरेंद्र मोदी की छवि की आलोचना थी. आंदोलन ने व्यंग्य, मीम, कार्टून और हास्य के जरिए प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द बनी उस राजनीतिक आभा को चुनौती दी, जिसे पिछले एक दशक में तैयार किया गया है.
अपूर्वानंद के अनुसार, युवाओं का गुस्सा केवल बेरोजगारी, परीक्षाओं या अवसरों की कमी से पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे अपमान और सत्ता की कथित अहंकारी भाषा के खिलाफ प्रतिक्रिया भी थी. वे मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं की तुलना "कॉकरोच" से किए जाने वाली टिप्पणी को आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक मोड़ बताते हैं. इसी अपमान के जवाब में "कॉकरोच जनता पार्टी" यानी सीजेपी का विचार सामने आया. उनके मुताबिक, युवाओं ने अपमानजनक शब्द को ही व्यंग्य और राजनीतिक प्रतिरोध के प्रतीक में बदल दिया.
इसी दौरान नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं ने आंदोलन को एक ठोस मुद्दा दिया. अपूर्वानंद का तर्क है कि युवाओं के लिए यह मामला केवल एक परीक्षा में गड़बड़ी का नहीं रहा, बल्कि रोजगार, शिक्षा, संस्थागत जवाबदेही और शासन की पूरी कार्यप्रणाली से जुड़ गया. उनके अनुसार, सत्ता लंबे समय तक युवाओं की बेचैनी को समझ नहीं सकी, क्योंकि राजनीतिक और मीडिया विमर्श "नए भारत", राष्ट्रीय गौरव और वैश्विक प्रतिष्ठा जैसी बड़ी कथाओं में उलझा रहा, जबकि युवाओं के सामने रोजगार, परीक्षा, भविष्य और सामाजिक गतिशीलता से जुड़े सवाल लगातार गंभीर होते गए.
अपूर्वानंद लिखते हैं कि पारंपरिक सार्वजनिक मंचों में पर्याप्त जगह नहीं मिलने पर युवाओं ने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपना राजनीतिक मंच बना लिया. सोशल मीडिया उनके लिए सभा स्थल बना और मीम, डिजिटल कला तथा व्यंग्य विरोध की नई भाषा बन गए. उनके मुताबिक, यह आंदोलन बताता है कि नई पीढ़ी की राजनीतिक अभिव्यक्ति को पुराने आंदोलनों के पैमानों से समझना पर्याप्त नहीं है.
इस पूरे घटनाक्रम में सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर अनशन भी महत्वपूर्ण मोड़ बना. अपूर्वानंद के अनुसार, सरकार ने शुरुआत में इसे नजरअंदाज करने की रणनीति अपनाई. वांगचुक की तबीयत बिगड़ने और बाद में उन्हें जबरन हटाए जाने से युवाओं में आक्रोश बढ़ा. युवाओं ने इसे केवल वांगचुक के साथ हुए व्यवहार के रूप में नहीं, बल्कि असहमति जताने वाले नागरिक के साथ सत्ता के रवैये के उदाहरण के तौर पर देखा. इसके बाद बड़ी संख्या में युवा जंतर-मंतर पहुंचे.
20 जुलाई को संसद की ओर युवाओं के मार्च और पुलिस कार्रवाई को अपूर्वानंद आंदोलन का एक और निर्णायक क्षण मानते हैं. उनके मुताबिक, बैरिकेड, निषेधाज्ञा और पुलिस बल का इस्तेमाल पहले भी दूसरे आंदोलनों में किया गया था, लेकिन इस बार कार्रवाई युवाओं को पीछे हटाने में सफल नहीं हुई. कई प्रदर्शनकारी चोटों के बावजूद दोबारा जंतर-मंतर लौटे. महत्वपूर्ण यह भी रहा कि आंदोलन ने हिंसा के बजाय नारे, पोस्टर, व्यंग्य, मीम और डिजिटल अभिव्यक्ति को अपना हथियार बनाए रखा.
अपूर्वानंद प्रधानमंत्री के युवाओं को सोशल मीडिया पर "दोस्तों" कहकर संबोधित करने और उसके जवाब में उभरे "हम आपके दोस्त नहीं हैं" को खास राजनीतिक महत्व देते हैं. उनके मुताबिक, यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री और युवाओं के बीच उस प्रत्यक्ष और अभिभावकवादी राजनीतिक संबंध को अस्वीकार करने का संकेत था, जिसे वर्षों से स्थापित किया गया था. अपूर्वानंद इसे युवाओं के भीतर सत्ता के भय और प्रधानमंत्री की अजेय छवि के कमजोर होने के रूप में देखते हैं.
इसी संदर्भ में वे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की व्याख्या करते हैं. उनके अनुसार, यह केवल एक मंत्री को हटाने का फैसला नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री को आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव से बचाने के लिए बनाई गई "फायरवॉल" जैसा कदम था. वे मानते हैं कि सरकार इसे जवाबदेही और संवेदनशीलता के प्रमाण के रूप में पेश कर सकती है, लेकिन आंदोलनकारी इसे अपने दबाव से हासिल राजनीतिक रियायत के रूप में देखते हैं.
अपूर्वानंद के मुताबिक, इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विरासत इसकी रचनात्मक और अहिंसक राजनीतिक भाषा है. युवाओं ने सत्ता का मुकाबला भाषण, कला, हास्य, मीम और व्यंग्य से किया. उनके लिए हंसी केवल मनोरंजन नहीं रही, बल्कि सत्ता के भय और अजेयता की छवि को चुनौती देने का माध्यम बनी. उनका तर्क है कि अधिनायकवादी राजनीति केवल आज्ञाकारिता पर नहीं, बल्कि नेता के प्रति भय और असाधारणता की धारणा पर भी निर्भर करती है. जंतर-मंतर के युवाओं ने इसी धारणा को चुनौती देकर प्रधानमंत्री को एक निर्वाचित और जवाबदेह राजनीतिक नेता के रूप में देखने पर जोर दिया.
अपूर्वानंद अंत में कहते हैं कि जंतर-मंतर भले खाली हो गया हो और युवा अपने हॉस्टल, विश्वविद्यालय और घर लौट गए हों, लेकिन आंदोलन की राजनीतिक भाषा समाप्त नहीं हुई है. वह विश्वविद्यालयों, किराए के कमरों, यात्राओं और लाखों मोबाइल स्क्रीन पर जारी रह सकती है. उनके अनुसार, इस युवा आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतंत्र उस क्षण जीवंत होता है, जब नागरिक अपनी आवाज की ताकत पर दोबारा भरोसा करना शुरू करते हैं.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं. उनका मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ा जा सकता है.

