अशोक पांडे | विनेश को भूल तो नहीं गए न!

हरियाणे की वही ज़िद्दी लड़की जो पेरिस ओलिम्पिक्स के फाइनल में पहुँचने वाली पहिला हिन्दुस्तानी पहलवान बनी थी. इतने बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं में अमूमन फिसड्डी रहने वाले हमारे देश के लिए यह गौरव का विषय था. सारा देश फाइनल के इंतज़ार में था जब मुकाबले से ठीक पहले उसका वज़न सौ ग्राम ज़्यादा पाया गया और वह डिसक्वालीफाई हो गई थी.

मुझे उम्मीद है इस त्रासदी की सभी को याद होगी. यह भी याद होगा जब इस घटना को एक साज़िश बताते हुए रोती हुई विनेश ने कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी थी. वह भारत लौटी तो एयरपोर्ट से घर तक आम जन ने उसका जैसा स्वागत किया वह राष्ट्राध्यक्षों तक में डाह पैदा कर सकता था. हम सब ने उसे अपनी बहन-बेटी माना और उसके रोने में साथ दिया.  

फिर एक बदसूरत कहानी के टुकड़े एक-एक कर सामने आने लगे - महिला पहलवानों के साथ होने वाला सेक्सुअल अपमान, प्रशासकों द्वारा किया जाने वाला घनघोर पक्षपात और शर्मनाक बयानबाजी. देश ने देखा कि भारतीय कुश्ती के प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर ऐसे लोग काबिज़ थे जिनके आपराधिक रेकॉर्ड्स थे और जो खिलाफत में उठने वाली हर आवाज़ को खामोश कर देना जानते थे. 

विनेश ने आगे आकर सारे खुलासे किए, लू और बारिश के बीच भूख हड़ताल पर बैठी, और वह सब किया जो कोई भी गैरतमंद इंसान करता. समूचे तंत्र ने नंगे होकर उस छोटी-सी हिम्मती स्त्री को सबक सिखाने के लिए कमर कस ली और जहाँ-जहाँ संभव था उसे अपमानित और बदनाम करने में कोई कमी न छोड़ी. 

संन्यास की घोषणा के बाद विनेश ने विधायक का चुनाव जीता और एक बच्चे की माँ बनी. पिछले साल के अंत में उन्हें अहसास हुआ कि कुश्ती से नाता जोड़ने का एक और जतन किया जाना चाहिए. उसने संन्यास वापस ले लिया और घोषणा की कि उनका अगला लक्ष्य 2028 के लॉस एंजेल्स ओलिम्पिक्स में मैडल जीतना है.

पिछले महीने विनेश यूपी के उसी गोंडा में एशियन गेम्स के ट्रायल से पहले के मुकाबलों में भाग लेने पहुँची जो भारतीय कुश्ती के माफिया हिस्ट्रीशीटर मुखिया का ठिकाना है. 

सारा सिस्टम एकजुट हो गया कि यह हिम्मती लड़की खेल ही न सके. सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा जिसने विनेश के हक़ में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विनेश देश का गौरव हैं. 

आप यकीन करेंगे इस मामले में जब भारतीय कुश्ती संघ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा तो उसने अपनी अर्जी में विनेश के पेरिस में हुए डिस्क्वालीफिकेशन को “राष्ट्रीय शर्म” बताया. कोर्ट ने इस बात पर भी संघ को लताड़ा और विनेश के पक्ष में फैसला दिया. 

सोच कर देखिये तो, साल 2024 के आखिर में जिस स्त्री को बीबीसी ने साल की सौ सबसे प्रभावशाली औरतों में शुमार किया, उसे लगातार तंग करने वाला सिस्टम घात लगाकर बैठा था कि देखें कहाँ तक बचती है!

बत्तीस की उम्र में, वह भी माँ बन जाने के बाद, किसी भी महिला खिलाड़ी का वापस लौटना तकरीबन असंभव माना जाता है. एक तरफ़ धन-बल, धौंस और सत्ता की ताकत से भरपूर आपराधिक हाथों में खेल रहा सिस्टम था और एक तरफ अकेली विनेश. विनेश सेमीफाइनल में हार गई. एक्सपर्ट्स कहते हैं उन्हें किसी के इशारे पर हरवाया गया. 

फिर पिछले हफ्ते दिल्ली में एशियन गेम्स के ट्रायल हुए. विनेश यहाँ भी सेमीफाइनल तक पहुँची लेकिन हार गई. 

उस वीडियो को ज़रूर देखिये जिसमें हारने के वाद वह मैट से बाहर आकर उस दिशा में उंगली उठाकर कहती है, “मैं फिर आऊंगी मैट पे” जहां सबसे आगे सोफे पर हमारा बदकार कुश्ती संघ बैठा हुआ है जो चाहता है भरसक कोई मैडल ने मिले, विनेश की नाक हर हाल में मिट्टी में रगड़ी जानी है. 

विनेश की आँखों की मजबूत जिद और इच्छाशक्ति को देखिए – उसे हरा सकने को खुद को सर्वशक्तिमान समझने वाला हमारा बदसूरत सिस्टम उस चीज़ को कभी हासिल नहीं कर सकता जिसे इंसानी जज़्बा कहा जाता है. विनेश ने प्रेस से कहा, "भारतीय कुश्ती संघ चाहता है मैं जल्दी मर जाऊं. मैं कड़ी मेहनत से वापसी करूंगी और हर उस मुंह को चुप कर दूंगी जिसने मुझ पर शक किया." 

विनेश पर हम सब को नाज़ था. नाज़ है!

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