“कॉकरोच जनता पार्टी” पर इंडिया ब्लॉक में उत्साह, लेकिन कांग्रेस क्यों बना रही दूरी?
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों से एक अजीब नाम चर्चा के केंद्र में है “कॉकरोच जनता पार्टी”. एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया अभियान के तौर पर शुरू हुई यह पहल अब विपक्षी राजनीति के भीतर बहस का विषय बन चुकी है. दिलचस्प बात यह है कि इंडिया ब्लॉक के कई बड़े दल जहां इस अभियान को युवाओं के गुस्से और असंतोष की नई अभिव्यक्ति मानकर उसका स्वागत कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस इससे दूरी बनाए हुए है.
यह मतभेद सिर्फ एक वायरल ट्रेंड को लेकर नहीं है. इसके पीछे विपक्ष की राजनीति, सोशल मीडिया की बदलती ताकत और युवाओं के बीच राजनीतिक भरोसे के संकट की बड़ी कहानी छिपी हुई है.
कैसे शुरू हुआ “कॉकरोच जनता पार्टी” अभियान?
इस अभियान की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट में हुई एक टिप्पणी के बाद हुई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी को कुछ युवाओं ने बेरोजगारों के अपमान के रूप में देखा. बाद में अदालत की ओर से स्पष्टीकरण दिया गया कि टिप्पणी युवाओं के लिए नहीं थी, लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर नाराजगी फैल चुकी थी.
महाराष्ट्र के अभिजीत डिपके नामक राजनीतिक कम्युनिकेशन रणनीतिकार ने इसी नाराजगी को एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक अभियान में बदल दिया. उन्होंने “कॉकरोच जनता पार्टी” के नाम से सोशल मीडिया अकाउंट और वेबसाइट शुरू की. वेबसाइट पर खुद को “आलसी और बेरोजगारों” का मंच बताया गया.
कुछ ही दिनों में यह अभियान वायरल हो गया. इंस्टाग्राम पर इसके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े और यह सोशल मीडिया पर बीजेपी से भी ज्यादा एंगेजमेंट हासिल करने लगा. इसके बाद इस अभियान ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की मांग को लेकर ऑनलाइन याचिका भी शुरू की, जिसे लाखों लोगों ने समर्थन दिया.
विपक्षी दलों को इसमें क्या दिख रहा है?
इंडिया ब्लॉक के कई दल इस अभियान को बीजेपी विरोधी माहौल का संकेत मान रहे हैं. आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि युवाओं को अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए एक वैकल्पिक मंच चाहिए था. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष को इस अभियान पर कब्जा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से इसकी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है.
समाजवादी पार्टी के नेताओं का भी मानना है कि जब कोई मुद्दा राजनीतिक दलों के बजाय सोशल मीडिया या नागरिक मंचों के जरिए उठता है, तो उसे ज्यादा समर्थन मिलता है. पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि राजनीतिक दलों को हमेशा अपने पुराने शासनकाल और नीतियों के आधार पर सवालों का सामना करना पड़ता है, जबकि ऐसे अभियान खुद को “सिस्टम के बाहर” पेश कर पाते हैं.
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर “बीजेपी बनाम सीजेपी” लिखकर इस अभियान को सीधे राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया. तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ’ब्रायन ने भी कहा कि बीजेपी का विरोध करने वाले हर मंच का स्वागत किया जाना चाहिए.
तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी इस अभियान को लेकर उत्साह दिखा. पार्टी नेताओं ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी भी इस “कॉकरोच राजनीति” के प्रति सहानुभूति रखते हैं.
कांग्रेस क्यों असहज है?
जहां इंडिया ब्लॉक के बाकी दल इस अभियान को अवसर की तरह देख रहे हैं, वहीं कांग्रेस इसे लेकर सतर्क और कुछ हद तक असहज दिखाई दे रही है.
कांग्रेस की युवा इकाई इंडियन यूथ कांग्रेस ने “इंडियन यूथ कॉकरोचेज” नाम से अपना अलग सोशल मीडिया अकाउंट बनाया. उसके बायो में लिखा गया कि “असली कॉकरोच सड़क पर लड़ते हैं, सिर्फ टाइमलाइन पर नहीं.”
यह प्रतिक्रिया कांग्रेस की सोच को समझने में मदद करती है. पार्टी का मानना है कि सिर्फ सोशल मीडिया पर गुस्सा जाहिर करना राजनीतिक संघर्ष नहीं होता. कांग्रेस लंबे समय से खुद को जमीन पर संघर्ष करने वाली पार्टी के रूप में पेश करती रही है और शायद इसी कारण वह किसी “मीम आधारित आंदोलन” को गंभीर राजनीतिक विकल्प के रूप में स्वीकार करने से बच रही है.
पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने तो इस पूरे अभियान को “फैड” यानी अस्थायी ट्रेंड बताया. उनके मुताबिक सोशल मीडिया पर किसी अकाउंट को फॉलो करना वास्तविक राजनीति नहीं है. उन्होंने इसकी तुलना उस दौर से की जब लोग सिर्फ इसलिए फिल्म देखने जाते थे क्योंकि वह “गोल्डन जुबली” मना रही होती थी.
क्या कांग्रेस को राजनीतिक खतरा महसूस हो रहा है?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक कांग्रेस की चिंता सिर्फ इस अभियान की शैली को लेकर नहीं है. असली सवाल यह है कि अगर सरकार विरोधी गुस्सा किसी नए डिजिटल मंच के जरिए व्यक्त होने लगे, तो पारंपरिक विपक्षी दलों की भूमिका क्या रह जाएगी?
कांग्रेस पिछले कई वर्षों से लोकतंत्र, संस्थाओं की स्वतंत्रता, मीडिया और बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठाती रही है. लेकिन “कॉकरोच जनता पार्टी” उन्हीं मुद्दों को ज्यादा वायरल और ज्यादा आक्रामक इंटरनेट भाषा में पेश कर रही है. इससे यह भी संकेत मिलता है कि युवाओं का एक हिस्सा पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से ऊब चुका है.
क्षेत्रीय दलों के लिए यह स्थिति उतनी असहज नहीं है, क्योंकि वे पहले से ही अपनी राजनीति को लचीले और स्थानीय तरीके से चलाते हैं. लेकिन कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय वैचारिक विपक्ष के रूप में देखती है. ऐसे में किसी “व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन” का अचानक लोकप्रिय हो जाना उसके लिए चुनौती की तरह दिखाई दे सकता है.
सोशल मीडिया बनाम जमीनी राजनीति
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है. क्या आज की राजनीति सोशल मीडिया के बिना संभव है?
पुरानी राजनीति रैलियों, धरनों और संगठन पर आधारित थी. नई राजनीति मीम्स, रील्स और वायरल पोस्ट के जरिए लोगों तक पहुंच रही है. “कॉकरोच जनता पार्टी” इसी बदलाव का प्रतीक बनकर उभरी है.
हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि यह अभियान लंबे समय तक टिकेगा या कुछ हफ्तों का इंटरनेट ट्रेंड बनकर रह जाएगा. लेकिन इसने यह जरूर दिखा दिया है कि भारत में राजनीतिक असंतोष अब सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया अब खुद एक राजनीतिक मंच बन चुका है, जहां व्यंग्य भी आंदोलन का रूप ले सकता है.
और शायद यही वजह है कि इंडिया ब्लॉक के कई दल इस ट्रेंड में संभावना देख रहे हैं, जबकि कांग्रेस उसी ट्रेंड में अपने लिए एक असहज सवाल देख रही है.

