“एक उत्तर पुस्तिका, एक छात्र और पूरा आईटी सेल”: कैसे सीबीएसई की गड़बड़ी बताने वाले छात्र को ‘पाकिस्तानी’ बना दिया गया

भारत में बोर्ड परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती. यह करियर, कॉलेज, आत्मविश्वास और कई परिवारों के भविष्य का सवाल होती है. लेकिन मई 2026 में सीबीएसई की नई “ऑन-स्क्रीन मार्किंग” व्यवस्था ने हजारों छात्रों के बीच ऐसा अविश्वास पैदा किया, जिसने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए. इस पूरे विवाद का चेहरा बना एक 17 वर्षीय छात्र-वेदांत श्रीवास्तव.

वेदांत ने सिर्फ इतना कहा था कि उसे दिखाई गई फिजिक्स की उत्तर पुस्तिका उसकी नहीं है. लेकिन कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर उसे “पाकिस्तानी”, “देश विरोधी”, “डीप स्टेट एजेंट” और “प्रोपेगेंडा” कहकर निशाना बनाया जाने लगा. मामला इतना बढ़ा कि विपक्ष के नेता राहुल गाँधी तक को हस्तक्षेप करना पड़ा. बाद में स्वयं सीबीएसई ने तकनीकी गड़बड़ी स्वीकार कर ली. 

लेकिन तब तक सवाल सिर्फ एक छात्र का नहीं रह गया था. सवाल था — क्या भारत में अब किसी सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाना भी “राष्ट्रविरोध” माना जाएगा?

पूरा मामला शुरू कैसे हुआ?

कक्षा 12 के छात्र वेदांत श्रीवास्तव को फिजिक्स में उम्मीद से काफी कम अंक मिले. उसने सामान्य प्रक्रिया के तहत अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी मांगी. लेकिनजब सीबीएसई ने स्कैन की हुई कॉपी भेजी, तो वेदांत के मुताबिक उसमें लिखावट, उत्तरों की शैली और पूरा प्रस्तुतीकरण उसकी लिखावट से मेल नहीं खा रहा था.

उसने अपनी अंग्रेजी और कंप्यूटर साइंस की कॉपियों के साथ तुलना करते हुए सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालीं. दावा किया गया कि अंग्रेजी और कंप्यूटर साइंस की कॉपी उसकी लग रही थी, लेकिन फिजिक्स की कॉपी पूरी तरह अलग थी. 

यहीं से विवाद शुरू हुआ.

ओएसएम क्या है और विवाद क्यों बढ़ा?

सीबीएसई ने इस साल “ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम” यानी ओएसएम लागू किया था. इसका दावा था कि इससे मूल्यांकन तेज, पारदर्शी और त्रुटिहीन होगा. कॉपियां स्कैन होकर डिजिटल तरीके से जांची जानी थीं. 

लेकिन परिणाम आने के बाद छात्रों की शिकायतों की बाढ़ आ गई:

  • धुंधली और अपठनीय स्कैन कॉपियां

  • गलत उत्तर पुस्तिकाएं अपलोड होना

  • पन्ने गायब होना

  • अंक जोड़ने में गड़बड़ी

  • पोर्टल क्रैश

  • भुगतान विफल होना

  • पुनर्मूल्यांकन फीस में भारी विसंगति

कुछ छात्रों ने दावा किया कि उन्हें किसी और की कॉपी दिखाई गई. किसी ने कहा कि लंबे उत्तरों के पन्ने गायब हैं. कुछ छात्रों ने आरोप लगाया कि बिना देखे “ब्लाइंड चेकिंग” हुई. 

यानी वेदांत का मामला अकेला नहीं रहा. वह सिर्फ सबसे वायरल चेहरा बन गया.

“पाकिस्तानी” कैसे बना दिया गया?

यहीं से कहानी खतरनाक मोड़ लेती है.

वेदांत ने अपनी शिकायत रखने के लिए नया ‘एक्स’ अकाउंट बनाया था. अकाउंट के लोकेशन सेक्शन में तकनीकी कारणों से “पाकिस्तान” दिखने लगा. इसके बाद दक्षिणपंथी सोशल मीडिया अकाउंट्स और कई ट्रोल समूहों ने उसे “पाकिस्तानी” कहना शुरू कर दिया.  

उसके भाई सिद्धांत श्रीवास्तव को वीडियो जारी कर सफाई देनी पड़ी कि यह सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी थी और अकाउंट इसलिए बनाया गया क्योंकि आधिकारिक प्रक्रिया से न्याय नहीं मिल रहा था. 

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने यह तक कहना शुरू कर दिया कि यह “भारत विरोधी नैरेटिव” है. कुछ पोस्टों में “डीप स्टेट” और “विदेशी एजेंडा” जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए. रेड्डिट और अन्य मंचों पर छात्रों ने लिखा कि किसी शिक्षा संबंधी शिकायत को भी राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध में बदल दिया गया.  

यानी असली सवाल “क्या उत्तर पुस्तिका गलत अपलोड हुई?” पीछे चला गया. केंद्र में आ गया छात्र की “देशभक्ति” का परीक्षण.

राहुल गांधी समेत विपक्ष ने उठाये सवाल  

राहुल गाँधी ने इस मामले को लेकर सीधे भाजपा आईटी सेल और केंद्र सरकार पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि एक 17 वर्षीय छात्र न्याय की उम्मीद में सोशल मीडिया पर आया, लेकिन उसकी मदद करने के बजाय उसे गालियां दी गईं. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा समर्थित ट्रोल नेटवर्क ने उसे “देश विरोधी” तक कह दिया.  

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि दशकों में पहली बार सीबीएसई की विश्वसनीयता पर इतने बड़े पैमाने पर सवाल उठ रहे हैं.

इसके बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी ओएसएम प्रणाली को लेकर केंद्र सरकार और सीबीएसई पर हमला बोला. उन्होंने दावा किया कि नई प्रणाली ने धुंधली कॉपियां, गलत मूल्यांकन और मिसमैच जैसी समस्याएं पैदा कीं. वहीं अरविन्द केजरीवाल ने शिक्षा मंत्री पर हमला बोलते हुए कहा कि “पहले नीट और अब सीबीएसई” छात्रों को भारी तनाव में डाल रहे हैं.

क्या सीबीएसई ने गलती मानी?

सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि सीबीएसई ने स्वयं वेदांत को ईमेल भेजकर माना कि तकनीकी गड़बड़ी के कारण गलत स्कैन कॉपी अपलोड हुई थी और अंक संशोधित किए जाएंगे.

यानी जिस छात्र को पहले “फर्जी”, “पाकिस्तानी” और “प्रोपेगंडा” कहा जा रहा था, बाद में उसकी शिकायत सही निकली.

सीबीएसई ने यह भी कहा कि इस पूरे मामले को “टॉप प्रायोरिटी” पर लिया गया है. आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों को तकनीकी समस्याओं की जांच के लिए जोड़ा गया. 

लेकिन सवाल यह है कि अगर छात्र सोशल मीडिया पर नहीं आता, मामला वायरल नहीं होता और राजनीतिक बहस नहीं बनती तो क्या उसे न्याय मिलता?

वेदांत अकेला शिकार नहीं 

वेदांत अकेला नहीं है जिसके उत्तर-पुस्तिका में गलतियां दर्ज हुई है. सोशल मीडिया पर कई लोग अपने साथ हुई इस समस्या के बारे में में लिख रहे हैं. मोहित त्यागी नाम के स्टूडेंट ने एक्स पर लिखा “मेरे केमिस्ट्री पेपर के सुधार के बाद मेरा कुल प्रतिशत 84% से बढ़कर 91% हो गया.

अमिता सचदेवा नाम की यूजर लिखती हैं कि “मेरी बेटी ने इस वर्ष कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाएं दी थीं. हालांकि उसे अच्छे अंक मिले हैं, लेकिन वह अपने परिणाम से बेहद निराश है क्योंकि उसे विश्वास है कि उसने परीक्षा में जितना प्रदर्शन किया, उसके मुकाबले उसे काफी कम अंक दिए गए.

हमने उसकी सभी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपियां प्राप्त कीं. सावधानीपूर्वक जांच करने पर हमें पांच में से चार विषयों में गंभीर गड़बड़ियां मिलीं. कई सही उत्तरों को गलत चिह्नित किया गया है, जबकि अनेक उत्तरों की जांच ही नहीं की गई.  

मैं पूरी तरह समझ सकता हूं कि देशभर में हजारों छात्र इसी तरह की पीड़ा, निराशा और हताशा से गुजर रहे हैं. 

यही बताता है कि उत्तर पुस्तिकाओं में होने वाली गलतियाँ कितनी गंभीर हो सकती हैं. कम अंक पाने वाले कई छात्र खुद को दोष दे रहे होंगे, जबकि असली समस्या शायद मूल्यांकन की गलती या कॉपी जांच में हुई त्रुटि हो सकती है. एक यूजर ने लिखा की मेरे उत्तर पुस्तिका के के दो पन्नों को सैन ही नहीं किया गया.

संजना लिखती हैं है कि मुझे रसायन विज्ञान की उत्तर पुस्तिका की जो फोटो कॉपी बोर्ड से मिली वो मेरी हैंड राइटिंग है ही नहीं। सन्दर्भ केलिए अपनी अंग्रेजी की कॉपी भी उन्होंने शेयर किया है.

ओएसएम के पीछे कौन 

कांग्रेस पार्टी के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाया है कि “स्पष्ट रूप सेसीबीएसई से कहीं ना कहीं गलती हुई है. ओएसएम को डिज़ाइन किसने किया? वेंडर कौन है? उसका क्या अनुभव है? ये सारे प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं?

दिग्विजय सिंह संसद की शिक्षा मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं. उन्होंने 1 जून को बैठक बुलाई है जिसमें सीबीएसई से इसपर जानकारी लेने की बात कही है.

क्या डिजिटल सिस्टम भरोसेमंद था? 

विवाद के बीच एक साइबर सिक्योरिटी रिसर्च ब्लॉग के माध्यम से निसर्ग अधिकारी ने सीबीएसई के ओएसएम पोर्टल की सुरक्षा पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए. ब्लॉग लिखने वाले ने खुद को कक्षा 12 का छात्र और हॉबी साइबर सिक्योरिटी रिसर्चर बताया और दावा किया कि उसने फरवरी 2026 में ही CERT-In को इन खामियों की जानकारी दे दी थी. ब्लॉग में आरोप लगाया गया कि पोर्टल में “हार्डकोडेड मास्टर पासवर्ड”, क्लाइंट-साइड ओटीपी वैलिडेशन, बिना मजबूत सर्वर सत्यापन वाले इंटरनल रूट्स, पुराना पासवर्ड सत्यापित किए बिना पासवर्ड बदलने जैसी गंभीर कमजोरियां मौजूद थीं. रिसर्चर के मुताबिक इन खामियों की मदद से किसी भी परीक्षक के अकाउंट तक पहुंच, ओटीपी बायपास, पासवर्ड बदलना और यहां तक कि मूल्यांकन प्रक्रिया में हस्तक्षेप संभव हो सकता था. यदि ये दावे सही हैं, तो मामला सिर्फ गलत मूल्यांकन का नहीं बल्कि पूरी डिजिटल परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा और विश्वसनीयता का बन जाता है.

जिम्मेदारियों से भागते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान

देश में एक के बाद एक परीक्षा प्रणाली से जुड़े विवाद सामने आते रहे हैं. कहीं पेपर लीक के आरोप, तो कहीं सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग में तकनीकी गड़बड़ियों और मूल्यांकन त्रुटियों की शिकायतें. इन मामलों में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ खामियों का नहीं है, बल्कि सरकार और शिक्षा मंत्रालय की प्रतिक्रिया का भी है.

पेपर लीक, परीक्षा गड़बड़ियों और डिजिटल मूल्यांकन विवादों के बावजूद केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की तरफ से ठोस, पारदर्शी और समयबद्ध जवाबदेही नहीं दिखाई देती. कई मामलों में जांच या तो धीमी रही है या फिर उसकी विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे छात्रों और अभिभावकों के बीच असंतोष और अविश्वास बढ़ा है.

सीबीएसई जैसे संस्थानों में तकनीकी बदलाव और डिजिटल सिस्टम लागू करने की प्रक्रिया भी “बिना पर्याप्त तैयारी का प्रयोग” लगता हैं. जब सिस्टम में लगातार शिकायतें आ रही हैं. जैसे गलत स्कैन कॉपियां, मूल्यांकन त्रुटियां और फीस संबंधी अनियमितताएं तो जिम्मेदारी तय करने और सुधारात्मक कदमों की गति बेहद धीमी दिखाई देती है.

शिक्षा मंत्रालय अक्सर “तकनीकी प्रक्रिया” या “जांच जारी है” जैसे जवाबों तक सीमित रह जाता है, जबकि जमीनी स्तर पर छात्रों की समस्याएं बनी रहती हैं. 

क्या परीक्षा प्रणाली में हो रही इन गड़बड़ियों को केवल “टेक्निकल एरर” मानकर छोड़ दिया जा रहा है, या फिर वाकई जवाबदेही तय करने में देरी हो रही है?

यह सिर्फ एक परीक्षा विवाद नहीं है

यह मामला तीन स्तरों पर बहुत बड़ा संकेत देता है:

1. संस्थागत अविश्वास

जब छात्र अपनी उत्तर पुस्तिका पर भरोसा नहीं कर पा रहे, तब पूरी परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न उठता है.

2. डिजिटलीकरण की अंधी दौड़

भारत में “डिजिटल” को अक्सर “बेहतर” मान लिया जाता है. लेकिन ओएसएम विवाद दिखाता है कि तकनीक बिना तैयारी के लागू की जाए तो वह अराजकता भी पैदा कर सकती है.

3. हर आलोचना = राष्ट्रविरोध?

सबसे खतरनाक पहलू यही है. एक छात्र ने मूल्यांकन पर सवाल उठाया. जवाब में उसे “पाकिस्तानी” कहा गया. यह वही राजनीतिक संस्कृति है जिसमें बेरोजगारी पूछो तो “देशद्रोही”, डेटा मांगो तो “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, और अब उत्तर पुस्तिका पर सवाल उठाओ तो “विदेशी एजेंट”.

सोशल मीडिया का नया पैटर्न

यह मामला भारत के डिजिटल राजनीतिक माहौल का भी उदाहरण बन गया. पहले व्यक्ति को बदनाम करो, उसकी नीयत पर सवाल उठाओ, राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाओ, फिर असली प्रश्न गायब कर दो.

वेदांत के मामले में भी यही हुआ:

  • पहले ट्रोलिंग

  • फिर राष्ट्रवाद

  • फिर राजनीतिक ध्रुवीकरण

  • और अंत में असली तकनीकी गलती की पुष्टि

सबसे बड़ा सवाल

अगर एक वायरल मामला इतनी मुश्किल से सुना गया, तो उन हजारों छात्रों का क्या हुआ जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं कर पाए?

कितने छात्र होंगे जिन्होंने कम अंक आने के बाद खुद को दोष दिया होगा, जबकि गलती प्रणाली की हो सकती थी?

और क्या आने वाले समय में कोई छात्र सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले यह सोचेगा कि कहीं उसे भी “देश विरोधी” तो नहीं कहा जाएगा?

सीबीएसई का यह विवाद सिर्फ एक परीक्षा की गड़बड़ी नहीं है. यह उस भारत की कहानी है जहां संस्थागत त्रुटि से ज्यादा तेज़ी से “राष्ट्रवाद” सक्रिय हो जाता है.  

हरकारा एक्सप्लेनर की पूरी बातचीत यहाँ सुनी जा सकती है.

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