राजनीतिक अजगर: कैसे बीजेपी निगल रही है भारत की क्षेत्रीय पार्टियों

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह.

भारतीय राजनीति के घने पारिस्थितिकी तंत्र में रेंग रहे छोटे-छोटे सांपों को राजनीतिक अजगर बीजेपी निगल रहा है. यह शक्तिशाली अजगर अपने प्रतिद्वंद्वियों को सीधे खत्म करने के बजाय धीरे-धीरे उन्हें अपने भीतर समाहित करने की रणनीति अपनाता है. इसके लिए वह गठबंधन, राजनीतिक साझेदारी, दलों में टूट और वैचारिक समावेशन का सहारा लेता है. और अगर यह पर्याप्त नहीं होता, तो उसका शिकंजा इतना कस जाता है कि प्रतिद्वंद्वी दल टुकड़ों में बंट जाते हैं.

कभी भाषाई, जातीय और सांस्कृतिक पहचानों की मजबूत राजनीतिक अभिव्यक्ति रहे क्षेत्रीय दल आज खुद को ऐसे दौर में पाते हैं जहां उनकी स्वायत्तता लगातार कमजोर होती जा रही है. बीजेपी का विस्तार केवल चुनावी जीत की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की संघीय राजनीति के पुनर्गठन का भी संकेत है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में 2014 के बाद बीजेपी एक हिंदी पट्टी केंद्रित दल से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली ताकतों में शामिल हो चुकी है. 2026 तक आते-आते पार्टी और उसके सहयोगी देश की अधिकांश आबादी वाले क्षेत्रों में सत्ता या प्रभाव की स्थिति में पहुंच गए हैं. कई राज्यों में यह विस्तार क्षेत्रीय दलों के साथ साझेदारी से शुरू हुआ और बाद में उन्हीं दलों को सीमित या विभाजित करने तक पहुंच गया.

पहले साथ, फिर संकट

बीजेपी की रणनीति अक्सर सहयोग के प्रस्ताव से शुरू होती है. सत्ता विरोधी माहौल, संसाधनों की कमी या राजनीतिक दबाव से जूझ रहे क्षेत्रीय दल उसके साथ गठबंधन में अवसर देखते हैं. लेकिन समय के साथ यह साझेदारी उनके लिए चुनौती भी बन सकती है.

आंध्र प्रदेश में एन. चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ मिलकर बीजेपी को दक्षिण भारत में मजबूत आधार दिया. बिहार में नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) कई बार बीजेपी से अलग हुई और फिर उसके साथ लौटी. हर बार इस पुनर्मिलन ने बीजेपी की स्थिति को और मजबूत किया, जबकि जदयू की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और सौदेबाजी की क्षमता पहले की तुलना में कमजोर पड़ती गई. कभी बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाली जदयू आज पहले जैसी राजनीतिक बढ़त और प्रभाव बनाए रखने के लिए संघर्ष करती दिखाई देती है.

ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल लंबे समय तक बीजेपी के विस्तार को रोकने में सफल रही. लेकिन संगठनात्मक विस्तार और लगातार राजनीतिक पहुंच के जरिए बीजेपी ने वहां भी अपनी स्थिति मजबूत कर ली. यह दिखाता है कि क्षेत्रीय दलों के लिए लंबे समय तक अपनी अलग पहचान बनाए रखना पहले की तुलना में अधिक कठिन होता जा रहा है.

फूट डालो और राज करो

जहां गठबंधन पर्याप्त नहीं होते, वहां राजनीतिक विभाजन अहम भूमिका निभाते हैं. महाराष्ट्र इसके सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है. शिवसेना में हुई टूट के बाद एकनाथ शिंदे का गुट बीजेपी के साथ आ गया और मूल संगठन कमजोर हो गया. इसी तरह अजित पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक धड़े के अलग होने से भी राज्य की राजनीति का संतुलन बदल गया.

पश्चिम बंगाल इस राजनीति का सबसे ताजा उदाहरण बनकर सामने आया है. 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को 2026 के विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. बीजेपी ने दो सौ से अधिक सीटें जीतकर सत्ता हासिल की और तृणमूल कांग्रेस सीमित होकर रह गई.

चुनाव के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और टूट की खबरें सामने आने लगीं. कई नेताओं और विधायकों के बगावती रुख ने इस आशंका को जन्म दिया कि तृणमूल कांग्रेस भी उन क्षेत्रीय दलों की सूची में शामिल हो सकती है जो चुनावी हार के बाद आंतरिक विभाजन का सामना कर रहे हैं. ममता बनर्जी ने बीजेपी पर केंद्रीय एजेंसियों, राजनीतिक दबाव और प्रलोभनों के जरिए उनकी पार्टी को कमजोर करने का आरोप लगाया है.

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल का विपक्षी गठबंधनों से अलग होना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना गया. आलोचकों का तर्क है कि दलबदल, जांच एजेंसियों का दबाव और राजनीतिक नैरेटिव पर नियंत्रण आज की राजनीति में ऐसे उपकरण बन चुके हैं जिनसे विपक्षी दल धीरे-धीरे अपना संगठन और मनोबल खोने लगते हैं.

सुनियोजित बढ़त

बीजेपी का विस्तार केवल राजनीतिक गठबंधनों और विभाजनों तक सीमित नहीं है. इसका एक महत्वपूर्ण पहलू वैचारिक समावेशन भी है. जाति या क्षेत्रीय पहचान पर आधारित राजनीति के मुकाबले उसने हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का व्यापक राजनीतिक विमर्श खड़ा किया है. इसके साथ ही कल्याणकारी योजनाओं के जरिए पारंपरिक वोट बैंक की सीमाओं को भी चुनौती दी गई है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों के सहयोग से बना बीजेपी का मजबूत बूथ स्तर का नेटवर्क उसकी सबसे बड़ी ताकतों में गिना जाता है. पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्वी भारत तक पार्टी ने लगातार अपना प्रभाव बढ़ाया है. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार ने भी यह संकेत दिया कि मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रीय किले भी लंबे राजनीतिक दबाव का सामना हमेशा नहीं कर पाते.

इस पूरी प्रक्रिया का असर भारत की संघीय व्यवस्था पर भी पड़ता है. क्षेत्रीय दल लंबे समय से राज्यों की विशिष्ट आकांक्षाओं और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति में आवाज देते रहे हैं. तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति, पंजाब में कृषि संबंधी मुद्दे और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय अस्मिता जैसे सवाल इसी परंपरा का हिस्सा रहे हैं.

बीजेपी और उसके समर्थक इस बदलाव को राष्ट्रीय एकीकरण, प्रशासनिक दक्षता और नीति निर्माण में स्थिरता से जोड़कर देखते हैं. वहीं आलोचकों का मानना है कि इससे राजनीतिक विविधता, स्थानीय जवाबदेही और बहुलतावाद कमजोर हो सकता है.

बीजेपी का उभार भारत की पार्टी व्यवस्था को नए सिरे से आकार दे रहा है. गठबंधन, राजनीतिक विभाजन, वैचारिक विस्तार और संगठनात्मक ताकत के सहारे उसने कई क्षेत्रीय दलों को कमजोर किया है या उन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में समाहित कर लिया है. इससे भारतीय राजनीति का परिदृश्य अधिक एकरूप होता दिखाई देता है, जहां राष्ट्रीय आख्यान क्षेत्रीय आवाजों पर भारी पड़ रहे हैं. यह बदलाव लोकतंत्र को अधिक स्थिर बनाएगा या उसकी विविधता को कमजोर करेगा, इस पर बहस जारी है. फिलहाल इतना तय है कि राजनीतिक अजगर अपनी सुनियोजित बढ़त जारी रखे हुए है और भारतीय राजनीति का जंगल लगातार बदल रहा है.

यह लेख ‘साउथ फर्स्ट’ केलिए तेलगांना के वरिष्ठ पत्रकार पीवी कोंडल राव द्वारा लिखा गया है. उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया में काम किया है और फ्री प्रेस जर्नल एवं अन्य समाचार आउटलेट्स में योगदान देते हैं.

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